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Saturday, December 19, 2009

मैं रुका रहा किसी बाँस की डाली की तरह.. (चर्चा हिन्दी चिट्ठों की )




अंक : 114
प्रस्तुतकर्ता : हिमांशु । Himanshu

"मैं रुका रहा
किसी बाँस की डाली की तरह
हवा के सामने झुका रहा
और आवाज सुनता रहा एक
कि नति ठीक है
मगर मना नहीं है तुम्हारे लिये गति
हमने तो तुमसे उन्नत होने के लिये कहा है
विरति की बात कहाँ कही है हमने
रत रहने के लिये कहा है हमने तो तुमसे
सुनने को सुनता रहा मै यह आवाज
मगर समझ लिया मैंने
कि यह एक सलाह है
अपनी एक राह है मेरी
रुकने की और झुकने की
किसी न किसी जगह
पूरी तरह चुकने की ।"

दो दिन पहले  कहा था शास्त्री जी ने - " कल की चर्चा आराम फरमा रहे लोग करेंगे ।" मुझे लगा, यह मुझे ही  कहा जा रहा है (वैसे आराम मैं ही नहीं फरमा रहा था केवल !) । चर्चा करनी चाही ।  कर न पाया । नित्य और अनित्य के बीच झूलता रहा है मेरा यह चर्चा कर्म । एक नयी प्रवृत्ति को अख्तियार कर लेना, फिर उस पर समर्थ गतिशीलता रखना - चुनौती है यह ! चर्चा करते हुए मन दूर-दूर उड़ता है, बहुत कुछ कहना चाहता है । चिट्ठे पढ़ते हुए (चर्चा करते वक्त) लगता है जैसे मेरे अन्तस के बहुविध स्वर इन चिट्ठों के स्वर से तादात्म्य कर बह रहे हैं , और फिर चर्चा कर्म पीछे छूट जाता है । उठा नहीं पाता हूँ वह दुःसह भार जो इन चिट्ठों की अभिव्यक्ति से हृदय पर जमा हो जाता है । कारण इनके लिये अभिलषित, सुयोग्य अभिव्यक्ति का न मिलना है । चिरराजित एवं अनभिव्यक्त स्वरों का न उभर पाना अपूर्णता की प्रतीति देने लगता है । महसूस करता हूँ, ’हूँ ही नहीं ।" यह छटपटाहट तब तक तारी रहती है जब तक यह अभिव्यक्ति के प्राण-स्वर Outlet Vent (निकास-मार्ग) नहीं ढूँढ़ लेते ।

ब्लॉग-जगत ने जो कुछ भी देखा इन दिनों (मोह-व्यामोह, अपने तुम्हारे का अतिरेकी गान, अबूझ-सा दर्प, नियंत्रण से निकल गयी अभिव्यक्ति, पूर्वाग्रह के विकसते कण्टक, संवेदना के अस्पष्ट आशय, पलायन-पुनरावतरण, आग्रह-निग्रह और भी न जाने क्या-क्या ) उसने विचलित किया ! हम इस नये अभिव्यक्ति के माध्यम का उत्सव मना रहे हैं । इसे हमने ही शक्ति दी है, हमने ही सजाया है - हम ही इसे प्राण देंगे ! चाहिये बस समष्टि हित का ध्यान रखता हुआ तदनुरूप अभिनव आत्मानुशासन ! सबका अधिकार है यह । अनुशासन और संयम तो प्रतीति के बंधन हैं - सब के हित के निमित्त । क्या इससे किसी के स्वातंत्र्य में व्यवधान पड़ेगा ! अज्ञेय ने लिखा है एक जगह -
"उत्तरोत्तर लोक का कल्याण ही है साध्य
अनुशासन उसी के हेतु है ।"

जरा और पढ़ लें ’अज्ञेय’ को (चिट्ठाकारी समझने के लिये ही न !) -
"तुम्ही दाता हो, तुम्हीं होता, तुम्हीं जजमान हो,
-- यह तुम्हारा पर्व है ।
----------------------------------------------
श्रष्टा तुम्हीं हो इस नये रूपाकार के !
तुम्हीं से उदभूत होकर बल तुम्हारा
साधना का तेज - तप की दीप्ति,
तुम को नया गौरव दे रही है !"


अरे ! गौरव-चिह्न तो दिखा ही नहीं पाया आपको । यह रही चिट्ठों की प्रस्तुति । पहला नाम वह है, जिसके हाथ झटकते हुए भी कह दिये जाने वाले लापरवाह वाक्य-छंद आपको सम्मोहित किये जायेंगे । गति अविरत, मति स्थिर है इनकी । दूसरा गिरिजेश राव ! आप सहमत होंगे न इस बात से कि क्या एक गिरिजेश राव ने कम कहर ढाया है कि दूसरा ले आये ! चलिये सुभीते के लिये इन्हें इनके नाम से ही पुकारते हैं, इनका क्लेम न रहे कि "पहचान तो हमारी भी जबरदस्त है, दूसरे के नाम से क्यों बुला रहे हो?" । अमरेन्द्र जी की बात कह रहे हैं हम । अवधी के हस्ताक्षर बनने वाले हैं यह । पहले ’कुछ औरों की ’ फिर ’कुछ अपनी’ कहते हैं । यह देखिये आज की पोस्ट -




 अंतिम आकांक्षा
'आचार्य रामचंद्र शुक्ल ( १८८४-१९४१ ) :
आचार्य रामचंद्र शुक्ल का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है | आज हम हिन्दी साहित्य के इतिहास को आचार्यवर से अलग करके नहीं देख सकते | हिंदी साहित्य के इतिहास के 'काल- विभाजन' और 'नामकरण' दोनों में हम उनके प्रति कृतज्ञ  हैं | इसके अतिरिक्त शुक्ल जी हिन्दी
साहित्य के प्रथम व्यवस्थित आलोचक हैं | ' व्यावहारिक' और 'सैद्धान्तिक', दोनों तरह की आलोचना को उन्होंने संस्कार दिया | निबंध लेखन में शुक्ल जी एक युग का प्रतिनिधित्व करते हैं यानी 'शुक्ल युग ' |


ठीक यहीं अपने अतीत का वैभव निहारते अवनीश मिश्र और काम के देवता कामदेव की कथा कहते जी०के०अवधिया की ठौर मिलेगी  -


नयी इबारत पर अवनीश मिश्र और धान के देश पर जी० के० अवधिया -
नालंदा महाविहार:इतिहास आपके सीने में उतरता है 
कामदेव याने कि सेक्स के देवता ..
आज से लगभग 800 साल पहले इस विश्व के सबसे पुराने और  सबसे  बड़े आवासीय विश्वविद्यालय को तुर्क हमलावर बख्तियार खिलजी ने भारी क्षति  पहुचाई और नालंदा महाविहार धीरे -धीरे ना सिर्फ समय और  विस्मृति के मलवे में, बल्कि सचमुच के ईंट- पत्थर और मिट्टियों  के भीतर  दफन हो गया ..रेत पर पड़े आदमी  के पैर   के निशानों की तरह ज्ञान के इस भव्य केंद्र का  नामोनिशान ही मिट गया.. लेकिन कुछ निशाँ समय के निर्मम चोटों से पूरी तरह मिटते नहीं हैं बल्कि फिर से झाँकने लगते हैं ...दरअसल वैसे निशाँ जो सिर्फ जमीन पर नहीं होते बल्कि जमीन के भीतर तक धंसे होते हैं..वे निशाँ जिनकी जड़ें होती हैं ,सदियों की झुलसती सुखाड़ को भी झेल लेने का माद्दा  रखते  हैं , हैं और फिर उग आते  है.
कामदेव याने कि सेक्स के देवता ...उनके प्रभाव से भला कोई बचा है?
तुलसीदास जी लिखते हैं:
    "सम्पूर्ण जगत् में स्त्री-पुरुष संज्ञा वाले जितने चर-अचर प्राणी थे वे सब अपनी-अपनी मर्यादा छोड़कर काम के वश में हो गये। वृक्षों की डालियाँ लताओं की और झुकने लगीं, नदियाँ उमड़-उमड़ कर समुद्र की ओर दौड़ने लगीं। आकाश, जल और पृथ्वी पर विचरण करने वाले समस्त पशु-पक्षी सब कुछ भुला कर केवल काम के वश हो गये। सिद्ध, विरक्त, महामुनि और महायोगी भी काम के वश होकर योगरहित और स्त्री-विरही हो गये। मनुष्यों की तो बात ही क्या कहें, पुरुषों को संसार स्त्रीमय और स्त्रियों को पुरुषमय प्रतीत होने लगा।"

आनन्द देव जी (पेशे से पत्रकार) ने ब्लागिन्ग की शुरुआत कर दी है ..और प्रकाश डाले है तेलान्गना के बटवारे को लेकर हुए विवाद के बाद उत्तर प्रदेश मे चल रहे पुर्वांचल के बटवारे की बात को लेकर…आप सबसे निवेदन है कि आनंद जी के ब्लाग पर जाकर  स्वागत करे और उन्हे नियमित लेखनी के लिये प्रेरित करे ..धन्यवाद

विकास का कौन सा सपना देख रहे है पूर्वांचल की वकालत करने वाले लोग ?  आनंद देव..

वैसे तो पूर्वांचल राज्य के गठन की मांग काफी लम्बे समय से चली आरही है लेकिन बीच में यह आन्दोलन कमजोर पड़ गया था । लेकिन इधर तेलंगाना की बहस छिड़ते ही इस image बुझते आन्दोलन को जैसे नई ऊर्जा मिल गयी है । मुख्यमंत्री मायावती ने भी जोर सोर से छिड़ी इस बहस की आग में तपते तवे पर राजनीति की रोटी सेंकने में कोई कोर कसार बाकी नहीं रखी और उन्हों ने केंद्र सरकार को आनन् फानन में प्रस्ताव भी भेज दिया । अब सवाल यह उठता है की पूर्वांचल राज्य के गठन की वकालत करने वाले लोग आखिर किस विकास का सपना देख रहे है ? क्या पूर्वांचल या फिर पूरे उत्तर प्रदेश की दुर्दशा का कारण यही है की इसकी गिनती रकबे की दृष्टी से बड़े राज्यों में होती है ?

राजनीतिक कौशल दिखाने के अवसर बढ़ते हैं, अगर दो-तीन 'योग्य' विधायक हों तो वे सरकार गिरा सकते हैं या बना सकते हैं. एक रिटायर हो रहे नेता के लिए गर्वनरी का विकल्प भी उपलब्ध होता है. झारखंड के मुख्यमंत्री रहे मधु कोड़ा इस बात के ताज़ा उदाहरण है । मेरा मतलब कि अगर आप छोटे राज्य का एकेडेमिक आधार पर समर्थन करते हैं तो कोई एतराज़ की बात नहीं है, अगर आप उसे करियर ऑप्शन के तौर पर देख रहे हैं तो आपका भविष्य उज्ज्वल हो सकता है.लेकिन छोटे राज्य के सहारे अगर गरीबी दूर करने ,विकास की गंगा बहाने की सोच रहे है तो बिहार, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश से टूट कर अलग हुए झारखंड ,छत्तीस गढ़ और उत्तरा खंड की आम आवाम की राय लेनी चाहिए ।

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अरविन्द जी के साथ दुर्घटना घट गयी, लताड़ दिये गये, यद्यपि बात सही ही कह गये थे, शब्द सही ही प्रयोग कर दिया था । विडम्बना के हाँथ आपकी तरफ बढ़ ही जाते हैं । लिखते हैं कुछ, मतलब कुछ निकलता है । विमर्श के लिये प्रविष्टियाँ लिखते हैं, होने लगता है संघर्ष ! अब कोई क्या करे ! खैर आज यह बात नहीं । आज तो निष्कर्ष निकलता दिख रहा है । आप यहाँ देख लें -


 क्या विवाहिता को सुश्री कहना अनुचित है?
एक सज्जन ने मुझे लताड़ा है कि मैंने विवाहिता के लिए भी सुश्री का संबोधन दिया है जो कि गलत है! सुश्री का संबोधन केवल अविवाहिता के लिए ही होना चाहिए! यह मामला अब मैं ब्लॉग जगत की महापंचायत में रख रहा हूँ -अपनी समझ बुद्धि के अनुसार मैंने उन्हें यूं समझाया है -
"मैं समझता हूँ कि सुश्री चूंकि वैवाहिक स्थिति को नहीं दर्शाता इसलिए आधुनिक रीति रिवाज में यह विवाहित महिलाओं  के लिए भी प्रयुक्त होता है ....
क्या कहते हैं प्रबुद्धजन ,शिष्टाचार नियामक और पंच लोग ? 

अरविन्द जी की प्रविष्टि की चर्चा कर लेने के बाद क्या यह कविता मौजूँ नहीं ! संवाद घर के संजय जी मेरे पसन्दीदा चिट्ठाकारों में एक हैं । उनकी प्रत्येक प्रविष्टि में ’आभ्यंतर सार-तत्व परिवर्तित युग-बोध के अनुरूप नये साँचे में सुगमता से ढला’  मिलेगा । उनका व्यक्तित्व नयी मर्यादाओं के जामे तलाशता है और अपने को किंचित रूपांतरित कर ’फिट’ बैठा देता है । पढ़िये कवितायें उनकी, आनन्दित होईये -



संजय ग्रोवर : संवाद घर
कुछ खुरदुरी सी दो गज़लें /
कुछ बुरी-सी दो गज़लें
जोकि ये समझ रहे हैं मुझे कुछ पता नहीं   है
उन्हें जाके ये बता दो उन्हें ख़ुद पता नहीं है
यूंही ख्वाहमख्वाह ही डरके कोई बात मान लेना
इसे तुम हया न समझो, हरगिज़ हया नहीं है
दुत्कारना दलित को, चालू को चाट लेना
जो इसी को जीत समझे कभी जीत़ता नही है



दिखा जो उनको कीचड़
लिथड़ गए सब लीचड़
ठग-वग की जगमग से,
चमक रहा है प्रांगण
पढ़े-लिखे नंगों से
सहम गए हैं अनपढ़ 
फ्यूज़-उड़े-कट-आउट
कड़क रहे हैं कड़-कड़

संजय जी की कविता के बाद मुकेश कुमार तिवारी जी की कविता (मोस्ट अपीलिंग ) और आराधना चतुर्वेदी (मुक्ति) की कविता का सम्मानपूर्वक उल्लेख कर रहा हूँ  । मुकेश जी की कविता की सम्पदा उसकी गहरी संवेदना है । हार्दिक अनुभूतियों का बहुरंगा कलेवर मिलेगा यहाँ । मुझमें विचारने, कहने की सामर्थ्य कहाँ ?
मुक्ति जी की कविता का अपना अलग स्वभाव है । नारी की सहज छवियों को अर्थपूर्ण बना देती हैं इनकी कवितायें । आप इन दोनों विभूतियों की कविताओं का रसास्वादन करें -



कवितायन पर मुकेश कुमार तिवारी और फेमिनिस्ट पोएम पर मुक्ति
कोई अकेला तो नहीं बूढ़ा होता
पर... माँ
हमारे
बीच सभी कुछ
भाग रहा हो हड़बड़ी में
जैसे दीवारें मचलती है
मुँह बाये नये रंगों के लिये
या बाल धकेल रहे हों
खिज़ाब को अपने से परे
केवल एक उम्र का फासला स्थिर है
और हम बुढ़ा रहे हैं
एकसाथ
बाबूजी का लाड़
अपने जैसा था
भाई का प्यार भी
अनोखा था
बहन के स्नेह का
कोई सानी नहीं / पर
इन सबसे बढ़कर था माँ
थपकी देकर
सुलाते हुये तुम्हारा
मेरे सिर पर
हाथ फेरना.


अब मिलवाता हूँ आपको जॉर्जिया ड्वेट से । ये हमारे देश की नहीं हैं । डच हैं, पर रहने वाली हैं बेल्जियम की । हिन्दी बोलती हैं, लिखती हैं । अपनी हिन्दी के लिये उन्होंने एक विश्लेषण चुना है बिन्दास ! पहली बार जाना गिरिजेश जी के भेंजे लिंक से । फिर यहाँ विस्तार से प्रविष्टि थी उनके बारे में - राजू बिन्दास ने बिन्दासियत को सम्मान दिया था । सोचने लगा, हिन्दी में कशिश है - बेल्जियम वासी भी खिंचे चले आते हैं । बात अलग है कि हम भारतीय हिन्दी को लेकर कहाँ-कहाँ नहीं उलझे/ उलझ रहे हैं । मैं पढ़वाता हूँ आपको उनकी ताजा दो प्रविष्टियाँ और आमंत्रित करता हूँ उनके ब्लॉग पर नियमित भ्रमण के लिये-



घीसू और माधव
हमारी रानी का महल
आजकल फिर प्रेम चंद का मशहूर कफ़न पढ़ना शुरू किया...जब मैं अपने देश में हिंदी पढ़ती थी, उस वक्त पहली मुलाक़ात हुई थी मेरी, घीसू और माधव से। लगता है कि प्रेम चंद के लफ्स बार-बार पढ़कर आजकल एक और, एक ख़ास, और पहले से अलग अहसास और असर मेरे अंदर पैदा करते रहते है। पढ़ने में, लगता है कि ज्यों-ज्यों घीसू और माधव अचानक असली व्यक्ति होते जा रहे हैं। जैसे उनकी शकल मेरे तरफ फोकस्ड हैं, जैसे मेरे तरफ देखते रहते है और घूरते रहते है, जैसे रोज़ मेरी तरफ होता है, जब मैं हजरतगंज या चौक या अमीनाबाद के मोहल्ले में घुमा करती हूँ। लगता है कि हर दिन मैं घीसू और माधव कि नज़र से मिलती हूँ, हज़ारों एकदम हिन्दुस्तानी आँखों से माधव और घीसू कि तस्वीर नजर आती हैं। यह तो एक बिलकुल पूरानी कहानी है, स्थितियां पूरानी, एक पुराना ज़माना और शायद एक पूर्व ज़माना...या यूं कहूँ "शायद ही एक पुराना या पूर्व ज़माना ।
आदिमुझको नहीं पता कि लुक्नाऊ में एक रानी जीती थी। और उनका एक महल नहीं लेकिन दो महल थे । मैं सिर्फ एक अजनबी हूँ तो मैं जान नहीं सकती महाल कि अंदर सही-सही क्या क्या हो रहा है। फिर भी मुझको उत्सुकता हो रही है। बहार से मैं देखती हूँ कि महल के आसपास काफी मजबूत आदमी फिर रहे है, fancy and flashy अम्बसदोर गाड़ी चल रही हैं, काफी लोग अन्दर सफाई कर रही है और महाल पर बहुत कम हो रहा है।

हमारे यहाँ की कहानियें में, रानियाँ कभी ज़ालिम कभी अच्छी हो सकती हैं। अगेर वह ज़ालिम होती तो उनका ज़ुल्म कल्पना के बहार होता। आमतौर पर, fairytales में, ज़ालिम रानी की बेटी भी होती है, लेकिन वह हमेशा एक पूर्व पत्नी की है। वह बेटी बहुत खुबसुरत होती है, और आखिर में, उसके घोड़े पर चलते हुए वीर की मदद से ज़ालिम रानी की महल से बच सकती है ।




अब मानसी जी के ब्लॉग से  उनकी नयी प्रविष्टि और ’अदा ’ की काव्य-मंजूषा से बिलकुल अलहदा-सी प्रविष्टि की झलक देखें -

मानसी पर मानसी तथा काव्य-मंजूषा पर स्वप्न-मंजूषा शैल
मैं छोटे, बड़े सभी को सम्मान दूंगा
मेरा घर, मेरे बच्चे 
पिछले साल, मैंने अपने स्कूल में बुलींग प्रिवेन्शन को लेकर काफ़ी काम किया था।  कई वर्कशाप में जाकर मैंने जाना कि मनोवैज्ञानिक या साइकोलॉजिकल बुलींग बहुत खतरनाक होती है, और बच्चों में, ख़ासकर लड़कियों में होती पाई जाती है। विशेषकर उनके साथ जो स्कूल में नये आते हैं।  उनको अनदेखा करना, अलग-थलग कर देना, बात न करना, मुँह फेर लेना आदि...और मैं सोचती थी, बड़ों की दुनिया कहाँ अलग है?
आज सुबह स्कूल में  ’आज का विचार’ पढ़ा गया, " मैं छोटे, बड़े सभी को सही सम्मान दूँगा।"
इन दिनों कुछ भी नया लिखने के लिए समय ही नहीं मिल पा रहा है...कारण मेरा छोटा बेटा मृगांक शेखर हॉस्टल से आया है....
और जैसा की आप जानते हैं बच्चे हॉस्टल से आयें तो सबसे ज्यादा खाने की ही बात होती है...कि क्या-क्या खिलाया जाए.... इसलिए ज्यादातर समय खाना बनाने और खिलाने में ही जा रहा है....हर दिन नई नई फरमाईश .... अपने खाने-पीने के मामले में मृगांक बहुत ही संयत है...लेकिन घर आते साथ ही सारा अनुशासन धरा का धरा रह जाता है...कहाँ मिल पता है उसे घर जैसा खाना ?

जगदीश्वर चतुर्वेदी जी के चिट्ठे पर वैचारिक विमर्श का सामान सदैव तैयार मिलेगा । आज वहाँ प्रविष्टि है स्त्रीवादी आलोचिका सुधा सिंह जी की लेखनी से निःसृत, गौर फरमायें -

आज सारे भारत में उच्च शिक्षा के स्तर पर सेमेस्टर प्रणाली लागू करने की कवायद चल रही है। यू जी सी का दबाव है और दण्डानुशासन जनित भय भी कि लगभग हर विश्वविद्यालय का प्रशासन इसे लागू करने की प्रक्रिया आरंभ कर चुका है। इस प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा है पाठ्यक्रम में बदलाव। अब तक का जो पाठ्यक्रम चला आया है , जिसे पढकर मेरी पीढी और मेरी माँ की पीढ़ी बडी हुई है ,उससे स्त्री की कोई छवि निर्मित नहीं होती। बारह चौदह वर्ष की पढाई करने के बाद अगर प्रश्न किया जाए कि हमने जो अध्ययन किया उसके आधार पर बताएँ कि स्त्री कैसी थी, उसका संसार कैसा था, वह कैसे सोचती थी तो उत्तर नकारात्मक होगा। न तो इतिहास, न भाषा का अध्ययन,  न खानापूर्ति के अलावा समाजशास्त्र स्त्री के बारे में कुछ बताता है। 

 वर्षा की प्रविष्टि पढ़िये उनके ब्लॉग पर, पढ़ते हुए कुछ-कुछ पूजा उपाध्याय याद आयीं -
"ज़िंदगी की पिकनिक खत्म होने लगी थी। नौकरी हासिल करने की मुश्किल भरी चुनौती सामने थी। मैं पहले यूनिवर्सिटी जाती फिर एक टुच्ची सी जगह पर दो-तीन घंटे की नौकरी पर। पैसे तो नहीं मिलते, अनुभव जरूर हासिल होता। नौकरी के लिये भी अपने स्कूटर पर सवार होकर इधर-उधर के खूब धक्के खाये। इंटरव्यू दिये।
दरअसल मेरे हिसाब से ड्राइविंग से आपके पास विकल्प तो बढ़ते ही हैं, मानसिक दृढ़ता भी बढ़ती है, सड़क पर दौड़ती गाड़ियों को ओवरटेक करने के साथ आप ज़िंदगी को ओवरटेक करना भी सीखते हैं। आगे बढ़ना सीखते हैं। मुश्किलों से जूझना सीखते हैं।
साहित्यकारों, विभूतियों पर केन्द्रित स्वतंत्र चिट्ठे अभी बहुत नहीं हैं हिन्दी में जिन पर उस विशेष विभूति के व्यक्तित्व-कृतित्व का सर्वांगीण परिचय मिले । ऐसा ही एक उल्लेखनीय़ चिट्ठा शुरु किया है अनिल कांत ने ’मिर्जा गालिब’ पर । स्वाभाविक ही था कि अनिल जी गालिब को चुनते -

उनकी हास्यप्रियता और एक मित्र की सिफारिश ने उनकी रक्षा की । हुआ यूँ कि जब गोरे मिर्ज़ा को गिरफ्तार करके ले गये तो अँग्रेज सार्जेंट ने इनकी अनोखी सज-धज देखकर पूंछा कि "क्या तुम मुसलमान हो ?" मिर्ज़ा ने हंसकर जवाब दिया "मुसलमान तो हूँ पर आधा ।" वह इनके जवाब से चकित हुआ । पूछा "आधा मुसलमान कैसे ?" मिर्ज़ा बोले "साहब, शराब पीता हूँ ; सूअर नहीं खाता ।"

एक और महत्वपूर्ण प्रविष्टि से आप का परिचय कराता चलूँ । दिल-ए-नादाँ ब्लॉग पर गीतकार शैलेन्द्र के कृतित्व को रेखांकित करती जानदार पोस्ट है यह -
हिंदी का जो रंग शैलेंद्र जमाने में कामयाब हुए उसकी मिसाल नहीं। कैफी, साहिर और मजरूह जैसे गीतकारों ने भले ही अपनी अपनी शायरी में प्रलेस के मूल्यो को थोडा बहुत अपनाया लेकिन सिने गीत लेखन के क्षेत्र में वे पारसी थियेटर के गीत लेखन की परंपरा की कडी को ही मजबूती देते देखे गए। कहें तो देवनागरी लिपि में हिंदी की प्रतिष्ठा स्थापित कराने वाले शैंलेंद्र पहले गीतकार थे। हिंदी पट्टी यानी पूरब का रंग शैलेंद्र के बाद किसी के यहां नहीं देखने को मिला।

चलते-चलते दो तकनीकी प्रविष्टियाँ और इति-श्री !


हिन्दी ब्लॉग टिप्स और हिन्दी टेक ब्लॉग की प्रविष्टियाँ -
क्या आप अपनी सारी टिप्पणियां पढ़ना चाहेंगे?
ब्लॉगर विजेट : स्क्रऑल करते फॉलोवर्स
आज ब्लॉग सर्फ़िंग के दौरान अचानक श्रीश पाठक 'प्रखर' जी की इस पोस्ट पर नज़र पड़ी- मेरी सारी टिप्पणियां इकठ्ठी हो सकती हैं क्या...? पोस्ट पढ़कर पता चला कि विभिन्न चिट्ठों पर की गई टिप्पणियां किसी धरोहर से कम नहीं। उन्हें फ़िर से पढ़ना मतलब पुरानी यादों

अपने फॉलोवर्स को दिखाए नए रूप में, आपके सभी फॉलोवर्स एक एक करके आते हुए दिखाई देंगे ।
इसमें आप अपने ब्लॉग या साइडबार के आकार के अनुसार इस विजेट को व्यवस्थित कर सकते हैं
फॉलोवर्स की संख्या बदल सकते है, फॉलोवर्स के फोटो का आकार भी बदल पाएंगे।



बस इतना ही ! शेष फिर !

Wednesday, November 11, 2009

मोटापा - सेब जैसा या नाशपाती जैसा... (चर्चा हिन्दी चिट्ठों की )


अंक : 74
प्रस्तुतकर्ता : हिमांशु । Himanshu

"मैं
प्रयास केवल इसलिये नहीं करता
कि बस सफल ही हो जाऊँ
मैं
प्रयास इसलिये भी करता हूँ
कि सफलता से मेरी दूरी
मुझे कुछ कम लगे
निरर्थक, निरुद्देश्य जीवन
जीवन में गति कम न लगे
मैं प्रयास और प्रयास
इसलिये भी करता हूँ ।"

 चर्चा के इस जिम्मेदारी भरे प्रयास को लेकर मन कई बार औचित्य-अनौचित्य के बीच झूलता रहा है ।  आज जब कुछ अवकाश के बाद चर्चा लेकर उपस्थित हूँ तो सामने 1000 प्रविष्टियों वाली चिट्ठा-चर्चा का बहुरंगा कलेवर सामने खड़ा हो गया है । अतीत का व्यामोह है ही ऐसा कि हम उससे निवृत्त हो ही नहीं सकते । परम्परा का आग्रह ही है जिसने मुझे इस कर्म में प्रवृत्त कर दिया है । चिट्ठा-चर्चा की हजारवीं पोस्ट लिखते हुए मेरी प्रिय चिट्ठाकार कविता जी जब यह लिखती हैं कि -

"चर्चा के इस मंच के इतिहास को इन  अर्थों में बारम्बार दुहराना प्रासंगिक ही नहीं अवश्यम्भावी भी है कि आने वाले समय में इस नए इलेक्ट्रोनिक माध्यम को जनप्रिय बनाने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अपनी परम्परा ( भले ही वह चार-छह-आठ-दस वर्ष पुरानी ही क्यों न हो) विदित होनी चाहिए | "

तो कहीं से भी इस परम्परा से विलग होने का जी नहीं करता । नामवर सिंह याद आते हैं (विवाद के लिये नहीं )। कविता के नये प्रतिमान की शुरुआत ही होती है इन पंक्तियों से -
"बौद्धिक जिज्ञासा यदि उच्च से उच्चतर स्तर पर अविश्रान्त भाव से आरोहण करती है और सत्य को स्पष्ट एवं स्पष्टतर रूप में देख पाती है तो इसका कारण पूर्व लेखकों द्वारा निर्मित चिन्तन की सोपान परम्परा है ।

प्रमेय के सिन्धु को पार करने के प्रथम प्रयत्न, भले ही निरवलम्ब रहे हों, निश्चय ही विस्मयकारी हैं । परन्तु जब पूर्वसरियों ने सन्मार्ग दिखला दिया तो सेतुबंध अथवा पुर (नगर) की प्रतिष्ठा का कार्य विस्मयकारी नहीं रह जाता ।"
चर्चा का यह नवीन मंच भी वस्तुतः प्रकारान्तर से सत्य को स्पष्ट एवं स्पष्टतर रूप में देख पाने की एक कोशिश है और वस्तुतः वर्तमान से कदमताल करता हुआ भी परम्परा-संयुत यह मंच भविष्य की ओर उन्मुख होगा, इस विश्वास के साथ प्रस्तुत करता हूँ चिट्ठा चर्चा की हजारवीं पोस्ट की बधाईयों-केन्द्रित प्रविष्टियों का लिंक -


उड़न तश्तरी पर समीर लाल समीर और जोगलिखी पर संजय बेंगाणी -
चिट्ठाचर्चा और मैं.. 
बहुत याद आता है धृतराष्ट्र संग बतियाना
बहुत यादगार पल गुजरे चिट्ठाचर्चाकार मण्डली के सदस्य की हैसियत से. कभी मतभेद भी हुए, हिन्द युग्म में कॉपी पेस्ट का ताला लगा तो अच्छा खासा तूफान भी खड़ा किया इसी मंच से. फिर सब मामला रफा दफा हो गया. उस वक्त के विवादों में अच्छाई यह होती थी कि न तो कभी वो बहुत व्यक्तिगत हुए न ही कभी दीर्घकालिक. अनेक मुण्डलियाँ रची गई, लोगों द्वारा पसंद की गईं.
शुक्लजी ने यह प्रविष्टी जबरिया लिखवाई है :) कहा लिखो… तो क्या मजाल टाल देते…सो लिखी है. बाकी हम तो फ्लू से परेशान है, दर्द निवारक दवा निगल कर हिन्दी-मराठी जूतम पैजार पर अपने अलग दृष्टिकोण पर लिखने की सोच रहे थे, मगर मौका थोड़ा भावनाओं से जुड़ा हुआ था. अतः यह पोस्ट लिखी है. चिट्ठाचर्चा दीर्घकाल तक जारी रहे हमारी शुभकामनाएं.


मेरा पन्ना और नारी ब्लॉग पर चिट्ठा-चर्चा को बधाई व सुझाव -
चिट्ठा चर्चा और मेरे अनुभव
बधाई की केक हाजि़र हैं 
मेरे कुछ सुझाव है :
    * चिट्ठा चर्चा का मासिक अंक निकालना चाहिए, जिसमे उस महीने के अच्छे चिट्ठों के बारे में उल्लेख हो।
        * ब्लॉग मेला, कहानी लेखन प्रतियोगिता टाइप के आयोजन चिट्ठा चर्चा के तत्वावधान मे किए जाने चाहिए।
    * नए चिट्ठाकारों को आगे लाने के लिए उनको चिट्ठा चर्चा मे शामिल किया जाना चाहिए।
पसंद चर्चा करने वालो की ही ना हो चर्चा करते समय , चर्चा हो उन मुद्दों की भी जिन पर ब्लॉगर बहस करना चाहते हैं । बहस को एक सार्थक बहस बनाने के लिये इस मंच को न्यूट्रल हो कर चर्चा करनी होगी और लोगो को आमन्त्रित करना होगा उस पोस्ट पर आ कर कमेन्ट मे चर्चा करने के लिये .


ज्ञान जी ने सफाई-अभियान शुरु किया, अकेले अपनी अन्तःप्रेरणा से । खुद के भीतर से पैदा हुई कुलबुलाहट ने प्रवृत्त किया उन्हें । ज्ञान जी की प्रविष्टियों पर टिप्पणी करना कठिन लगता है मुझे, इसलिये भी कि वह सम्यक दृष्टि, वह आचरण अंशतः भी हममें नहीं । ज्ञान जी की प्रविष्टि सतीश पंचम जी के ई-मेले हुए ( संज्ञा को क्रिया बनते हुए देखिये) आख्यान से बन पड़ी है आज -





समसाद मियां - अथ सीक्वलोख्यान
हीरालाल नामक चरित्र, जो गंगा के किनारे स्ट्रेटेजिक लोकेशन बना नारियल पकड़ रहे थे, को पढ़ कर श्री सतीश पंचम ने अपने गांव के समसाद मियां का आख्यान ई-मेला है। और हीरालाल के सीक्वल (Sequel) समसाद मियां बहुत ही पठनीय चरित्र हैं। श्री सतीश पंचम की कलम उस चरित से बहुत जस्टिस करती लगती है। आप उन्ही का लिखा आख्यान पढ़ें (और ऐसे सशक्त लेखन के लिये उनके ब्लॉग पर नियमित जायें):-

वन्दे मातरम पर फतवा, मराठी हिन्दी विवाद - सब अकुला गये हैं भीतर ही भीतर । हिन्दू भी,मुसलमान भी, हिन्दी भाषी भी, मराठी भाषी भी । यह सारे विवाद हमारे किसी काम के नहीं, किसी के किसी काम के नहीं । सब कुछ क्षणिक है । नीलोफर के ब्लॉग पर यह खबर पढ़ लीजिये -

देवबंद के फतवे को धता बताते हुए बैतूल बाजार की जामा मस्जिद के इमाम हाफिज अब्दुल राजिक की अगुआई में मुसलमान समुदाय के एक समूह ने मस्जिद के सामने राष्ट्रगीत गाया। बैतूल बाजार की जामा मस्जिद के इमाम हाफिज अब्दुल राजिक के न्यौते पर इस सामूहिक गान को देखने के लिए मस्जिद के सामने विभिन्न संप्रदाय के कई लोग जमा हुए।
धीरू जी ने इन विवादों पर अपनी दो टूक राय दी है, मेरी भी समझ में सच्ची और पक्की बात -

महंगाई सुरसा सा मुहं फाड़े खड़ी है . कोई उस और ध्यान ना दे इसलिए रोज़ एक नया विवाद . बेकार का विवाद - चीन के सैनिको ने घुसपैठ की , दलाई लामा की अरुणाचल यात्रा , देश की सीमा पर संकट , अल कायदा का अगला निशाना, कोडा के कारनामे  और ना जाने क्या क्या . और अब १० -१५ दिनों के लिए राज ठाकरे .

एक रोचक कार्टून पोस्ट किया है काजल कुमार ने हिन्दी-मराठी परिप्रेक्ष्य में (ऊपर देखें) और १५ साल से कलम-कंम्प्यूटर तोड़ने वाले  खुशदीप का कोण भी निरखिये, हिंदी किस खेत की मूली है...-

हिंदी पिटी...बुरी तरह पिटी...अपने देश में ही पिटी...आखिर हिंदी है किस खेत की मूली...राष्ट्रीय भाषा कोई है हिंदी...जो महाराष्ट्र में चलेगी...जी हां, मैं भी इसी भ्रम में जी रहा था कि हिंदी राष्ट्रीय भाषा है...मैं क्या देश की आधी से ज़्यादा आबादी इसी मुगालते में होगी कि हिंदी राष्ट्रीय भाषा है...हिंदी में ब्लॉगिंग करने वाले भी वहम पाले हुए होंगे कि हम तो राष्ट्र की भाषा में लिखते हैं...
अरविन्द जी नायिका भेद लिख रहे हैं । यद्यपि पिछली श्रृंगार-विषयक प्रविष्टियों ने उन्हें डिगाया था, पर वे पुनः-पुनः प्रवृत्त होने वाले लोगों में हैं, स्वयं के प्रति ईमानदार, और शायद यही गुण उन्हें बहुप्रशंसित बनाता है । अरविन्द जी उस चिन्तन-परम्परा के चतुर चितेरे हैं जो मन से उत्पन्न हुए देवता को तनिक भी विस्मृत नहीं करती । यह वह देवता है जो आता है, छिप जाता है फिर मन में सुनहला दर्द पैदा होने लगता है । वर्षों के बंधन स्वतः ही खुल जाते हैं । मन का पंछी आकाश का प्रत्येक छोर छू लेना चाहता है ।

क्या यह अकारण है कि अरविन्द जी ने श्रृंगार-विषयक अपनी दूसरी श्रृंखला के प्रारंभ के लिये कार्तिक-मास की पूर्णिमा चुनी । कार्तिक मास को ऊर्जा-मास कहा गया है । नयी ऊर्जा से लबालब अरविन्द जी विष्णु के नये वर्ष के महीने अगहन (मार्गशीर्ष ) में अनवरत इस ऊर्जा का प्रसार कर  रहे हैं  । शायद  यह बताने के लिये ही कि काम ऊर्जा है, ईश्वर का अधिष्ठान है । बस थोड़ी सावधानी चाहिये, अंधविरोध उचित नहीं । प्रविष्टियाँ सराहिये -

अरविन्द जी का नायिका-भेद
यह नायिका कहलाती है आगतवल्लभा !
आज बात संयुक्ता की .. (नायिका-भेद)
"प्रियतम के विदेश से अवश्यम्भावी वापसी  की सूचना मिलते ही  नायिका की  खुशी का पारावार नहीं है -वह आह्लादित हो उठती है ! तन मन  पुलकित  है ,छाती भर आई  है ,गालों पर लालिमा आ गयी  है ! यह दशा देख सहेली आशयपूर्ण मुस्कराहट से कह पड़ती है ," सखि, लाओ यह दीन मलीन रूप तो  साज संवार दूं "
"रहने दो ,रहने दो ,ज़रा कंत भी तो देखें उनके विछोह ने मेरी कैसी गत दुर्गत कर डाली है ! "
मगर फिर न जाने कुछ सोच कर  अपनी सखी से प्रतिरोध नहीं करती और सखी उसकी साज संवार में लग जाती है! "
" चुपके से  प्रियतम की आँखों  को पीछे से आ ढँक लेने के बहाने प्रिय से आ लिपटी बाला ...... .फिर उसने मादक अंगडाई ले अपने अनुपम अंगों को दिखला डाला ......... प्रियतम ने तब   भेद भरी  बातों  मे  सहसा इक  आग्रह कर डाला........ . शर्म से हुई छुईमुई बाला ने हँस कर  बात को टाला .........  अगले ही पल  बाला ने गले में प्रीतम के  डाली बाँहों की माला "...........

बकलम खुद में द्विवेदी जी का आत्मकथ्य लगभग पूर्ण होने की स्थिति में है । शब्दों का सफर शब्द-प्रेमियों का आवश्यक ठिकाना है, आश्रय है । प्रस्तुत हैं इस चिट्ठे की ताजा प्रविष्टियाँ -


सरदार की ब्लागरी शुरु [बकलमखुद]
मोहल्ले में हल्ला [आश्रय-21]
तीसरा खंबा तक पहुँचने वाले पाठकों की संख्या बहुत कम थी। वह विषय आधारित ब्लाग था। सरदार ने कुछ पुराने ब्लागरों से पूछा तो सलाह मिली कि पाठक खुद ही जुटाने होंगे। कुछ दिन में महसूस हुआ कि ब्लाग जगत में ब्लागरों से अन्तर्क्रिया करना आवश्यक है अन्यथा यहाँ तुम्हें कोई नहीं गाँठने वाला। इस तरह कोई बाईस दिन बाद अनवरत का जन्म हुआ। अनवरत में पाठक आने लगे और अंतर्क्रिया भी खूब होने लगी।
आदिम मानव ने आश्रय की तलाश से पहले समूह में रहना सीखा। यानी समूह अपने-आप में आश्रय है। महल्ला mahallaभी एक समूहवाची शब्द है जिसमें आश्रय का भाव है। यूं इस शब्द का इस्तेमाल बसाहट के एक हिस्से के लिए होता है। हिन्दूवादी सोच के तहत महल या मोहल्ला की व्युत्पत्ति महालय से बताई जाती है। महा+आलय से बना है महालय। संस्कृत में महा यानी विशाल या बड़ा और आलययानी निवास। आशय हुआ विशाल भवन।


राजकिशोर जी की एक वैचारिक प्रविष्टि आपके सम्मुख है । मुझे तो बहुत कुछ समझ में आया इस प्रविष्टि से । और भी जिन्हें समझना हो यहाँ पहुँचे और पढ़ लें -

दुनिया में जब से विषमता का सूत्रपात हुआ, तभी से समानता की भूख मनुष्य के मन में कुलबुलाती रही है। इसकी एक अभिव्यक्ति धर्म के रूप में हुई जो मानता है कि हम सब एक ही ईश्वर की संतानें हैं और इसलिए हम सभी का दर्जा बराबर है। लेकिन इस शिक्षा का पालन धार्मिक प्रतिष्ठान भी नहीं कर सके जिन पर धर्म का प्रसार करने की जिम्मेदारी रही है। ईश्वर के दरबार में राजा-रंक सभी की हैसियत बराबर होगी, पर धरती पर ईश्वर का राज्य तरह-तरह की विषमताओं से भरपूर है। यहां तक कि विचार करने की आजादी भी, जो मनुष्य को ईश्वर का सबसे बड़ा उपहार है, सभी को नहीं है। जो धार्मिक क्षेत्र स्वयं प्रदूषित रहा है, वह समाज और राजनीति में गैरबराबरी का समर्थन और पोषण क्यों न करता?
एक नजर इधर भी डाल ही लें । पहली ही दृष्टि में शीर्षक (आग ,आटा और लोहा )  प्रभावित कर गया । आलेख तो खैर गजब है ही -
जब कभी दुनिया में वामपंथ के इतिहास की चर्चा होगी ये चर्चा भी जरुर होगी कि हिंदुस्तान के एक राज्य में २५ वर्षों तक राज्य करने के बाद कैसे एक वामपंथी सरकार अपने जैसे ही विचारधारा के लोगों की जानी दुश्मन हो गयी ,उस वक़्त ये भी चर्चा होगी कि कैसे एक देश की सरकार पहले तो अपने ही देश के गरीब और अभावग्रस्त लोगों की दुश्वारियों को जानबूझ कर अनसुना करती रही ,और फिर अचानक हुई इस जानी दुश्मनी का सारा तमाशा नेपथ्य से देखकर तालियाँ ठोकने लगी

मोटे लोग हमारी ब्लॉगिंग के शीर्ष-पर हैं (किसी का दिल तो नहीं टूटा?)। उनसे अनुरोध है कि वे अपने मोटापे को पहचान लें ! वे सेब हैं या नाशपाती ? क्योंकि मीडिया डॉक्टर साहब बता रहे हैं "मोटापा-सेब जैसा और नाशपाती जैसा ।" --
जो मोटापा कमर से ऊपरी हिस्से में होता है उसे Apple-shaped obesity कहते हैं और जो मोटापा कमर से नीचे वाले हिस्से में जमा होता है उसे नाशपती जैसा मोटापा ( pear-shaped obesity) कहा जाता है। यह तस्वीर देखने पर आप को अच्छी तरह से क्लियर हो जायेगा।
तस्वीर वहाँ देख लें ।

अब कवितायें । रंजना रंजू भाटिया की कलम से भावना का अबाधित प्रवाह होता रहता है, वहीं अदा की काव्य-मंजूषा बहुप्रकार के रत्नों से समृद्ध है । झलक देख लें -

रंजना रंजू भाटिया की कविता सुनो और अदा की रचना दिल से -
सुनो ...  
दिल से
आसमान की तरह
""खाली आँखे ""
धरती की तरह
"चुप लगते "सब बोल हैं
पर तुम्हारे कहे गए
एक लफ्ज़
"सुनो "में
जैसे वक्त का साया
ठहर सा जाता है

है मुझको भी तेरे इश्क की खबर
हम लिखने लगे ये फ़साना दिल से

छपते ही रहे तेरे बयाँ हर सू
अब पढने लगा है ज़माना दिल से

आँखों में मेरे थे पड़े कई कोहरे
तेरा उँगली से उन्हें हटाना दिल से

तुम कहते रहे जाने कितनी बातें
और मेरा वो सबकुछ सुन जाना दिल से

कुछ और कवितायें -
पंकज शर्मा और सदा की कविता प्रविष्टियाँ -
रास्ते आते हैं जहाँ से जाते हैं वहाँ
कौन सा शब्‍द ...?
रास्ते बदलने से
गिरने से, संभलने से
बचके निकलने से
होता है कुछ कहाँ
रास्ते आते हैं जहाँ से
जाते हैं वहाँ
जाने कब
कौन सा शब्‍द
रच देता है इतिहास
जिससे अमर
हो जाती हैं रचनायें

अब कविता जैसा कुछ-कुछ -एक मौसम खिल रहा है..   -

एक मौसम आसमान से उतर रहा था। एक मौसम शाखों पर खिल रहा था। एक मौसम पहाड़ों से उतर रहा था। एक मौसम रास्तों से गुजर रहा थाएक मौसम शानों पर बैठ चुका था कबका। एक मौसम आंखों में उतर रहा था आहिस्ता-आहिस्ता।
एक मौसम दहलीज पर बैठा था अनमना सा, एक मौसम साथ चल रहा था हर पल। न धूप... न छांव...न बूंदें... न ओस...न बसंत...न शरद बस एक याद ही है जो हर मौसम में ढल रही हैऔर लोग कह रहे हैं कि मौसम बदल रहे हैं...

जी०के० अवधिया भूत और भ्रम को अलग मानते हैं । हम तो अभी तक भ्रम को ही भूत समझते आये थे -
मैं शुरू से ही निशाचर टाइप का इंसान रहा हूँ याने कि रात में देर से सोने की आदत है मुझे, सोते-सोते लगभग एक डेढ़ बज ही जाते हैं। मैंने बैंक की लाइब्रेरी से "लोलिता" उपन्यास ईशु करा लिया था जिसे कि रात को सोने के पहले मैं पढ़ा करता था। उस रात भी मैं लगभग एक-सवा बजे तक पढ़ता रहा। फिर लाइट बुझाकर मच्छरदानी के भीतर घुस कर सोने का प्रयास करने लगा। कमरे में घुप्प अंधेरा था। एक दो मिनट बाद ही मुझे लगा कि सुब्रमनियम साहब के बेड, जो कि मेरे बेड के पास ही था और दोनों बेड के बीच एक टी टेबल रखा था, से खर्राटे लेने की आवाज आ रही है। उस समय मैं सोया नहीं था बल्कि सोने का प्रयास कर रहा था। मैं सोचने लगा कि यह आवाज कैसी है?

प्रश्न तो और भी हैं । प्रश्न रखने, समाधान खोजने के आतुर जाकिर अली रजनीश जी की प्रविष्टि देखिये , छ: साल के लड़के के लिए प्रेम पत्र का क्या मतलब है? -
मैं अपने बड़े बेटे अहल की बात कर रहा हूँ। उसकी उम्र है 6 वर्ष और वह वर्तमान में के0जी0 का विद्यार्थी है। यह घटना अभी पिछले सप्ताह की ही है। हुआ यूँ कि वह एक काग़ज़ पर कोई ड्राइंग बना रहा था। अपनी ड्राइंग को पूरी करने के बाद उसने अपनी मम्मी से अन्नपूर्णा शब्द की स्पेलिंग पूछी। अन्नपूर्णा उसके क्लास की ही एक लड़की है और स्कूल की बातों के दौरान घर में अक्सर उसका जिक्र आता रहता था। स्पेलिंग पूछने पर मिसेज़ चौंकीं और उसका कारण पूछा। पहले तो बेटा शर्मा गया, फिर उसने सकुचाते हुए बताया कि हमें अन्नपूर्णा को एक लेटर देना है, इसलिए उसमें उसका नाम लिखना है। मिसेज़ ने कहा ठीक है और उसे स्पेलिंग बता दी।

चर्चा समेटते-समेटते ब्लॉगवाणी पर नजर डाली तो पूजा जी सबसे पहले दिखीं, यद्यपि कह रहीं हैं  कि दुनिया की भीड़ में सबसे पीछे हम खड़े -
सुबह बंगलोर में बारिश हो रही थी...बारिश क्या बिल्कुल फुहार...ऐसी जो मन कोभिगोती है, तन को नहीं। बहुत कुछ पहले प्यार की तरह, उसमें बाईक चलाने का जो मज़ा था की आहा...क्या कहें। और आज सारे ट्रैफिक और बारिश और सुहाने मौसम के बावजूद मैं टाईम पर ऑफिस पहुँच गई तो दिल हैप्पी भी था। उसपर ये प्यारा गीत, काम करने में बड़ा मज़ा आया...जल्दी जल्दी निपट भी गए सारे।
हेमन्त ने भी अपनी उपस्थिति दे दी थी रुकते-रुकते, उन्हें यहाँ पढ़ लें - कितना उचित है ?

बार-बार अपने होने का बिगुल फूकना
बुद्धिमत्ता का परिचायक कहां से है..
राष्ट्र-भाषा की सशक्त उपस्थिति को
कैसे खण्डित कर सकता है कोई.....?

अब बस ! सामर्थ्य से अधिक की कोशिश हास्यास्पद बना देती है । बाकी अगली बार ! 

Wednesday, October 21, 2009

चाहता तो बच सकता था, मगर कैसे बच सकता था (चर्चा हिन्दी चिट्ठों की !!!)...

अंक : 54
प्रस्तुतकर्ता : हिमांशु । Himanshu

"चाहता तो बच सकता था
मगर कैसे बच सकता था ?
जो बचेगा
कैसे रचेगा ?"

श्रीकान्त वर्मा की यह पंक्तियाँ हर काम कराती रहीं मुझे । चिट्ठाकारी में आना, ठहरना, रचने लगने का आभास करना- सब इन पंक्तियों का टेम्पटेशन है । राह की चर्चा करना आसान है, पर उस पर चलना मुश्किल । चिट्ठा-चर्चा का सम्मोहन बहुत ज्यादा है मुझ पर ! उससे मुक्त नहीं हो पाता ! वहाँ सुमेरु पुरुषों के जमावड़े में अपने पाँव लचक गये । मन में एक अतृप्त इच्छा थी, चर्चा करने की । पंकज ने कहा - उत्सुक हो स्वीकार कर लिया मैंने । पर डर, अतृप्ति शायद समय के पार की चीजें हैं- जाती नहीं । मनुष्य जहाँ भी अपनी प्रवृत्ति करे- पीछा करती जाती हैं । कुछ डर अभी भी समाये हैं, उनका उल्लेख नहीं करुँगा । ले-देकर चर्चा को समोत्सुक हूँ - साग्रह । स्वीकृत हो !

कई बार उल्लेख कर चुका हूँ, रवीश जी की नई सड़क ने ब्लॉगिंग की राह दिखायी ।  आज भी एक प्रविष्टि दिख गयी उनकी - लोग लिख रहे हैं । लोग मतलब मुस्कान टेलर्स के प्रो० शाहिद मास्टर जैसे लोग । हम आपको थमा दे रहे हैं पूरी की पूरी पोस्ट ही -



लोग लिख रहे हैं...
ये इंदिरापुरम के शिप्रा रिवियेरा के एक गेट के बाहर से ली गई तस्वीर है। अंग्रेजी के शब्द पहले बोलचाल में हिंदी के हुए और अब लिखनचाल में घुस रहे हैं। आम लोगों के द्वारा लिखी जाने वाली हिंदी।

लोग लिख रहे हैं, और बहुत लिख रहे हैं । किसी के लिखने पर लिख रहे हैं, किसी के न लिखने पर लिख रहे हैं । टिप्पणी का बाजार गर्म है । पिछले कुछ दिनों से देख रहा हूँ (यद्यपि निस्पृह भाव से देखते रहना इस टिप्पणी-पोस्ट व्यापार को कटघरे में खड़ा करता है ), समझ नहीं पा रहा हूँ - मुद्दा क्या है ? मुझे तो समझ में नहीं आता । ठेठ कविता-आलेख वाला ब्लॉगर हूँ, यह पोस्ट-प्रतिपोस्ट, टिप्पणी-प्रतिटिप्पणी पल्ले नहीं पड़ती मेरे । तैत्तरेय ब्राह्मण का श्लोक याद करने लगता हूँ -
"धूम एवाग्नेर्दिवा ददृशे नार्चिस्तस्मादर्चिरेवाग्नेर्नक्तं ददृशे न धूमः ।"
(दिन में आग का धुआँ ही दिखायी दिया, धधक नहीं; रात में धधक ही दिखायी दी, धुआँ नहीं ।)
खैर, आप तो यह पोस्ट (बहस में टिप्पणी का जवाब नहीं दिए जाना क्या अशोभनीय माना जाएगा ?) पढिये और पंकज के सवालों के जवाब दीजिये। और भी बहुत-से सवाल-जवाब वहाँ लिंकित मिलेंगे ।

ब्लॉगिंग की क्रिया-प्रक्रिया पर बात रोके नहीं रुकती । शास्त्री जी (सारथी ) कुछ कह रहे हैं, सदैव ही कहते रहते हैं -



चिट्ठाकारों को नंगा करने की साजि
पांच हजार चिट्ठों में पचास से अधिक नहीं है जो गंदगी फैला रहे हैं. उन में भी मुश्किल से पांच है जो लिखनाकरना कुछ नहीं चाहते (क्योंकि उनके पास देने के लिय कुछ नहीं है) लेकिन वे चिट्ठाजगत की नस नस पहचानते हैं. एक दक्ष ओझा के समान वे किसी एक “ग्राहक” को पकड कर चुपके से उसकी कोई नस दबा देते हैं. जैसे ही वह आह करता है वैसे ही ओझा को “काम” मिल जाता है.
यदि चिट्ठाकार मित्र इन पांच लोगों को पहचान लें तो चिट्ठाजगत में शांति हो सकती है.


बात दूसरी, संदर्भ दूसरा, पर हिन्दी ब्लॉगिंग की धमक अभी भी बरकरार है । ज्ञान दत्त जी की प्रविष्टियों से हतप्रभ होता रहा हूँ, मुझे उनमें रचनाकार की आत्म-शक्ति दिखती है । मैटर ऐसा-वैसा-जैसा भी होकर एक प्रविष्टि का रूप लेता ही है । लगने लगता है उपादान (मैटर) रचना की आत्मा नहीं हो सकता । ज्ञानजी की प्रविष्टि का पारायण करें -



चप्पला पहिर क चलबे?
छोटे के पैर में चप्पल होना उसे हैव-नॉट्स से हटा कर हैव्स में डाल रहा था; और लड़की के व्यंग का पात्र बना रहा था।
    चप्पला हो या न हो – ज्यादा फर्क नहीं। पर जब आप असफल होंगे, तब यह आपको छीलने के लिये काम आयेगा।
कितनी बार आप अपने को उस छोटे बच्चे की अवस्था में पाते हैँ? कितनी बार सुनना पड़ता है - चप्पला काहे पहिर कर चलते हो! आम जिन्दगी और सरकारी काम में तो उत्तरोत्तर कम सुनना पड़ता है अब ऐसा; पर हिन्दी ब्लॉगिंग में सुनना कई बार हो जाता है।

दीवाली की खुमारी उतरी नहीं अभी । द्विवेदी जी ने दीवाली के बाद की उदासी का खाका खींचा है अनवरत पर ; और अनवरत ही लिख रहे हैं शब्दों का सफर में बकलम खुद । देख लीजिये दोनों ही प्रविष्टियाँ -
दिनेश राय द्विवेदी अनवरत व शब्दों का सफर में -
दीवाली बाद एक उदास दिन
घर-शहर की बदलती सूरत [बकलम खुद]
हमारे यहाँ हाड़ौती में कच्चे घरों में गेरू मिला कर गोबर से घर के फर्श को लीपा जाता है। फिर खड़िया के घोल से उन पर मांडणे बनाए जाते हैं जो रंगोली की अपेक्षा अधिक स्थाई होते हैं और अगली लिपाई तक चलते हैं, जो घर में कोई और मंगल उत्सव न होने पर अक्सर होली पर होती है। इन मांडणों के बाद कच्चे घर पक्के घरों की अपेक्षा अधिक सुहाने लगते हैं।
पूछने लगे कितना कमाते हो? -मैं जितना कमाता हूँ उतना खर्च हो जाता है। हाथ में कुछ बचता ही नहीं। खर्च कितना करते हो? -बस कुछ ढंग से जी लेता हूँ। मामाजी कहने लगे –तुम बहुत कम खर्च करते हो। -आखिर उतना ही तो खर्च कर सकता हूँ जितना कमाता हूँ? तुम जितना खर्च करोगे उतना कमाओगे। इसलिए अपना खर्च बढ़ाओ। मामाजी के इस उत्तर पर सरदार अपना सिर खुजाने लगा।

मैंने दो चिट्ठाकारों को अभी-अभी पढ़ना शुरु किया है - विनीत और मनीषा पांडे को । कुछ और पढ़ूँगा तो कुछ कहूँगा इनके लिये, वैसे मुग्ध हूँ इनकी लिखावट से । आज तो विनीत की प्रविष्टि ही ज्यादा मौजूँ लगी बजरिये मेरी रुचि । दिलवाले दुल्हनियाँ ले जायेंगे ने निश्चय ही मुझमें भी एक दीवानापन भर दिया था- हाँ अनुभव काश, विनीत जैसे हो पाते! प्रस्तुत है इन दोनों चिट्ठाकारों की प्रविष्टियों की झलक -


 गाहे-बगाहे में विनीत कुमार व बेदखल की डायरी में मनीषा पांडे  
आज चौदह की हुई दिलवाले दुल्हनियां
स्‍वेटर बुनने वाले प्रोफेसर
पहली बार किसी लड़की के हाथ छू जाने से झुरझुरी होती है महसूस किया। पहली बार ये बयान सुना कि किस करते समय लड़कियां आंखें इसलिए बंद कर लेती है कि वो सुंदर चीजें देखना पसंद नहीं करती। टीनएज की कई बेतुकी बातें,लड़कियों से दूसरों के बहाने अपने मन की बातें धर देने की कला,सबकी आजमाइश इन सात दिनों में हमने की।
उनकी कई किताबें और शोध प्रबंध छप चुके हैं। उन्‍होंने कई साल जापान, अमेरिका और यूरोप के कुछ देशों में बिताए हैं। यूनिवर्सिटी में स्‍टूडेंट्स के चहेते हैं। उनके फेसबुक एकाउंट में मनोविज्ञान से जुड़े दिलचस्‍प शोधों और बातों के साथ-साथ किसी दिन उस गुलाबी स्‍वेटर की तस्‍वीर भी होती है, जो उन्‍होंने अपनी बेटी के लिए बुना है।

’ये त्यौहार ही हमारी मुनिसपेलिटी है’ प्रविष्टि लिखकर शेफाली पाण्डेय जी ने भारतेन्दु के इस आलेख की याद तो दिलायी ही, एक शीर्षक में दो-दो प्रविष्टियाँ लिखने का उद्यम भी किया, राह भी सुझायी । इसी त्यौहार के ही बहाने एक बेहतरीन खबर दी ललित शर्मा जी ने अपने चिट्ठे पर, और एक ऐसे गाँव का जिक्र किया जहाँ डेढ़-सौ साल बाद ये दीपावली मनायी गयी । झलक तो यह रही, पूरी खबर यहाँ पढ़ लीजिये -
छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले में स्थित छुरा ब्लोक के केडीआमा ग्राम (अब रमनपुर) में १५० वर्षों के बाद दिये जले और ग्रामीणों द्वारा दीवाली मनाई गई .दीयों के प्रकाश से केडीआमा ग्राम एक बार फिर से रौशन हुआ.
विज्ञान की निश्चित पदावली मेरा कवि-मन कभी न समझता यदि अरविन्द जी के चिट्ठे इस चिट्ठाजगत में न होते, और इस चिट्ठाकारी की अनिश्चित पदावली कभी समझ में नहीं आती यदि अरविन्द जी इस चिट्ठाकारी मे नहीं होते । वैसे आज की प्रविष्टि साईं ब्लॉग पर कुछ ऐसी ही है कि डिस्क्लेमर न लगाने के बावजूद भी अरविन्द जी पहली ही पंक्ति (बोल्ड है) में डिस्क्लेमर लगा बैठे हैं - विश्वास न हो तो देख ही लीजिये -


नारियां क्यों बनाती है यौन सम्बन्ध ? एक ताजातरीन जानकारी !
विश्वप्रसिद्ध साप्ताहिक पत्रिका टाईम(अक्टूबर ६ ,२००९) का यह ताजातरीन लेख  महिला सेक्सुअलिटी में रूचि रखने वालो /वालियों के लिए रोचक हो सकता है ! एलायिसा फेतिनी द्बारा लिखा  'व्हाई वीमेन हैव सेक्स " शीर्षक यह लेख हो सकता है यौन कुंठाओं वाले एक बड़े भू भाग के  भारतीय उपमहाद्वीप  का प्रतिनिधि  चित्रण न करता हो मगर एक प्रजाति के रूप में मनुष्य की सहचरी के गोपन व्यवहार का कुछ सीमा तक अनावरण करता ही है ! नैतिक मान्यताओं को लेकर आज बहुत कुछ अस्पष्ट और संभ्रमित  भारतीय मानस भले ही ऐसे अध्ययनों से प्रत्यक्षतः दूरी बनाए रखना चाहता हो मगर  ऐसे अध्ययनों के अकादमीय महत्व को सिरे से नकारा नहीं जा सकता !

यद्यपि हूँ मैं कविता लिखने वाले बहुसंख्यक ब्लॉगरों के परिवार का सदस्य पर जब चर्चा करने बैठा हूँ तो अबतक केवल आलेख ही सम्मिलित हुए हैं, किसी कविता की चर्चा नहीं हुई ।कविताओं की कुछ प्रभावित करने वाली प्रविष्टियाँ यूँ रहीं -

लाडली बेटियों का ब्लॉग एवं नारी का कविता ब्लॉग 
मां का दुपट्टा ....
राह.
वो अपने
छोटे-छोटे हांथों से
मां का दुपट्टा
सर पे डाल कर
कभी दुल्‍हन बन
बन जाती
झांक कर कभी शर्माती
उसके इस खेल में
शामिल होता हर कोई
चेहरे पर मुस्‍कान
सजाये वह दौड़ कर
गोद में छुप जाती ....
वो अपने ....।
नई दिल्लीउत्ताल तरंगों को देखकर
नही मिलती सागर की गहराई की थाह
शांत नजरों को देखकर ,
नही मिलतीनारी मन की राह
टुकडों में जीती जिन्दगी पत्नी ,प्रेमिका ,मां
अपना अक्स निहारती कितनी है तनहा
सूरज से धुप चुराकर सबकी राहें रोशन करती
उदास अंधेरों को मन की तहों में रखती
सरल सहज रूप को देखकर
नही मिलतीनारी मन की राह

विवेक सिंह एवं राजेय शा की प्रविष्टियाँ  -
बन्द कर अब मेरा धीरज जा लिया
हरदम खुद को खो देता हूँ
कर रहा है धृष्टता पर धृष्टता ।
चैन की वंशी का सुर चुरा लिया ॥

वाहवाही दी बहुत मैंने मगर ।
आज तूने सत्य ही बुलवा लिया ॥

बीते बचपन की यादों में
मैं ख्वाबों में रो देता हूँ

मेरे सपने किसी ने पढ़े नहीं
बस लिखता हूँ धो देता हूँ ।

दो ऐसे प्यारे टिप्पणीकार हैं, जिनकी बहुत-सी टिप्पणियाँ कविताओं की शक्ल में होती हैं । श्यामल सुमन जी ने ऐसी ही अपनी टिप्पणियों का संकलन देना शुरु किया है । दूसरी किस्त भी आ चुकी है । अपने शास्त्री जी भी रम्य कविता के साधक हैं । उच्चारण पर उनकी प्रविष्टि पर भी गौर फरमायें -

श्यामल सुमन मनोरमा में एवं रूप चन्द्र शास्त्री उच्चारण में
सबरंग दोहे -(२)
."सब बच्चों का प्यारा मामा"
प्रश्न अनूठा सामने अपनी क्या पहचान?
छुपा हुआ संघर्ष में सारे प्रश्न-निदान।।

कई समस्या सामने कारण जाने कौन?
कारण अबतक न मिला समाधान है मौन।।

नभ में कैसा दमक रहा है।
चन्दा मामा चमक रहा है।।

 कभी बड़ा मोटा हो जाता।
और कभी छोटा हो जाता।।

संवादघर पर बेहतर संवाद हो रहा है । एक मौजूँ पैरोडी लिखी है संजय जी ने -
"ओज़ोन पे आह करो
मौजों पे वाह करो
शांति को तलाक दे दो
शोर से निकाह करो
यारों सब धुंआं करो...."
जम गय़ी हो तो वहीं जाइये और पढ़ ही डालिये ।वन्दना जी के ब्लॉग पर भी एक बेहतर कविता बुला रही है -
सुरमई शाम ने झाँका बाहर
निशा दामन फैला रही थी ...

हेमन्त मेरे कस्बे के इकलौते ब्लॉगर बच रहे हैं इन दिनों (मुझे छोड़कर ) । मैं उन्हें कलरव के चिट्ठाकार के तौर पर ही जान सकने की हद-जद में था । पर वह भी उस्ताद ही हैं , अनजाने में एक लघुकथा पोस्ट हो गयी है कलरव पर (उन्होंने बताया मुझे कि वो इस लघुकथा को अपने ब्लॉग अक्षरशः पर पोस्ट करने वाले थे ) । इस नये साहित्य-रूप में बेहतर हाँथ दिखाये हैं उन्होंने । नजर डालिये -
राहुल दो लड़कों व एक लड़की समेत तीन बच्चों का बाप था । कायदे से  दो वक्त की रोटी भी जुटाना मुहाल था । सोचा कि पहले इसके पैसे से घर बनवा लूं  बीबी और बच्चों को बाद में मना लूंगा । तब तक इसे इधर ही किराये के मकान में रखुंगा । किसी को पता भी न चलेगा । आसानी से घर भी जाया करूंगा और बीबी और बच्चों की परवरिश भी होगी  और इधर कमा धमा एक नया घर बना इसे अलग रखूंगा । दोनों बीबियां अलग-अलग रहेंगी किसी को क्या ऐतराज मैं एक बीबी रखूं या दो |

चर्चा की तमीज नहीं है अभी । जो दिख गया, जो जम गया,  यहाँ आ गया । कुछ जानकारियों वाली प्रविष्टियों से विराम लूँ तो हर्ज क्या !

रवि रतलामी जी एवं जी०के०अवधिया जी की प्रविष्टियाँ -
विंडोज 7 सीखने के लिए आपके लिए कुछ मुफ़्त वेबकास्ट 
क्या आपका फायरफॉक्स ब्राउसर बहुत धीमा है? ... गति ऐसे तेज कर सकते हैं ...
विंडोज का हर संस्करण चलने चलाने में अपने पूर्व के संस्करणों से बहुत कुछ भिन्न होता है. विंडोज 7 में हिन्दी कैसे चलाएँ? विंडोज 7 में नया क्या है? विंडोज 7 में इंटरनेट-नेटवर्किंग कैसे करें? इत्यादि. यह सब और बहुत कुछ जानिए मुफ़्त वेबकास्ट से.
सामान्यतः आपका ब्राउसर एक बार में एक ही वेबपेज को रिक्वेस्ट करता है किन्तु पाइपलाइनिंग को सक्षम कर देने से यह एक ही समय में एक से अधिक वेबपेजेस को एक साथ रिक्वेस्ट करने लगता है और आपके ब्राउसिंग की गति तेज हो जाती है।

काजल कुमार एवं नवीन प्रकाश की प्रविष्टियाँ
ओह ! कहीं आप भी ये एंटी वायरस तो नहीं ले बैठे ? 
फोटो से बनाइये मजेदार शो 
वास्तव में कंप्यूटर पर कोई वायरस था ही नहीं अलबत्ता, इस बीच एक स्पाइवेयर कंप्यूटर में बस ज़रूर गया. ऐसे कुछ प्रचलित वायरस हैं SpywareGuard2009, AntiVirus 2009, AntiVirus 2010, Spyware Secure,XP AntiVirus इत्यादि. 
ढेर सारे टेम्पलेट में से अपनी पसंद का एक चुनिए एनीमेशन, साउंड या अपनी आवाज़ मिलाइए और बनाइये एक मजेदार शो ।

गन्ने के रस से चल सकती है कार ! चौंकिये मत ! विनय बिहारी जी की प्रविष्टि पढ़िये और सच जानिये -

एक डच माइक्रोबायलाजिस्ट ने प्रयोग कर दिखा दिया है कि पेट्रोल या डीजल के बदले गन्ने के रस से कार चलाई जा सकती है। यही नहीं, मकई (कार्न) से सुंदर कपड़े बन सकते हैं। इसके बाद से ही यह बहस छिड़ गई है कि यह प्रकृति के साथ छेड़छाड़ है। गन्ने का रस मिठास के लिए है तो उसे वही रहने दिया जाए। इससे कार का ईंधन बनाना अनुचित है। अगर पेट्रोल की जगह गन्ने का रस इस्तेमाल होने लगा तो फिर चीनी की भारी कमी हो जाएगी क्योंकि कारें लगातार बढ़ रही हैं और पेट्रोल की खपत का कोई अंत नहीं दिख रहा है। ऐसे में लोग मिठास के लिए तरसने लगेंगे। इसी तरह मकई का पौधा अगर कपड़े बनाने में इस्तेमाल होने लगा तो लोग कार्न से बनने वाली पौष्टिक चीजों से वंचित रह जाएंगे।
 चर्चा का यह बड़ा काम पूरा हुआ । शाम छः बजे तक की प्रविष्टियाँ लेने की कोशिश की है शुक्रवार की । रात को मेरे कस्बे में बिजली नहीं रहती । छूटे सभी चिट्ठे मेरी सीमाओं के कारण छूटे हैं । शायद बाद के चिट्ठाकारों का काम मैंने बढ़ा दिया है । धन्यवाद । फिर अगली बुधवार !

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जाहिर निवेदन

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