Wednesday, March 17, 2010

“ब्लॉग में अपार संभावनाएँ हैं” (चर्चा हिन्दी चिट्ठों की)

अंक : 159
चर्चाकार : डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"
ज़ाल-जगत के सभी हिन्दी-चिट्ठाकारों को
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"" का सादर अभिवादन!
आइए पिछले 24 घण्टों की कुछ पोस्टों की चर्चा प्रारम्भ करता हूँ!
तेताला

ब्लॉग में अपार संभावनाएं हैं : कनिष्क कश्यप - [image: The Representative Voice of Hindi Blogs] ब्लॉगप्रहरी एक उम्दा सोच का रिज़ल्ट ही है, आज उस उम्दा सोच के धनी कनिष्क कश्यप से हुई भेंट वार्ता सादर...
my own creation
वही कहते हैं! - अब कोई और काम नहीं रह गया, हर पल तेरे ख्यालों में रहते हैं, खमदार(१) गेसुओं में खोये हुए, दिल की उलझने सुलझाते रहते हैं, ना जाने की इबरत(२) गजरे ने दी थी, बो...
नवगीत की पाठशाला

३०- आँगन में बासंती धूप : अजय गुप्त - शिखरों से घाटी तक सोना सा बिखर गया, आँगन में बासंती धूप उतर आई है। खेतों से पनघट तक कोहरा ही कोहरा था, कहीं नहीं हलचल थी सब ठहरा-ठहरा था। हिम निर्मित चोली ...
काव्यतरंग

यह कैसी प्रतीक्षा.. - पल पल अविरल निर्बाध सदा भावो में बहता रहता है पग पग पर हर दम मखमल सा राहों में साथ वो रहता है कण कण में पृथ्वी के जिसका अस्तित्व समाहित है त्रण त...
यशस्वी

औली के बारे में कुछ - औली उत्तराखण्ड का एक भाग है। यह 5-7 किमी. में फैला छोटा-सा स्की रिसोर्ट है। इस रिसोर्ट को 9,500-10,500 फीट की ऊंचाई पर बनाया गया है। यहां बर्फ से ढकी चोटिय...
नन्हें सुमन

‘‘प्यारी प्राची’’ - *** * *इतनी जल्दी क्या है बिटिया, * *सिर पर पल्लू लाने की।* *अभी उम्र है गुड्डे-गुड़ियों के संग,* *समय बिताने की।।* ** *(चित्र गूगल सर्च से साभार)* *मम्मी-प.
JHAROKHA

यकीन - ** * तुम्हारे यकीं का इंतजार करते करते अब थक चुकी हूं मैं फ़िर भी तुम्हें आया नहीं यकीं मुझ पर अब तक उससे तुम नहीं मेरा आत्म सम्मान टूटता है और मै..
Hindi Tech Blog

यूट्यूब विडियो डाउनलोड करने का औजार - यूट्यूब के विडियो डाउनलोड करने का एक आसान औजार ये सिर्फ विडियो डाउनलोड करने कि सुविधा तो देता ही है उसे कुछ मुख्य विडियो फोर्मेट में बदलने कि भी सुविधा इ...
साहित्य योग

"युवाओं से है मेरी पुकार...सरदार भगत सिंह की कुछ पक्तियों से...." - आज आप को मैं कुछ उन पक्तियों से परिचय कराता हूँ जब सरदार भगत सिंह जेल में अपनी मंगेतर के याद में गाया करते थे. आजीवन तेरे फिराक जुदाई विछोट्र, विरह, नामिल...
ताऊजी डॉट कॉम

फ़र्रुखाबादी विजेता (200) : श्री पी.सी.गोदियाल - नमस्कार बहनों और भाईयो. रामप्यारी पहेली कमेटी की तरफ़ से मैं समीरलाल "समीर" यानि कि "उडनतश्तरी" फ़र्रुखाबादी सवाल का जवाब देने के लिये आचार्यश्री यानि कि ह...
समाचार:- एक पहलु यह भी
मुबारक हो, आज नववर्ष है - आज सुबह से ही दोस्तों और परिचितों के एसएम्एस आने लगे थे. हर रोज की तरह कोई अच्छे दिन की बधाई दे रहा था तो कोई गुड मोर्निंग विश कर रहा था. कुछ मित्रो ने नवर..
उच्चारण
“स्लेट और तख़्ती” - *सिसक-सिसक कर स्लेट जी रही, तख्ती ने दम तोड़ दिया है। सुन्दर लेख-सुलेख नहीं है, कलम टाट का छोड़ दिया है।। **[image: slate00]**[image: patti1]** **[image...
naturica
दौर - ए - बाज़ार, न देखा जाए - बदल डालेंगे साथ आ, अगर तुझसे भी। सूरत-ए- हाल को बीमार, न देखा जाए॥ ब्लॉग पर बहुत दिनों बाद लौट रहा हूँ ....उम्मीद है सभी साथी बाखैरियत होंगे .... नयी ग़ज़...
ज़िन्दगी
तेरे पास - सुन तेरे चेहरे पर गुलाब सी खिली मधुर स्मित नज़र आती है मुझे जब तू दूर -बहुत दूर निंदिया के आगोश में स्वप्नों के आरामगाह में विचरण कर रहा होता है तेरे सीने...
अंधड़ !
अरे भाई जी, किसी ने ये सवाल भी पूछे क्या ? - *जहां तक माया की "माया" का सवाल है, हमारे उत्तराँचल में पूर्वजों के जांचे-परखे दो बहुत ख़ूबसूरत मुहावरे प्रचलित है, जो समय की कसौटी पर खरे भी उतरे है ! इनमे...
simte lamhen
शहीद तेरे नाम से... - बरसों पुरानी बात बताने जा रही हूँ...जिस दिन भगत सिंह शहीद हुए,उस दिन का एक संस्मरण... सुबह्का समय ...मेरे दादा-दादी का खेत औरंगाबाद जानेवाले हाईवे को सटक...
गीत सुनहरे
शहीद - ए - आजम भगत सिंह - 5 - शहीद - ए - आजम भगत सिंह - 5 देश प्रेम का ज्वार भरा था, रोम रोम अंगार भरा था . मन में शोले भड़क रहे थे, स्वतंत्रता को तड़प रहे थे . प्रचण्ड शक्ति संचित कर भाल...
दिनेश दधीचि - बर्फ़ के ख़िलाफ़
कब्रिस्तान में सूर्योदय - कोई नियम नहीं टूटा नहीं विच्छिन्न हुआ कोई वैधानिक प्रावधान एक मनभावन मुस्कान तो थी छतनार दरख्तों के होठों पर लेकिन बारिश से वह नम हो चुकी थी कुछ फीकी और कुछ ...
Alag sa
कबीरदासजी और छत्तीसगढ़ - साहेब बंदगी साहेब का स्वर यदि कभी सुनाई पड़े तो जान लीजिए कि कबीर पंथी आपस में एक दुसरे का अभिवादन कर रहे हैं। सत्यलोक गमन के पश्चात कबीर जी की वाणी का संग्...
पराया देश
सिर्फ़ मर्दो के लिये... एक चुटकला?? - इस चुटकले को सिर्फ़ हंसी ओर मजाक के तॊर पर ले, अगर किसी को पढने के बाद कॊई ऎतराज हो तो अपने लेपटाप पर, या अपने पीसी पर सारा गुस्सा उतारे, कृप्या मेरी टांग न..
गत्‍यात्‍मक चिंतन
क्‍या सचमुच हमारे सोने के चेन में उस व्‍यक्ति का हिस्‍सा था ?? - कभी कभी जीवन में कुछ ऐसी घटनाएं अवश्‍य घट जाती हैं , जिसे संयोग या दुर्योग का पर्याय कहते हुए हम भले ही उपेक्षित छोड दें , पर हमारे मन मस्तिष्‍क को झकझोर ह...
भारतीय नागरिक - Indian Citizen
रिलायन्स वाले ऐसे काटते हैं ग्राहकों की जेब से पैसे... - नमूना पेश-ए-खिदमत है... आप किसी जरूरी कार्य में व्यस्त हैं अथवा यात्रा कर रहे हैं. रिलायन्स के ही किसी अनजाने नम्बर से काल आती है. आप काल रिसीव कर लेते हैं...
my own creation
वही कहते हैं! - अब कोई और काम नहीं रह गया, हर पल तेरे ख्यालों में रहते हैं, खमदार(१) गेसुओं में खोये हुए, दिल की उलझने सुलझाते रहते हैं, ना जाने की इबरत(२) गजरे ने दी थी, बो...
मुक्ताकाश....
दुविधा की देहरी से... - [सच, वह सच कहता है !] साम्प्रदायिकता की बोतलों में संकीर्णता का लेबल चिपका कर कुंठाओं के कार्क लगा तुम मुझे भी उसमें बंद कर देना चाहते हो : मेरे लिए तो बड़ी ...
काव्य मंजूषा

सबने उसे बहुत सताया है... - कई दिन बाद वो घर आया है पर चेहरे से लगता वो पराया है दामन से उसके लिपटे, सो गए आधी रात उसने जगाया है यकीं नहीं उसे मेरी मोहब्बत का सबने उसे बहुत सताया...
An Indian in Pittsburgh - पिट्सबर्ग में एक भारतीय

आल इज वैल - कुछ न कुछ चलता न रहे तो ज़िंदगी क्या? इधर बीच में काफी भागदौड़ में व्यस्त रहा. न कुछ लिख सका न ज़्यादा पढ़ सका. इस बीच में बरेली के दंगे की ख़बरों से मन बहुत आहत...
जीवन के पदचिन्ह
गम है कि जिन्दा हूँ, वरना खुशियों से तो मर जाता - गम है कि जिन्दा हूँ, वरना खुशियों से तो मर जाता तनहाइयों ने थामे रखा, वरना जमाने में किधर जाता सौ बार हुआ क़त्ल रहा फिर भी धड़कता मेरा दिल माजी की थी चाहत...
Science Bloggers' Association
ENVIRONMENTAL MATTERS By- M.K. Bajpai - ENVIRONMENTAL MATTERS By – M.K.BAJPAI/Jhansi Today every living organism is suffering from the pollution hazards in one way or the other, human greed h.
कामन 'वैल्थ' यूपी मैं?


Posted by IRFAN
प्रतिभा की दुनिया ...!!!

वो कौन था मोड़ पर .... - वो याद ही तो थी जो एक रोज मोड़ पर मिली थी. घर के मोड़ पर. वो याद ही तो थी जो गुलमोहर के पेड़ के नीचे से गुजरते हुए छूकर गयी थी. एक कच्ची सी याद उठी साइकि...

अब दीजिए आज्ञा!
धन्यवाद!   नमस्कार!! 

14 comments:

मनोज कुमार said...

सादर अभिवादन! सदा की तरह आज का भी अंक बहुत अच्छा लगा।

कृष्ण मुरारी प्रसाद said...

सलीकेदार..प्रस्तुति....
http://laddoospeaks.blogspot.com

रावेंद्रकुमार रवि said...

बहुत आकर्षक और महत्त्वपूर्ण चर्चा!

sangeeta swarup said...

सुन्दर प्रस्तुति ...

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

आज तो चर्चा का रंग कुछ बदला सा दिखाई पड रहा है....
सुन्दर!!

राज भाटिय़ा said...

शास्त्री जी बहुत सुंदर चर्चा लगी धन्यवाद

'अदा' said...

hamesha ki tarah bahut badhiya ..

Udan Tashtari said...

बेहतरीन विस्तृत चर्चा. बधाई.

Suman said...

nice

डॉ. मनोज मिश्र said...

achhee rhee charcha.

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत बेहतरीन चर्चा.

रामराम.

Tarkeshwar Giri said...

ek acchi pahel ke li thanks.

वन्दना said...

bahut hi sundar aur badhiya chittha charcha.

Dinesh Dadhichi said...

अच्छी रही चर्चा.

पसंद आया ? तो दबाईये ना !

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