अंक : 114
"मैं रुका रहा
किसी बाँस की डाली की तरह
हवा के सामने झुका रहा
और आवाज सुनता रहा एक
कि नति ठीक है
मगर मना नहीं है तुम्हारे लिये गति
हमने तो तुमसे उन्नत होने के लिये कहा है
विरति की बात कहाँ कही है हमने
रत रहने के लिये कहा है हमने तो तुमसे
सुनने को सुनता रहा मै यह आवाज
मगर समझ लिया मैंने
कि यह एक सलाह है
अपनी एक राह है मेरी
रुकने की और झुकने की
किसी न किसी जगह
पूरी तरह चुकने की ।"
"उत्तरोत्तर लोक का कल्याण ही है साध्य
अनुशासन उसी के हेतु है ।"
जरा और पढ़ लें ’अज्ञेय’ को (चिट्ठाकारी समझने के लिये ही न !) -
"तुम्ही दाता हो, तुम्हीं होता, तुम्हीं जजमान हो,
-- यह तुम्हारा पर्व है ।
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श्रष्टा तुम्हीं हो इस नये रूपाकार के !
तुम्हीं से उदभूत होकर बल तुम्हारा
साधना का तेज - तप की दीप्ति,
तुम को नया गौरव दे रही है !"
| अंतिम आकांक्षा | |
| 'आचार्य रामचंद्र शुक्ल ( १८८४-१९४१ ) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है | आज हम हिन्दी साहित्य के इतिहास को आचार्यवर से अलग करके नहीं देख सकते | हिंदी साहित्य के इतिहास के 'काल- विभाजन' और 'नामकरण' दोनों में हम उनके प्रति कृतज्ञ हैं | इसके अतिरिक्त शुक्ल जी हिन्दी साहित्य के प्रथम व्यवस्थित आलोचक हैं | ' व्यावहारिक' और 'सैद्धान्तिक', दोनों तरह की आलोचना को उन्होंने संस्कार दिया | निबंध लेखन में शुक्ल जी एक युग का प्रतिनिधित्व करते हैं यानी 'शुक्ल युग ' | |
ठीक यहीं अपने अतीत का वैभव निहारते अवनीश मिश्र और काम के देवता कामदेव की कथा कहते जी०के०अवधिया की ठौर मिलेगी -
| नालंदा महाविहार:इतिहास आपके सीने में उतरता है | कामदेव याने कि सेक्स के देवता .. |
| आज से लगभग 800 साल पहले इस विश्व के सबसे पुराने और सबसे बड़े आवासीय विश्वविद्यालय को तुर्क हमलावर बख्तियार खिलजी ने भारी क्षति पहुचाई और नालंदा महाविहार धीरे -धीरे ना सिर्फ समय और विस्मृति के मलवे में, बल्कि सचमुच के ईंट- पत्थर और मिट्टियों के भीतर दफन हो गया ..रेत पर पड़े आदमी के पैर के निशानों की तरह ज्ञान के इस भव्य केंद्र का नामोनिशान ही मिट गया.. लेकिन कुछ निशाँ समय के निर्मम चोटों से पूरी तरह मिटते नहीं हैं बल्कि फिर से झाँकने लगते हैं ...दरअसल वैसे निशाँ जो सिर्फ जमीन पर नहीं होते बल्कि जमीन के भीतर तक धंसे होते हैं..वे निशाँ जिनकी जड़ें होती हैं ,सदियों की झुलसती सुखाड़ को भी झेल लेने का माद्दा रखते हैं , हैं और फिर उग आते है. | कामदेव याने कि सेक्स के देवता ...उनके प्रभाव से भला कोई बचा है? तुलसीदास जी लिखते हैं: "सम्पूर्ण जगत् में स्त्री-पुरुष संज्ञा वाले जितने चर-अचर प्राणी थे वे सब अपनी-अपनी मर्यादा छोड़कर काम के वश में हो गये। वृक्षों की डालियाँ लताओं की और झुकने लगीं, नदियाँ उमड़-उमड़ कर समुद्र की ओर दौड़ने लगीं। आकाश, जल और पृथ्वी पर विचरण करने वाले समस्त पशु-पक्षी सब कुछ भुला कर केवल काम के वश हो गये। सिद्ध, विरक्त, महामुनि और महायोगी भी काम के वश होकर योगरहित और स्त्री-विरही हो गये। मनुष्यों की तो बात ही क्या कहें, पुरुषों को संसार स्त्रीमय और स्त्रियों को पुरुषमय प्रतीत होने लगा।" |
आनन्द देव जी (पेशे से पत्रकार) ने ब्लागिन्ग की शुरुआत कर दी है ..और प्रकाश डाले है तेलान्गना के बटवारे को लेकर हुए विवाद के बाद उत्तर प्रदेश मे चल रहे पुर्वांचल के बटवारे की बात को लेकर…आप सबसे निवेदन है कि आनंद जी के ब्लाग पर जाकर स्वागत करे और उन्हे नियमित लेखनी के लिये प्रेरित करे ..धन्यवाद
विकास का कौन सा सपना देख रहे है पूर्वांचल की वकालत करने वाले लोग ? आनंद देव..
वैसे तो पूर्वांचल राज्य के गठन की मांग काफी लम्बे समय से चली आरही है लेकिन बीच में यह आन्दोलन कमजोर पड़ गया था । लेकिन इधर तेलंगाना की बहस छिड़ते ही इस बुझते आन्दोलन को जैसे नई ऊर्जा मिल गयी है । मुख्यमंत्री मायावती ने भी जोर सोर से छिड़ी इस बहस की आग में तपते तवे पर राजनीति की रोटी सेंकने में कोई कोर कसार बाकी नहीं रखी और उन्हों ने केंद्र सरकार को आनन् फानन में प्रस्ताव भी भेज दिया । अब सवाल यह उठता है की पूर्वांचल राज्य के गठन की वकालत करने वाले लोग आखिर किस विकास का सपना देख रहे है ? क्या पूर्वांचल या फिर पूरे उत्तर प्रदेश की दुर्दशा का कारण यही है की इसकी गिनती रकबे की दृष्टी से बड़े राज्यों में होती है ?
राजनीतिक कौशल दिखाने के अवसर बढ़ते हैं, अगर दो-तीन 'योग्य' विधायक हों तो वे सरकार गिरा सकते हैं या बना सकते हैं. एक रिटायर हो रहे नेता के लिए गर्वनरी का विकल्प भी उपलब्ध होता है. झारखंड के मुख्यमंत्री रहे मधु कोड़ा इस बात के ताज़ा उदाहरण है । मेरा मतलब कि अगर आप छोटे राज्य का एकेडेमिक आधार पर समर्थन करते हैं तो कोई एतराज़ की बात नहीं है, अगर आप उसे करियर ऑप्शन के तौर पर देख रहे हैं तो आपका भविष्य उज्ज्वल हो सकता है.लेकिन छोटे राज्य के सहारे अगर गरीबी दूर करने ,विकास की गंगा बहाने की सोच रहे है तो बिहार, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश से टूट कर अलग हुए झारखंड ,छत्तीस गढ़ और उत्तरा खंड की आम आवाम की राय लेनी चाहिए ।
>| क्या विवाहिता को सुश्री कहना अनुचित है? | |
| एक सज्जन ने मुझे लताड़ा है कि मैंने विवाहिता के लिए भी सुश्री का संबोधन दिया है जो कि गलत है! सुश्री का संबोधन केवल अविवाहिता के लिए ही होना चाहिए! यह मामला अब मैं ब्लॉग जगत की महापंचायत में रख रहा हूँ -अपनी समझ बुद्धि के अनुसार मैंने उन्हें यूं समझाया है - "मैं समझता हूँ कि सुश्री चूंकि वैवाहिक स्थिति को नहीं दर्शाता इसलिए आधुनिक रीति रिवाज में यह विवाहित महिलाओं के लिए भी प्रयुक्त होता है .... क्या कहते हैं प्रबुद्धजन ,शिष्टाचार नियामक और पंच लोग ? |
संजय ग्रोवर : संवाद घर | |
| कुछ खुरदुरी सी दो गज़लें / | कुछ बुरी-सी दो गज़लें |
| जोकि ये समझ रहे हैं मुझे कुछ पता नहीं है उन्हें जाके ये बता दो उन्हें ख़ुद पता नहीं है यूंही ख्वाहमख्वाह ही डरके कोई बात मान लेना इसे तुम हया न समझो, हरगिज़ हया नहीं है दुत्कारना दलित को, चालू को चाट लेना जो इसी को जीत समझे कभी जीत़ता नही है | दिखा जो उनको कीचड़ लिथड़ गए सब लीचड़ ठग-वग की जगमग से, चमक रहा है प्रांगण पढ़े-लिखे नंगों से सहम गए हैं अनपढ़ फ्यूज़-उड़े-कट-आउट कड़क रहे हैं कड़-कड़ |
कवितायन पर मुकेश कुमार तिवारी और फेमिनिस्ट पोएम पर मुक्ति | |
| कोई अकेला तो नहीं बूढ़ा होता | पर... माँ |
| हमारे बीच सभी कुछ भाग रहा हो हड़बड़ी में जैसे दीवारें मचलती है मुँह बाये नये रंगों के लिये या बाल धकेल रहे हों खिज़ाब को अपने से परे केवल एक उम्र का फासला स्थिर है और हम बुढ़ा रहे हैं एकसाथ | बाबूजी का लाड़ अपने जैसा था भाई का प्यार भी अनोखा था बहन के स्नेह का कोई सानी नहीं / पर इन सबसे बढ़कर था माँ थपकी देकर सुलाते हुये तुम्हारा मेरे सिर पर हाथ फेरना. |
| घीसू और माधव | हमारी रानी का महल |
| आजकल फिर प्रेम चंद का मशहूर कफ़न पढ़ना शुरू किया...जब मैं अपने देश में हिंदी पढ़ती थी, उस वक्त पहली मुलाक़ात हुई थी मेरी, घीसू और माधव से। लगता है कि प्रेम चंद के लफ्स बार-बार पढ़कर आजकल एक और, एक ख़ास, और पहले से अलग अहसास और असर मेरे अंदर पैदा करते रहते है। पढ़ने में, लगता है कि ज्यों-ज्यों घीसू और माधव अचानक असली व्यक्ति होते जा रहे हैं। जैसे उनकी शकल मेरे तरफ फोकस्ड हैं, जैसे मेरे तरफ देखते रहते है और घूरते रहते है, जैसे रोज़ मेरी तरफ होता है, जब मैं हजरतगंज या चौक या अमीनाबाद के मोहल्ले में घुमा करती हूँ। लगता है कि हर दिन मैं घीसू और माधव कि नज़र से मिलती हूँ, हज़ारों एकदम हिन्दुस्तानी आँखों से माधव और घीसू कि तस्वीर नजर आती हैं। यह तो एक बिलकुल पूरानी कहानी है, स्थितियां पूरानी, एक पुराना ज़माना और शायद एक पूर्व ज़माना...या यूं कहूँ "शायद ही एक पुराना या पूर्व ज़माना । | आदिमुझको नहीं पता कि लुक्नाऊ में एक रानी जीती थी। और उनका एक महल नहीं लेकिन दो महल थे । मैं सिर्फ एक अजनबी हूँ तो मैं जान नहीं सकती महाल कि अंदर सही-सही क्या क्या हो रहा है। फिर भी मुझको उत्सुकता हो रही है। बहार से मैं देखती हूँ कि महल के आसपास काफी मजबूत आदमी फिर रहे है, fancy and flashy अम्बसदोर गाड़ी चल रही हैं, काफी लोग अन्दर सफाई कर रही है और महाल पर बहुत कम हो रहा है। हमारे यहाँ की कहानियें में, रानियाँ कभी ज़ालिम कभी अच्छी हो सकती हैं। अगेर वह ज़ालिम होती तो उनका ज़ुल्म कल्पना के बहार होता। आमतौर पर, fairytales में, ज़ालिम रानी की बेटी भी होती है, लेकिन वह हमेशा एक पूर्व पत्नी की है। वह बेटी बहुत खुबसुरत होती है, और आखिर में, उसके घोड़े पर चलते हुए वीर की मदद से ज़ालिम रानी की महल से बच सकती है । |
अब मानसी जी के ब्लॉग से उनकी नयी प्रविष्टि और ’अदा ’ की काव्य-मंजूषा से बिलकुल अलहदा-सी प्रविष्टि की झलक देखें -
| मानसी पर मानसी तथा काव्य-मंजूषा पर स्वप्न-मंजूषा शैल | |
| मैं छोटे, बड़े सभी को सम्मान दूंगा | मेरा घर, मेरे बच्चे |
| पिछले साल, मैंने अपने स्कूल में बुलींग प्रिवेन्शन को लेकर काफ़ी काम किया था। कई वर्कशाप में जाकर मैंने जाना कि मनोवैज्ञानिक या साइकोलॉजिकल बुलींग बहुत खतरनाक होती है, और बच्चों में, ख़ासकर लड़कियों में होती पाई जाती है। विशेषकर उनके साथ जो स्कूल में नये आते हैं। उनको अनदेखा करना, अलग-थलग कर देना, बात न करना, मुँह फेर लेना आदि...और मैं सोचती थी, बड़ों की दुनिया कहाँ अलग है? आज सुबह स्कूल में ’आज का विचार’ पढ़ा गया, " मैं छोटे, बड़े सभी को सही सम्मान दूँगा।" | इन दिनों कुछ भी नया लिखने के लिए समय ही नहीं मिल पा रहा है...कारण मेरा छोटा बेटा मृगांक शेखर हॉस्टल से आया है.... और जैसा की आप जानते हैं बच्चे हॉस्टल से आयें तो सबसे ज्यादा खाने की ही बात होती है...कि क्या-क्या खिलाया जाए.... इसलिए ज्यादातर समय खाना बनाने और खिलाने में ही जा रहा है....हर दिन नई नई फरमाईश .... अपने खाने-पीने के मामले में मृगांक बहुत ही संयत है...लेकिन घर आते साथ ही सारा अनुशासन धरा का धरा रह जाता है...कहाँ मिल पता है उसे घर जैसा खाना ? |
जगदीश्वर चतुर्वेदी जी के चिट्ठे पर वैचारिक विमर्श का सामान सदैव तैयार मिलेगा । आज वहाँ प्रविष्टि है स्त्रीवादी आलोचिका सुधा सिंह जी की लेखनी से निःसृत, गौर फरमायें -
आज सारे भारत में उच्च शिक्षा के स्तर पर सेमेस्टर प्रणाली लागू करने की कवायद चल रही है। यू जी सी का दबाव है और दण्डानुशासन जनित भय भी कि लगभग हर विश्वविद्यालय का प्रशासन इसे लागू करने की प्रक्रिया आरंभ कर चुका है। इस प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा है पाठ्यक्रम में बदलाव। अब तक का जो पाठ्यक्रम चला आया है , जिसे पढकर मेरी पीढी और मेरी माँ की पीढ़ी बडी हुई है ,उससे स्त्री की कोई छवि निर्मित नहीं होती। बारह चौदह वर्ष की पढाई करने के बाद अगर प्रश्न किया जाए कि हमने जो अध्ययन किया उसके आधार पर बताएँ कि स्त्री कैसी थी, उसका संसार कैसा था, वह कैसे सोचती थी तो उत्तर नकारात्मक होगा। न तो इतिहास, न भाषा का अध्ययन, न खानापूर्ति के अलावा समाजशास्त्र स्त्री के बारे में कुछ बताता है।
वर्षा की प्रविष्टि पढ़िये उनके ब्लॉग पर, पढ़ते हुए कुछ-कुछ पूजा उपाध्याय याद आयीं -
"ज़िंदगी की पिकनिक खत्म होने लगी थी। नौकरी हासिल करने की मुश्किल भरी चुनौती सामने थी। मैं पहले यूनिवर्सिटी जाती फिर एक टुच्ची सी जगह पर दो-तीन घंटे की नौकरी पर। पैसे तो नहीं मिलते, अनुभव जरूर हासिल होता। नौकरी के लिये भी अपने स्कूटर पर सवार होकर इधर-उधर के खूब धक्के खाये। इंटरव्यू दिये।
दरअसल मेरे हिसाब से ड्राइविंग से आपके पास विकल्प तो बढ़ते ही हैं, मानसिक दृढ़ता भी बढ़ती है, सड़क पर दौड़ती गाड़ियों को ओवरटेक करने के साथ आप ज़िंदगी को ओवरटेक करना भी सीखते हैं। आगे बढ़ना सीखते हैं। मुश्किलों से जूझना सीखते हैं।
उनकी हास्यप्रियता और एक मित्र की सिफारिश ने उनकी रक्षा की । हुआ यूँ कि जब गोरे मिर्ज़ा को गिरफ्तार करके ले गये तो अँग्रेज सार्जेंट ने इनकी अनोखी सज-धज देखकर पूंछा कि "क्या तुम मुसलमान हो ?" मिर्ज़ा ने हंसकर जवाब दिया "मुसलमान तो हूँ पर आधा ।" वह इनके जवाब से चकित हुआ । पूछा "आधा मुसलमान कैसे ?" मिर्ज़ा बोले "साहब, शराब पीता हूँ ; सूअर नहीं खाता ।"
एक और महत्वपूर्ण प्रविष्टि से आप का परिचय कराता चलूँ । दिल-ए-नादाँ ब्लॉग पर गीतकार शैलेन्द्र के कृतित्व को रेखांकित करती जानदार पोस्ट है यह -
हिंदी का जो रंग शैलेंद्र जमाने में कामयाब हुए उसकी मिसाल नहीं। कैफी, साहिर और मजरूह जैसे गीतकारों ने भले ही अपनी अपनी शायरी में प्रलेस के मूल्यो को थोडा बहुत अपनाया लेकिन सिने गीत लेखन के क्षेत्र में वे पारसी थियेटर के गीत लेखन की परंपरा की कडी को ही मजबूती देते देखे गए। कहें तो देवनागरी लिपि में हिंदी की प्रतिष्ठा स्थापित कराने वाले शैंलेंद्र पहले गीतकार थे। हिंदी पट्टी यानी पूरब का रंग शैलेंद्र के बाद किसी के यहां नहीं देखने को मिला।
चलते-चलते दो तकनीकी प्रविष्टियाँ और इति-श्री !
| हिन्दी ब्लॉग टिप्स और हिन्दी टेक ब्लॉग की प्रविष्टियाँ - | |
| क्या आप अपनी सारी टिप्पणियां पढ़ना चाहेंगे? | ब्लॉगर विजेट : स्क्रऑल करते फॉलोवर्स |
आज ब्लॉग सर्फ़िंग के दौरान अचानक श्रीश पाठक 'प्रखर' जी की इस पोस्ट पर नज़र पड़ी- मेरी सारी टिप्पणियां इकठ्ठी हो सकती हैं क्या...? पोस्ट पढ़कर पता चला कि विभिन्न चिट्ठों पर की गई टिप्पणियां किसी धरोहर से कम नहीं। उन्हें फ़िर से पढ़ना मतलब पुरानी यादों | अपने फॉलोवर्स को दिखाए नए रूप में, आपके सभी फॉलोवर्स एक एक करके आते हुए दिखाई देंगे । इसमें आप अपने ब्लॉग या साइडबार के आकार के अनुसार इस विजेट को व्यवस्थित कर सकते हैं फॉलोवर्स की संख्या बदल सकते है, फॉलोवर्स के फोटो का आकार भी बदल पाएंगे। |
बस इतना ही ! शेष फिर !

















