सबसे पहले राजतन्त्र पर गिरीश पंकज जी की टिप्पणी पढ़िए.........
Wednesday, April 07, 2010
खुनी रेड हंट---कुछ टिप्पणियों की चर्चा----ललित शर्मा
सबसे पहले राजतन्त्र पर गिरीश पंकज जी की टिप्पणी पढ़िए.........
10 comments:
- Akshitaa (Pakhi) said...
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खून-खराबा बहुत गलत चीज होती है. मैं तो इसे टी.वी पर देखकर भी डर जाती हूँ.
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'पाखी की दुनिया' में जरुर देखें-'पाखी की हैवलॉक द्वीप यात्रा' और हाँ आपके कमेंट के बिना तो मेरी यात्रा अधूरी ही कही जाएगी !! -
April 7, 2010 at 12:52 PM
- संगीता पुरी said...
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क्या कहूं .. नि:शब्द हूं !!
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April 7, 2010 at 1:49 PM
- IMAGE PHOTOGRAPHY said...
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अब कहने क्या बचा है ।
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April 7, 2010 at 1:58 PM
- Randhir Singh Suman said...
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nice
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April 7, 2010 at 4:54 PM
- ताऊ रामपुरिया said...
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बहुत दुखद, शहीदों को श्रद्धांजली.
रामराम. -
April 7, 2010 at 9:28 PM
- डॉ. मनोज मिश्र said...
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नि:शब्द.
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April 7, 2010 at 10:17 PM
- Anil Pusadkar said...
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ललित बहुत दिनो से सोच रहा था था कि तुमसे कुछ कहूं आक लेकिन अवसर आ गया है कि इस बारे मे कुछ कहा जाये।अफ़सोस की बात है की तुम्हारे आपस के झगड़े ने ने छत्तीसगढ मे ब्लागरों को दो गुटों मे बांत दिया है।तुम लाख दुहाई दो की तुम इससे अलग हो मगर तुम्हारी चर्चा का पैमाना बता देता है की तुम लोगों का हिडन एजेंडा क्या है?आईंदा मेरी पोस्त का लिंक देने की मेहरबानी मत करना बहुत दिनो से देख रहा हूं तुम लोगों का घिनौना खेल।एक दूसरे की पी्ठ थपथपाओ बस्।मेरी पोस्टो की उपेक्षा का सुनियोजित षड़यंत्र समझ रहा हूं मैं।तुम्हे किसी से नाराजगी है तो उससे मधुर संबंध रखने वालों को किनारे करने का तरीका बहुत पुराना अपनाया है तुमने।बेहद अफ़सोस की बात है जो पोस्ट ब्लागवाणी मे टापे चल रही हो उसे ठिकाअने लगाने की गरज़ से आपने चर्चा टिपण्णी पर केन्द्रित कर दी और उस मे भी किसको आगे लाने है और किसे पीछे करना है तय कर लिया था आपने।ऐसी ही घटिया हरकतें ब्लाग जगत को कम्ज़ोर कर रही हैं।दम है तो इस टिपण्णी को पब्लिश्ज करके दिखाना और एक कृपा औएर करना मेरे ब्लाग का लिंक कभी मत देना मुझे तुमहारे षड़यंत्र से नफ़रत है।अपने साथियों को भी बता देना मैने उन्हे पहचान लिया है।अलविदा ललित्।
-
April 8, 2010 at 1:07 AM
- Anonymous said...
-
@ अनिल पुसदकर
>> आपस के झगड़े ने ने छत्तीसगढ मे ब्लागरों को दो गुटों मे बांत दिया है।
>> बहुत दिनो से देख रहा हूं तुम लोगों का घिनौना खेल।एक दूसरे की पी्ठ थपथपाओ बस्।
>> मुझे तुमहारे षड़यंत्र से नफ़रत है।
>> अपने साथियों को भी बता देना मैने उन्हे पहचान लिया है।
मुझे आपकी इन बातों पर, इस भाषा पर अफ़सोस ही है। जानता हूँ कि यह आपकी फितरत नहीं लेकिन इससे अधिक कुछ कह नहीं पाऊँगा
ललित शर्मा के साथिओं का नाम भी लिख देते तो बड़ी मेहरबानी होती। टिप्पणी की सार्थकता पूर्ण हो जाती
बी एस पाबला -
April 9, 2010 at 4:42 PM
- Girish Kumar Billore said...
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शोक महाशोक
पर ये क्या पुसद्कर जी
ये क्या हुआ ?
चलिये छोडिये
सुमन जी के लिये ये भी नाइस रहा
अब तो क्या कहें -
April 9, 2010 at 8:13 PM
- Rajeev Nandan Dwivedi kahdoji said...
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मन में बहुत कुछ है पर ...अभी आहत हूं...हर मृत्यु एक गहरा ज़ख्म छोड़ जाती है मेरे अन्दर
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April 10, 2010 at 11:28 PM
पसंद आया ? तो दबाईये ना !
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हमारे पैरा मिलिट्री फोर्सेज के जवानों को सरकार ने सिटिंग डकस समझ लिया है...नक्सलवाद के तंदूर में भुनने के लिए छोड़ दिया है...तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्ता यही चाहते हैं न ये सिटिंग डकस चुपचाप भुनती रहे और आवाज़ भी न करें...
बहुत दुःख की बात है...