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Saturday, March 13, 2010

कल मै भी बुढा होने वाला हु तब यही बुढऊ ब्लागर्स एशोसियेशन मेरे काम मे आयेगा ( चर्चा हिन्दी चिट्ठों की )

नमस्कार ! पंकज मिश्रा आप सबके साथ ..आपके लिक्खे चिट्ठो की चर्चा लेकर !krishna

कल ही वापस आया और आप सबने इतना प्यार दिया कि मन भर आया , और अच्छा लगा यह जानकर कि आप सब मुझको इतना प्यार करते है ..

समीर जी ने सवाल किया था कि रुद्रपुर कहां है ?

आदरणीय समीर जी रुद्रपुर उत्तराखण्ड के पन्तनगर जिले मे पडता है ! और यहा से आदरणीय रुपचन्द शास्त्री जी का घर ७० किलोमीटर है ..यहा पर सब कुछ अच्छा है बस एक तकलीफ़ बहुत बडी है कि मच्छर बहुते ज्यादे लगते है !

सारा कोशीश नदारद है इन नामुरादो के सामने ! जब मै यह सब लिख रहा हु तब भी साले मुझे ४ मच्छर काट रहे है अब समझ मे नही आता कि टाईप करु या इनको सम्भालू?

चलिये बाकी बातें तो होती ही रहेगी बात करते है श्री अरविन्द मिश्रा जी कि – मिश्रा जी कह रहे है कि वापस कीजिये प्लीज मेरी टिप्पणियाँ !

101_0482 टिप्पणियाँ भी एक सृजनकर्म  है -अगर मुख्य सृजन नहीं तो कोई गौंड भी नहीं -ब्लॉगजगत में चर्चा,प्रतिचर्चा और परिचर्चा की बहुत ही महत्वपूर्ण कड़ियाँ हैं टिप्पणियाँ -उनकी उपेक्षा कतई उचित नहीं हैं और नहीं उन्हें घूर घाट के किनारे लगाने की प्रवृत्ति होनी चाहिए .वे किसी भी तरह इतनी उपेक्षनीय नहीं हैं -टिप्पणीकार की  मानस पुत्र और पुत्रियाँ है टिप्पणियाँ! उनकी इतनी बेकद्री मुझे तो कतई रास नहीं आई!स्वप्नदर्शी ने नर नारी में लैंगिक  समानता दर्शाने की सक्रियता और उत्साह  में पक्षियों -मुर्गों में लैंगिक निर्ध्रारण के एक उपर्युक्त वैज्ञानिक शोध को संदर्भित किया और जब मैंने टिप्पणी में यह बताया कि स्तन पोषी प्राणियों में जिसमें मनुष्य भी है ,लैंगिक निर्ध्रारण चिड़ियों से भिन्न है तो वह टिप्पणी तो छोडिये पूरी पोस्ट ही डिलीट कर दी गयी! क्या एक वैज्ञानिक से यही अपेक्षा है कि वह सार्थक चर्चा करने के बजाय इस तरह के थर्ड ग्रेड पर उतर आये?पूरी पोस्ट ही डिलीट कर देना अपनी इमेज बचाए रखने का  'क्राईसिस कंट्रोल'  तो नहीं है ? हम विदेशों से अप संस्कृति तो सीख रहे हैं मगर वहां के कुछ सार्थक बातें क्यूं नहीं सीखते ? या हम अपने हिन्दी जगत  और गोबर पट्टी को हमेशा ऐसे ही डील करने के आदी हो गए हैं? वहां कोई भी वैज्ञानिक ब्लॉगर अपनी गलती मानने में ज़रा भी नहीं हिचकता ओर पूरी सहिष्णुता से टिप्पणी पर चर्चा करता .आभारी भी होता .मगर यहाँ तो हमें हमारी टिप्पणियाँ बिना हमारी अनुमति के डिलीट कर हमें अपने  गोबर पट्टी के होने की औकात बता दी गयी है

हमारे आपके सबके प्यारे ताऊ जी ने बुढऊ ब्लागर्स एशोसियेशन की स्थापना की है दुख यह है कि मै भाग नही ले सकता क्युकि अभी तो मै जवान हु :)

लेकिन मुझे इस बात का घमन्ड नही है क्युकि पता है कल मै भी बुढा होने वाला हु तब यही बुढऊ ब्लागर्स एशोसियेशन मेरे काम मे आयेगा …..

bba8 पहला तो ये कि आजकल किसी सेलेब्रेटी को ब्रांड अंबेसडर बनाना बहुत जरुरी है अत: हमने तुरंत मिस. समीरा टेढी जी से बात की "बुढऊ ब्लागर्स एशोसियेशन" की ब्रांड अंबेसडर बनने के लिये. और वो भी इस शर्त पर की वो इसके लिये जब भी मिटिंग होगी यहां पर आयेंगी. और साथ में यह भी कि बुढऊ लोगों को कहीं हार्ट अटेक ना हो जाये तो वो सफ़ेद बालों वाला विग और साडी में रहेंगी यानि भडकाऊ ड्रेस नही पहनेगी.
मिस. समीरा टेढी इस बात पर भडक गई. पर जब हमने उनको समझाया कि यह समाज हित का काम है सो थोडा त्याग भी करना चाहिये और आपको कौन सा रोज रोज आना है? बस मिटींग वाले दिन आना है जिससे मीटिंग मे सारे बुढ्ढे आपके दीदार के बहाने हाजिर हो जायें और हमारे इस BBA के मेंबर बन जायें. बडी मुश्किल से वो राजी हूई, पर आखिर हां भर ही ली.

आगे है शेफ़ाली पांडे जी और इनका कहना है कि आने दो हमें संसद में, क्यूंकि ....

दोनों की भोली भाली सूरत ही दिल को भाती है, दोनों की  छवि जितनी गिड़गिडाती  हुई, हो उतना  जनता और समाज को सुकून मिलता है| DSC00682दोनों का हाथ पर हाथ धर के  बैठे रहना कोई बर्दाश्त नहीं कर पाता| दोनों हर समय काम करते हुए ही अच्छे लगते हैं|

दोनों को तब तक नोटिस में नहीं लिया जाता, या महत्व को जानबूझ कर  अनदेखा किया जाता है, जब तक वेबगावत या विद्रोह ना कर दें, या कहिये कि पार्टी बदल लेने और अपनी स्वयं की  स्वतंत्र पार्टी बनाने की धमकी ना दे दें|

अजय झा जी ………………………..आह ! आह ! आह ! ( अमां तुमही तो कहे थे कि बधाई दीजीए ....ये इस ब्लोग की पांच सौंवी पोस्ट है ....मगर वाह नहीं कहिएगा  तभी तो कह रहे है आह ! )

ajayमैं खडा देखता हूं ,समय को ,
और समय देखता है मुझको ,
तुम चलाओ जब तक शैय्या बने ,
खत्म न हो जाए "शर" कहीं ?
टूटा तोडा गया कई बार,
हर बात तुम्हीं ने जोडा भी ,
बस डर इस बात का रहता है , इस टूट- अटूट में ,
कभी मैं भी न जाऊं ,बिखर कहीं .........

रतन सिंह शेखावत जी का फ़ैशन ब्रांड - धोती, कुरता और पगड़ी

ls1 तन पर धोती कुरता और सिर पर साफा (पगड़ी) राजस्थान का मुख्य व पारम्परिक पहनावा होता था , एक जमाना था जब बुजुर्ग बिना साफे (पगड़ी) के नंगे सिर किसी व्यक्ति को अपने घर में घुसने की इजाजत तक नहीं देते थे आज भी जोधपुर के पूर्व महाराजा गज सिंह जी के जन्मदिन समारोह में बिना पगड़ी बांधे लोगों को समारोह में शामिल होने की इजाजत नहीं दी जाती | लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इस पहनावे को पिछड़ेपन की निशानी मान नई पीढ़ी इस पारम्परिक पहनावे से धीरे धीरे दूर होती चली गई और इस पारम्परिक पहनावे की जगह पेंट शर्ट व पायजामे आदि ने ले ली | नतीजा गांवों में कुछ ही बुजुर्ग इस पहनावे में नजर आने लगे और नई पीढ़ी धोती व साफा (पगड़ी) बांधना भी भूल गई ( मैं भी उनमे से एक हूँ ) | शादी विवाहों के अवसर भी लोग शूट पहनने लगे हाँ शूट पहने कुछ लोगों के सिर पर साफा जरुर नजर आ जाता था लेकिन वो भी पूरी बारात में महज २०% लोगों के सिर पर ही |

और  राजकुमार ग्वालानी जी का कहना है कि पैरा नेशनल गेम्स का आगाज हो छत्तीसगढ़ से

raj-1 छत्तीसगढ़ के राज्यपाल शेखर दत्त ने छत्तीसगढ़ ओलंपिक संघ के मुख्य सरंक्षक का पद स्वीकार करने के साथ ही छत्तीसगढ़ में पैरा ओलंपिक की तर्ज पर पैरा नेशनल गेम्स करने की बात कही है। इसके लिए उन्होंने भारतीय ओलंपिक संघ के महासचिव राजा रणधीर सिंह से फोन पर बात करके उनको छत्तीसगढ़ आने का आमंत्रण दिया है।

अनिल पुसादकर जी बता रहे है थानेदारों को भ्रष्ट कहना आपकी ईमानदारी नही बेबसी का सबूत है गृहमंत्री जी!

anilPUSADKAR अपने क्षेत्र मे अवैध शराब की बिक्री न होने की घोषणा मंत्री ने बड़े गर्व से की।तो क्या वे सिर्फ़ अपने विधानसभा क्षेत्र के ही मंत्री हैं?क्या प्रदेश के अन्य हिस्सों से उन्हे कोई लेना-देना नही है?मेरा ये सवाल है कि अगर आप अपने क्षेत्र को सुधार सकते हो तो दूसरे क्षेत्र को भी ठीक कर सकते हैं।अगर आप ऐसा नही कर रहे हैं तो ये आपकी अक्षमता ही मानी जायेगी ना कि ईमानदारी।
मंत्री जी अगर आप ये मान रहे हैं कि थानेदारों का महिना बंधा है और अगर उनके खिलाफ़ कोई कार्रवाई नही हो रही है तो ये भी अपने आप मान लिया जायेगा कि वे भी कंही न कंही महिना दे रहे हैं।लेने वाला कोई भी हो सकता है?अगर आप कहें कि मैं नही लेता,अगर लेता तो उन्हे गालियां कैसे देता?तो मान भी लेंगे कि आप नही लेते।मगर कार्रवाई क्यों नही करते ये सवाल तो खड़ा ही है ना?आप नही लेते होंगे? तो भाई-भतीज़े लेते होंगे? नही तो दूसरे मंत्री लेते होंगे?,नही तो बड़े अफ़सर लेते होंगे?कोई ना कोई तो लेता ही होगा वर्ना मंत्री को पता होने के बाद भी कार्रवाई क्यों नही हो रही है?

सुमन जी का लेख -वादा लपेट लो, जो लंगोटी नहीं तो क्या ?  ( माफ़ करियेगा फ़ोटो नही लग पाया )

इनमें अनाज सब से मुख्य है। गरीब को रोटी चाहियें, परन्तु हमारी खाद्य नीति ने गरीब को भूखा मरने पर मजबूर कर दिया। लगता है हमारे केन्द्रीय खाद्य मंत्री शरद पवार के भी कुछ निहित स्वार्थ थे जिसके कारण उन्होंने आयात निर्यात का मकड़जाल फैलाकर कुछ बड़ों को शायद फायदा पहुंचाने की कोशिश की। उन्होंने अक्सर ऐसे विरोधाभासी बयान दिये जिससे एक तरफ अनाजों के दाम बढ़े जिस से उपभोक्ता प्रभावित हुए परन्तु दूसरी तरफ उत्पादकों तक फायदा नहीं पहुंचने दिया गया। यह फायदा बिचौलिए ले उड़े। कभी कहा गया अनाज आयात किया जायेगा, कभी कहा गया गोदामों में अनाज इतना भरा हुआ है कि उनको आगे के लिये खाली करना जरूरी हो गया है। शक्कर के सम्बंध में भी गलती से या जानबूझकर उलटफेर वाली नीतियाँ अपनाई गईं। उपभोक्ता ऊँचे दामों पर शक्कर खरीदने पर मजबूर हुआ, दूसरी तरफ आयातिति खांडसरी बन्दरगाहों पर पड़ी सड़ती रही।

अब बारी कविताओ की दो कविताये -

१-कविताएँ और कवि भी..

२-“…..कण चाहता हूँ..” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

 

शुभ्र वसना !
शब्दों में रंग ना
कैसे उतारूँ चित्र सना
तुम्हारा अंग ना -
कोरा सजना
सज ना !
चंचल आँख ना
पलक कालिमा घना
सना
नेह यूँ आखना
मैं ताकता, ताक ना
शुभ्र वसना
सज ना

मेरा परिचय यहाँ भी है!

नही कार-बँगला, न धन चाहता हूँ।
तुम्हारी चरण-रज का कण चाहता हूँ।।
दिया एक मन और तन भी दिया है,
दशम् द्वार वाला भवन भी दिया है,
मैं अपने चमन में अमन चाहता हूँ।
तुम्हारी चरण-रज का कण चाहता हूँ।।
उगे सुख का सूरज, धरा जगमगाये,
फसल खेत में रात-दिन लहलहाये,
समय से जो बरसे वो घन चाहता हूँ।
तुम्हारी चरण-रज का कण चाहता हूँ।।

अब दिजिये इजाजत , नमस्कार !

Thursday, February 04, 2010

आखिर ताऊ की हिंदी चिठ्ठा चर्चा शुरु हो ही गई..(चर्चा हिन्दी चिट्ठों की )

नमस्कार , चर्चा हिन्दी चिट्ठों के इस अंक के साथ मै पंकज मिश्रा ! चर्चा को मिल रहे आप सबके इस सपोर्ट के लिये हम सब आप सबके बहुत – बहुत आभारी है और आशा है कि आगे भी आप सबका सहयोग भरपुर मिलता रहेगा!

circus2

 

सर्कस यह नाम शायद आने वाली पीढ़ी के लिये अपरचित हो जाएगा, बदलते दौर में करतबों की बाजीगरी अब मुश्किल हो चली है, जहां एक डेढ़ दशक पहले जिस शहर में सर्कस लगना होता था, इसके तम्‍बू व पण्‍डाल लगते ही लोग रूचि लेने लगते थे कि कब शुरू होगा, और अब इसका बिल्‍कुल उल्‍टा होने लगा है, अब सर्कस कम्‍पनी शहर में प्रवेश करते ही प्रचार-प्रसार करने लगती है कि दूर-दराज के लोग भी इसे देखने के लिये पहुंच सकें, किसी भी शहर में कम से कम अवधि इसकी एक माह होती है, 25-30 वाहनों के काफिले में इनका पूरा साजो-सामान पहुंचता है और फिर एक बड़ा तम्‍बू लगाकर इसका रिंग तैयार किया जाता है, जिसके चारों तरफ दर्शकों के बैठने की व्‍यवस्‍था रहती है

कुछ ऐसी ही यादों से परिचित करवा रहा है आपको यह ब्लाग गुमनाम होता सर्कस!

आखिर ताऊ की हिंदी चिठ्ठा चर्चा शुरु हो ही गई..(चर्चा हिन्दी चिट्ठों की )

 

अभी कुछ समय पहले ही ताऊ और रामप्यारी ने केश वर्धक तेल, कद वर्धक तेल, भाग्य वर्धक तेल और ब्लाग हिट कराऊ एवम टिप्पणी खींचू तेल बेचना शुरु किया था पर जैसा ताऊ के साथ हमेशा होता आया है वही हुआ. यानि सब माल उधारी पर बांट दिया और रकम वापस आई नही और ताऊ की ये दुकान भी बंद होगई.
अब ताऊ और रामप्यारी ने बैठकर विचार विमर्श शुरु किया कि क्या किया जाये? महंगाई के जमाने में बिना काम धंधे गुजर बसर भी बडी मुश्किल है. संतू गधा भी अब पढ लिख कर आ चुका था सो उससे भी विचार मांगे गये. संतू आजकल ब्लाग जगत में दिन भर निर्बाध घुमता था और पढा लिखा तो था ही सो उसने अपने विचार व्यक्त किये कि - ताऊ, आजकल सबसे ज्यादा चर्चा मे है चिठ्ठों की चर्चा...
ताऊ बोला - यार संतू, यहां बात होरही है काम धंधे की और तू बीच मे ले आया ये चिठ्ठों की चर्चा का खटराग...अरे तेरे को क्या इसलिये लिखाया पढाया था कि तू दिन भर बैठा यहां ब्लाग पढता रहे और हिरोगिरी करके हमारी छाती पर मूंग दलता रहे? अरे नामाकूल..तुझे पढा दिया..लिखा दिया...अब कुछ कमा कर बता...
संतू बोला - ताऊ...कूल डाऊन...कूल डाऊन..मेरे पास एक बहुत ही जबरदस्त आईडिया है कमाने का...
ताऊ जबरदस्त आईडिये के नाम पर तुरंत ही बीच में बोल पडा - अरे जल्दी बता...जल्दी बता...
संतू गधा बोला - ताऊ..वेट..वेट...आई एम गोइंग टू टेल यू... द होल प्लान...यू नो...?
ताऊ बोला - अरे सुसरी के...जल्दी बता...यो तेरी अंगरेजी बात मे झाड लेना...
और संतू ने सारा प्लान ताऊ और रामप्यारी को समझा दिया. उसी अनुसार अब ताऊ ने निम्न बिजनेस करना तय किया

चलते है डा. साहब के तरफ़ और देखते है कि टिप्पणी क्या कोई कर्मकांड है?

अब आज की शीर्षक चर्चा ..... देखिये मानव मन  ही ऐसा है कि वह अपनी प्रशंसा सुनना चाहता है .ऐसा न होता तो चमचे चाटुकारों का बिलियन डालर का व्यवसाय न होता .जिनके चलते देशों के सरकारे हिल डुल जाती हैं .उनके पद्म चुम्बन से पद्म पुरस्कारों तक में भी धांधली हो जाती है .तो वही मानव मन  यहाँ ब्लागजगत में अपनी पोस्टों पर टिप्पणियाँ भी चाहता है .कौन नहीं चाहता ? मैं नहीं चाहता या समीर भाई नहीं चाहते . मगर हम उतनी उत्फुल्लता से दूसरों के पोस्ट पर टिप्पणियाँ नहीं  करते .समीर भाई अपवाद हैं . इस टिप्पणी शास्त्र पर बहुत चर्चा पहले भी हो चुकी है -मैं विस्तार नहीं करना चाहता .मगर यह भी है कि टिप्पणी की चाह एक व्यामोह नहीं बन जाना चाहिए .एक व्यसन न हो जाय टिप्पनी पाने का .आप श्रेष्ठ रचोगे समान धर्मा लोग मिलगें ही ,टिप्पणियाँ भी झकाझोर आयेगीं -आखिर ससुरी जायेगीं कहाँ ? मगर शर्त वही श्रेष्ठता की है .अन्यथा पीठ खुजाई का अनुष्ठान टिकाऊ नहीं है .संत लोग कहीं डोल डाल  लिए  तो  फिर मजमा उखड़  जाएगा और सन्नाटा छा जाएगा .संत लोग  कोई टिकाऊँ होते हैं कहीं?

बडी खुशी की बात है कि ब्लॉगगढ़ में आ गया गब्बर का बाप...खुशदीप

सांभा...
सरकार कहण लाग रि...कह देई गब्बरवा से...इब उसका भी बाप ब्लॉगगढ़वा में खूंटा गाढ़ देओ से...
गब्बर...
हमरा बुढ़ऊ हरि सिंह (गब्बरवा का बापू) तो शोले से भी पहल का टैं बोल गयो से...ई कौण हमार दादी के नए जणे की बात करण लागरि सरकार...
सांभा...
सरदार..ईब तो तोरी भलाई इसी में लाग री के तू भी मेरी तरियो चट्टान पे चढ़ धूनी जमाई ले...नहीं वो तेरा बाप तोहार भी गिच्ची दबा देईगा...

रायपुर ब्लागर मीट: कुछ रोचक अनुभव बता रहे है पंकज अवधिया जी

" क्या अभी तक आप बेकार है? जब हमने यह राजकुमार ग्वालानी जी से पूछा तो वे मुस्कुरा दिए| आशा है अब उनके पास कार आ गयी होगी?"
" अनिल जी ने बार-बार अलबेला जी को याद किया| उम्मीद है कि इस मंच में उनसे जल्दी ही मुलाक़ात होगी|"
" ब्लॉगर निर्मल साहू पूरे मन से संवाद सुनते रहे| उनके अखबार दैनिक छत्तीसगढ़ ने हिन्दी ब्लॉग जगत से आम लोगो परिचित कराने में अहम् भूमिका निभाई है| राज्य के ब्लॉगर इस अखबार के माध्यम से आम जनता से रूबरू होते ही रहते है| "

भ्रष्टाचार

भारतीय संस्कृति का बन गया ......आचार
स्वाद नया है , भ्रष्टाचार !!
राजनीति क्या ? राज्य समिती क्या ?
क्या नवयुवको के उच्य विचार
छेड़ खानी करे लड़कियों से
माता पिता से करे है, दुराचार
भारतीय संस्कृति का बन गया .......आचार
स्वाद नया है ,भ्रष्टाचार !!

विडम्बना

 

अक्सर -
सुबह सड़क पर
नन्हें बच्चों को देखती हूँ ,
कुछ सजे - संवरे
बस्ता उठाये
बस के इंतज़ार में
माँ का हाथ थामे हुए
स्कूल जाने के लिए
उत्साहित से , प्यारे से ,
लगता है
देश का भविष्य बनने को
आतुर हैं

एक मजदूर के घर में कैसे बनी खीर ??

My Photo

 

एक मजदूर के घर में कई दिनों से घर में खीर बनाने का कार्यक्रम बन रहा था , पर किसी न किसी मजबूरी से वे लोग खीर नहीं बना पा रहे थे। बडा सा परिवार , आवश्‍यक आवश्‍यकताओं को पूरी करना जरूरी था , खीर बनाने के लिए आवश्‍यक दूध और चीनी दोनो महंगे हो गये थे। बहुत कोशिश करने के बाद कई दिनों बाद उन्‍होने आखिरकार खीर बना ही ली। खीर खाकर पूरा परिवार संतुष्‍ट था , उसकी पत्‍नी आकर हमारे बरामदे पर बैठी। आज पूरे परिवार ने मन भर खीर खाया था , यहां तक कि उसके घर आनेवाले दो मेहमानों को भी खीर खिलाकर विदा किया था।
हमारे घरवालों को आश्‍चर्य हुआ , कितना खीर बनाया इनलोगों ने ?
पूछने पर मालूम हुआ कि उनके घर में एक किलो चावल का खीर बना था।
यह हमारे लिए और ताज्‍जुब की बात थी , दूध कितना पडा होगा ?
मालूम हुआ .. 1 किलो।
अब हमारी उत्‍सुकता बढनी ही थी ..चावल गला कैसे ?
उसमें दो किलो पानी डाला गया।
अब इतनी मात्रा में खीर बनें तो चीनी तो पर्याप्‍त मात्रा में पडनी ही है , पूछने का कोई सवाल नहीं !!

यही द्वन्द होने लगा है !

अब सोचने को रहा भी क्या है बाकी ,
मन को बस यही द्वन्द होने लगा है,
जिंदगी के सब ख्वाब धूमिल हो चुके,
इन्तजार का हर पहलु बंद होने लगा है !
उम्मीद दामन छुडाने को बेताब है,
धैर्य दिल का भी मंद होने लगा है,
तन्हाइयां कुरेदने लगी है जख्मो को,
असंतुलित भावो का छंद होने लगा है !

कैसे जीवन बीतेगा

राशन नही मिलेगा भाषन
पीने को कोरा आश्वासन
नारों की बरसात हो जब
तब कैसे जीवन बीतेगा
भीख मांगती भारी जवानी
नही बचा आँखों का पानी
बेशर्मी से बात हो जब
तब कैसे जीवन बीतेगा

अब तैयार हो जाईये विश्व स्तरीय ब्लोग्गिंग के लिए ....एक्शन और लीगल एक्शन के साथ ...-अजय भाई हम तो तैयार बैठे है !

से टिप्पणी से आहत होते ही उसके नाम से जो मन में आया लिख मारते हैं । अभी हाल ही के एक विवाद में , एक तरफ़ तो हिंदी ब्लोग्गिंग में उस खास नाम से किसी संवेदना , आत्मीयता होने का दावा किया जा रहा है , मगर उसके लिए किसी से भी ( बेशक ये किन्हीं एक नाम के इर्द गिर्द घुमाया जा रहा है , मगर प्रयास तो सामूहिक ही था ) कम से कम एक बार स्नेहपूर्वक गुजारिश तो करनी ही चाहिए थी ....मगर फ़िर आभासी होने हवाने का दावा करने वालों ने शायद इसे ठीक रास्ता नहीं माना चलिए ठीक भी था ........हालांकि मुझे अब भी संदेह है कि यदि यही सब किसी रिचर्डसन, राबर्ट , या ऐसे ही नाम और सुदूर नागरिकता वाले के साथ जुडता तो भी क्या उसे ये सब समझाया या जताया जा सकता था , तो अब जब बिना ये सब किए ....वो तथाकथित आभासी दुनिया वाले कदम को ही उचित माना गया तो फ़िर उसके अनुरूप ही आगे के लिए भी तैयार ही रहना चाहिए ।

महेन्द्र मिश्रा जी कुछ चुटकुले हँसने के लिए ....हा हा हा हा हा हा हा

Copy of DSCN0166प्रेमिका - क्या तुम मुझसे प्रेम करते हो ?
प्रेमी - इसमें क्या संदेह है .
प्रेमिका - तो क्या तुम मेरे लिए मर भी सकते हो ?
प्रेमी - नहीं प्रिये मेरा अमर प्रेम है.
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टिर्री टिर्रा से - एक नई बीमा की योजना बनी है जो बहुत अच्छी है जब तुम नब्बे के हो जाओगे तो तुम्हें हर माह ढाई सौ रुपये मिलने लगेंगे इस तरह आप अपने माँ बाप के लिए बौझा साबित नहीं होंगे .
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एक साहब ने अपनी नई नवेली स्टेनो को एक लंबी चिट्ठी डिक्टेट कराई और अंत में पूछा - मिस मेरी कुछ पूछना हो तो बताओ ?
स्टेनो - सर आपने डिअर सर और यूअर्स फैथफुली के बीच में क्या लिखवाया था ?
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जन्मकुंडली में विद्यमान विभिन्न राजयोगों की वास्तविकता (भाग 1)My Photo

 

ये सब देखकर लगने लगा है कि आज ये विद्या अपनी सत्यता से कितनी दूर निकल आई है। प्राचीन वैदिक, ज्योतिषीय ग्रन्थों में जो सत्य समाहित है, वो अधिकतर रूपकों और अभिप्रायो की सहायता से प्रकट किया गया है। लेकिन उन आवरणों को हटाकर उनके अभिप्रायों को पहचानने की बजाय आज अधिकतर ज्योतिषी अनुसन्धानों,आविष्कारों के नाम पर अपने अपने मन के कपोल कल्पित सिद्धान्तों,नियमों के ऎसे आवरण चढाते चले जा रहे है कि जिसके नीचे वास्तविक ज्ञान कहीं गहरे छिपता चला जा रहा है। यदि सच्चाई को पहचानना है तो प्राचीन शास्त्रों, ग्रन्थों की अन्त:कुक्षी में सत्य के जो बीज मन्त्र छिपे हैं, उन्हे फिर से खोज निकालना होगा।

अब दिजिये इजाजत , नमस्कार

Monday, February 01, 2010

भाई ! गाँधी की हत्या कितनी बार करोगे ?(चर्चा हिन्दी चिट्ठों की)

नमस्कार , पंकज मिश्रा आपके साथ ! आपके चिट्ठों की चर्चा लेकर .आपके समक्ष मै अपने आप को रखता हु तो बहुत खुशी होती है..आप सब अपना प्यार ऐसे ही देते रहे तो मेरा मनोबल बढता रहेगा ! सादर अभिवादन –पंकज मिश्रा !

चलते है आज के चर्चा की तरफ़!

सबसे पहले  शिर्डी यात्रा के कुछ पल बिताते है कुलवंत हैप्पी के साथ!

Shirdi_Saibaba शिर्डी मंदिर परिसर में आप मोबाइल और जूते लेकर नहीं जा सकते, ये बात मुझे प्रसाद वाले ने बता दी थी, जिसके चलते मैं जूते और मोबाइल फोन वहीं दुकान पर छोड़ दिया था। मुझे मंदिर परिसर के मुख्य दरवाजे पर जाकर पता चला कि मंदिर के मुख्य दरवाजे के साथ ही मोबाइल और जूते जमा करवाने के लिए लॉकर बने हुए हैं, जिनका शुल्क बहुत कम है। सुबह की आरती में शामिल होने के लिए मंदिर परिसर में पहुंच गया था। मैं खुश था कि आज भीड़ कम है,

अब चलते है चर्चा की तरफ़ और आज की रिपोर्टिंग गिरिजेश भाई कर रहे है - मछली बाजार से ...

बंगाली लोग कहते हैं मछली खाने से दिमाग तेज होता है। उपर की बातें बड़के भैया के निमंत्रण पर उत्तर प्रदेश मीन महोत्सव में खाई गई मछली से उपजी दिमागी तेजी से आई हैं। हमार कउनो कसूर नाहीं । ... हम तो बंगाली दादाओं की बात के कायल हो गए हैं लेकिन दाल में सुम्हा मछली पका कर तो नहिंए खा पाएँगे।
कल डा. अरविन्द मिश्र जी के निमंत्रण पर मोतीमहल लॉन, लखनऊ में आयोजित मीन महोत्सव में मैं सपरिवार गया था। भव्यता, विविधता और व्यवसायिकता देख कर हम लोग दंग रह गए। माया मैम की लाठी का असर हो या साल में एक बार ही सही, जग जाने की परम्परा का पालन हो, लग गया कि राज्य सरकार के अधिकारियों में दम है। ये बात और है कि वहाँ से लौटने के बाद
घटित दुर्घटना ने उन्हें गरियाने का मौकादे ही दिया और एक बार फिर मैं अपने पूर्वग्रह के किले में बन्द हो गया – ये सब बस वैसे ही हैं

सबसे पहले खबर यह है कि तोड़ दो गांधी के सारे बुत...खुशदीप जी कह रहे है!

बहन मायावती जी से भी मैं यही कहना चाहता हूं...अगर आप अपने कामों से गरीब-गुरबों, पिछड़े-कुचले वर्गों के दिलों में जगह बना लेती हैं (या कहीं कहीं बना भी ली है) तो फिर आपको किस बात का डर...फिर आप जिन्हें मनुवादी कहती रही हैं वो लाख कोशिश कर लें इतिहास में आपका नाम दर्ज होने से नहीं रोक सकते...मायावती जी के लिए मेरी सारी शुभकामनाएं हैं...अगर वो किसी दिन देश की प्रधानमंत्री बनती हैं तो मैं इसलिए खुश नहीं हूंगा कि एक दलित की बेटी प्रधानमंत्री बनी...मैं इसलिए खुश हूंगा कि बादलपुर गांव की बेटी तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद पढ़ लिख कर अपनी योग्यता के बल पर देश की सबसे बड़ी कुर्सी तक पहुंची...

और इसी तर्ज् पर पद्म सिहं जी कह रहे है कहो प्रिय, कैसी तुम्हरी प्रीत और वन्दना जी कह रही है ये तो है बावारा मन

कहो प्रिय, कैसी तुम्हरी प्रीत

स्वप्न दिखा कर दूर गए तुम

रूठ गए मधुमीत ..

कहो प्रिय, कैसी तुम्हरी प्रीत

मुझको अपने अंग लगा लो

व्याकुल मन की प्यास बुझा दो

 

ये मन का उड़ता पंछी
आकाश को पाना चाहता है
जिस राह की कोई मंजिल नही
उस राह को तकना चाहता है
प्रणय बंधन में बँधे मनों को
प्रेम का नव अर्थ देना चाहता है
नामुमकिन सी तमन्ना को
आइना बनाना चाहता है

चलिये चर्चा के अगले पडाव पर रुबरु होईये सुमन जी के विचारो से. सुमन जी कह रहे है भाई ! गाँधी की हत्या कितनी बार करोगे ?

तस्वीर दिखती है तो भी वह गाँधी की दूसरी हत्या है।
गाँधी जी के तथाकथित उत्तराधिकारी अमेरिकन साम्राज्यवाद की सेवा में लगे हुए हैं। साम्राज्यवाद का मुख्य दुश्मन महात्मा गाँधी थे। अगर उनके तथाकथित उत्तराधिकारी साम्राज्यवाद की सेवा में लगे हुए हैं तो यह गाँधी के विचारों का वध नहीं है तो और क्या है ? गाँधी जी के विचार आज पूरी दुनिया में प्रासंगिक हैं अगर उनका सत्य और अहिंसा का प्रयोग उनके अनुयायी अगर अपने जीवन में उतारे होते तो निश्चित रूप से साम्राज्यवादी शक्तियों का शोषण भारतीय जनता को आत्महत्या करने को मजबूर नहीं करता

मै कठपुतली की तरह तो नही पर ये रचना आप पढिये

कठपुतली

मेरे मालिक ,

लो मैं फिर प्रस्तुत हूँ
नाचने के लिए
तुम्हारे इशारों पर!
बहुत चाहा था मैंने,
झटक डालूँ
उन धागों को
जो बांधे हैं तुमने
मेरे हाथो से, पैरो से।
रच लूं एक नया आका

और अजय भाई जी  है लेकर !

रद्दी की टोकरी

कोशिशें अक्सर, मेरी, नाकामियां बन जाती हैं

मैं जो करता हूँ,
सब वो,मेरी ,
गलतियां कहलाती हैं।
कोशिशें अक्सर,
मेरी,
नाकामियां बन जाती हैं॥

सफेद घर मे काफ़ी दिनो के बाद आगमन हुआ है सतीश पंचम जी का और लिखा गया है कि अमां मुर्गों की लडाई देख रिया था, लो खां तुम भी देखो, वो मुटल्ले को देखो कैसे फडक रिया है ...

IMG0143A आज तो खाली फडक है। मुर्गा लोग को आज फडक करवा के जोडा बनाने का है। एकवीस दिन के बाद ये लोग में से तपास के एक मस्त जोडी निकालने का अउर बाद में वो लोग का मेन फाईट होने वाला है।
        मै थोडा हैरान हुआ, क्योंकि मुर्गे लडाना मैंने सुना है कि गैरकानूनी है।  उस शख्स से बातचीत चलती रही। बीच बीच में उन लोगों के मुर्गों को लडते देख रहा था। मुर्गों के कई जगह से छिल जाने के भी निशान दिख रहे थे। जो मुर्गे लड लेते उनको पानी भरी बाल्टी के पास ले जाकर पानी से तर किया जाता और उनकी मालिश की जाती। मालिश करने वाले को देख रहा था तो वह अपना पानी लगा गीला हाथ मुर्गे की पीठ पर से सहलाते हुए उसकी गर्दन की ओर ले जाता और कलगी को एकाएक उपर की ओर उठा मुंह से टॉ की आवाज निकालता। इधर मुर्गा भी शायद इस टॉ की आवाज का मतलब समझता था और उतनी ही जोर से बांग देता। पंख फडफडाता। लेकिन रहता मालिक के कब्जे में ही।

प्रवीण शाह जी डा. मिश्रा जी के भविश्यवाणी से बहुते प्रभावित हुए है और लिक्खे है कि धन्यवाद आदरणीय अरविन्द मिश्र जी . . . . . . . . . . . . . . . प्रवीण शाह

ऐसे कठिन समय में आदरणीय अरविन्द मिश्र जी ने कहा कि...
मेरे हिसाब से तो मौसम में २६ जनवरी के से ही स्पष्ट चमत्कारिक बदलाव आना शुरू हो जायेगा -खूब सूरज की रोशनी मिलेगी -ठंडक काफूर हो जायेगी -४ परवरी तक तो मौसम पूरी तरह सामान्य हो जायेगा ! २७-३० के बीच थोड़ी वर्षा के भी योग हैं !
अब देखना है संगीता जी की भविष्यवाणी सच होती है या मेरी -मेथोदोलोजी दोनों की एक है आगमनात्मक ! मैं निर्गमनात्मक का अल्पग्य हूँ मगर इस बार रिस्क ले रहा हूँ !

हाँ हम भी इन्सान हैं, अपनी कमजोरियों को सुनना हमें भी अच्छा नहीं लगता बुरा लगता है ऐसा कह रहे है विवेक रस्तोगी जी !

केवल अपने पास इतना रखना चाहिये कि अपनी जिंदगी आराम से निकल जाये, ज्यादा मोह भी बुराई की जड़ है। हमेशा अपनी हद में रहना चाहिये, जिससे आप को पता रहे कि आप किसी का मन नहीं दुखा रहे हैं, और अपनी मर्यादा की सीमा का उल्लंघन भी नहीं कर रहे हैं

रतन सिहं जी बता रहे है ग्वार पाठे की और खाशियत "एलोवेरा " ब्लॉग ट्रैफिक के लिए भी है खुराक

रामबाबू के ब्लॉग पर गूगल से आने वाले पाठकों द्वारा किये गए सर्च के विश्लेषण से मुझे पता लगा कि वहां आने वाले पाठकों में से ९०% पाठक एलोवेरा के बारे में सर्च करके आये थे | बस उसी वक्त मुझे लगा क्यों न एलोवेरा पर एक पोस्ट लिखकर ज्ञान दर्पण पर भी गूगल से कुछ और पाठक हासिल किए जाए | और इसी बात को ध्यान में रखते हुए कि एलोवेरा ब्लॉग पर ट्राफिक बढ़ाने के लिए एक बढ़िया की-वर्ड है पिछले दिनों २३ जनवरी २०१० को हमने भी ज्ञान दर्पण पर एलोवेरा के नाम से एक पोस्ट ठेल दी

और आज से चर्चा मे एक नया कालम जोडा गया है ! आप अपने अगले प्रकाशित होने वाले किसी विशेष  पोस्ट का ट्रेलर एक दिन पहले हमारे इस मंच पर दे सकते है .इसके लिये आप को पोस्ट की कुछ लाईने प्रकाशित होने वाले समय और तारीख के साथ hindicharcha@googlemail.com पर दे दिजिये बस ! आगे हमारा काम :)

आज का ट्रेलर नीचे है !

ट्रेलर

2 फ़रवरी 2010 सुबह 4:44 AM ताऊ डाट इन पर पढिये एक सनसनी खेज पोस्ट
गांधीजी अपना ब्लाग बनवाने ताऊ के पास आये!
ताऊ और गांधीजी विचार विमर्श करते हुये
बापु - हां तुम बिल्कुल सही समझे ताऊ. वही ... बस फ़ट से एक हिंदी ब्लाग मेरा भी बना दो. मैं अपनी जनता के नाम अभी एक संदेश पोस्ट के द्वारा दूंगा. और उसका नाम रखो "बापू का प्रथम ब्लाग" ताऊ - बापू ...बापू...आपके हाथ जोडूं..पैर पडूं...आप इस चक्कर मे मत पडिये...ये आपके काम का नही है..आप तो सेलीब्रीटी हो और सब सेलेबरीटीज ट्विटर पर टरटराती हैं..बापू..आप तो ट्विटर पर अकाऊंट बना कर आपका सत्याग्रह वहां से चलाईये....और हिंदी ब्लाग के भी कुछ लोग वहां टरटराया करते हैं...तो आपका मन कहीं उनसे मिलने का हो तो उनसे वहीं मिल लेना.
पूरी बातचीत ताऊ डाट इन पर २ फ़रवरी २०१० मंगलवार सुबह ४:४४ AM पर

अब दिजिये पंकज मिश्रा को इजाजत , नमस्कार!

Friday, January 29, 2010

चिठ्ठाचर्चा डोमेन डकैतों द्वारा लूटा गया? (चर्चा हिन्दी चिट्ठों की )

 

नमस्कार. पंकज मिश्रा आपके साथ !  चर्चा हिन्दी चिट्ठों के इस अंक मे मै आपका हार्दिक स्वागत करता हु! आज रतन सिंह शेखावत जी के माध्यम से काफ़ी IMG0040Aकुछ जानने का मौका मिला और उसी का नतीजा है हमारा यह नया वेब साईट जो कि मेरे बारे मे व्यक्तिगत जानकारी देता है आप इस साईट पर जाकर दो मिनट का समय दिजिये और यहा आकर बताईये कैसा लगा हमारा यह नया प्रयास?!

चलिये चर्चा की तरह चलते है .शुरुआत करते है आज कल चल रहे सबसे ज्वलंत मुद्दे पर चिट्ठा चर्चा डाट काम बनाम डोमेन ! आज इस बात को लेकर काफ़ी पोस्ट आयी है शुरुआत चच्चा टिप्पु सिंह जी के ब्लाग से . चच्चा पुछ रहे है चिठ्ठाचर्चा डोमेन डकैतों द्वारा लूटा गया? आप भी पढिये और बताईये!

आपका फ़रमाना है कि प्रथम दर्जे के लोग तो ब्रांड बनाते हैं.  तो आप क्या ई कहना चाह रहे हैं कि शुकुलजी अऊर मगरुरवा ने लोगों की इज्जत खराब करके ..उनकी मौज लेके ये ब्रांड बनाया है?  अऊर क्या इस ब्रांड की यही औकात है कि ये सडक पर पडा हुआ मिल रहा है? जरा किसी ब्रांड को आप खरीद कर तो बताईये.  जो डोमेन लिया गया है उसकी औकात ये है कि जैसे सडक पर पडा हुआ मिल रहा हो. अब भी उस से संबंधित ब्रांड तमाम सडक पर बिखरे माल जैसा उपलब्ध है।

हम कहता हूं कि जब एतना ही ब्रांडेड माल रहा त क्युं नाही संभाल कर रखा?  क्या आप अपना तिजोरी को सडक पर खुला छोड देंगे  अऊर ई उम्मीद करेंगे कि दूसरा  नेक नियती अऊर पुरातन के नाम पर कोई उसको उठायेगा नही?

और तभी बी एस पाबला जी का भी पोस्ट आया कि चिट्ठाचर्चा डॉट कॉम खरीदा गया तो अपराध की गर्त में चले गए!?

pabla-postवहीं मैंने स्पष्ट कर दिया कि यह डोमेन मेरा नहीं है, छत्तीसगढ़ के ब्लॉगर्स का है, उनकी एसोसिएशन का है, इसकी घोषणा खुलेआम की गई है, चोरी छिपे यह कार्य नहीं हुया है। मंच से ही इस व्यवधान का समाधान पूछे जाने पर उपस्थित साथियों में से मात्र संजीत त्रिपाठी जी को छोड़ कर, अग्रिम पंक्ति के ब्लॉगरों ने इस डोमेन का उपयोग अन्यत्र किए जाने का विरोध किया। (इस संबंध में संजीत त्रिपाठी जी ने अपनी पोस्ट में कुछ प्रश्न उठाए हैं, जिनका उत्तर मैं व्यक्तिगत तौर पर अगली पोस्ट पर देना पसंद करूँगा।) उस समय इस मुद्दे पर अधिकतर ब्लॉगर उदासीन ही दिखे। बाद में आपसी बातचीत में मुझे ज्ञात हुया कि वे इससे अनभिज्ञ हैं, इस चिट्ठाचर्चा नाम की चिड़िया को जानते ही नहीं क्योंकि वह उनके घर (ब्लॉग) पर कभी आई ही नहीं! तब मुझे लगा इसे ले कर मेरा गंभीर होना शायद गलत है व नाहक ही इस नाम की अहमियत का ढिंढोरा पीटा जा रहा है।

समीर लाल जी के माताजी को हमारी श्रद्धांजलि।कहते हैं मेरी माँ की ५वीं पुण्य तिथि है आज!!

mummyलगता है कि कल ही उससे बात करता था. ये ५ साल, एक खालीपन, कब निकल गये मैं नहीं समझ पाया. अभी भी वो रोज मिलती है मुझे ख्वाबों में. कोई रात याद नहीं जब वो न आई हो. जाने क्या क्या समझाती है. मैं झगड़ता भी हूँ वैसे ही जैसे जब वो सामने थी... फिर नींद खुलने पर रोता भी हूँ मगर वो रहती आस पास ही है. तन से नहीं...मन से तो वो गई ही नहीं. चुप करा देती है. कोई जान ही नहीं पाता उसके रहते कि मैं रोया भी.

मैं उसके नाम के साथ स्वर्गीय लगाने को हर्गिज तैयार नहीं आज ५ साल बाद भी. वो है मेरे लिए आज भी वैसी ही जैसी तब थी जब मैं उसे देख पाता था. तुम न देख पाओ तो तुम जानो

और आगे चलते है अजब ग़ज़ब दुनिया  मे और जानकारी लेते है कि एड्स पीड़ितों के लिए वैवाहिक वेबसाइट की !

08-hiv-aids200 गुवाहाटी। देश के एचआईवी पीड़ितों के लिए एक अच्छी खबर है अब उन्हें भी अपना मन पसंद साथी मिल सकता है। जी हां एचआईवी संक्रमित लोगों के लिए जल्द ही एक वैवाहिक वेबसाइट शुरु होने वाली है। (डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू डॉट एचआईटीसीएचआईवी डॉट कॉम) नामक यह वेबसाइट इंडियन नेटवर्क फॉर पीपल लिविंग विद एचआईवी/एड्स (आईएनपी+) की ओर से शुरु किया जा रहा है।
असम में रहने वाली एक विधवा जुनाली देवी को एचआईवी-संक्रमित लोगों के लिए शुरू होने वाली देश की इस पहली वैवाहिक वेबसाइट का बेसब्री से इंतजार है। गुवाहाटी की 35 वर्षीय जुनाली (परिवर्तित नाम) पूर्वोत्तर भारत के हजारों एचआईवी-संक्रमित लोगों में शामिल हैं। जुनाली के पति की तीन वर्ष पहले एचआईवी/एड्स से मृत्यु हो गई थी और अन्य एचआईवी-संक्रमित लोगों की तरह ही वह भी वेबसाइट के जरिए अपने लिए उचित साथी खोजना चाहती

डा. अमर कुमार जी है और कह रहे है मुला चिट्ठाचर्चा से इसका कउनौ रिलेशन नहिं है!

chimgअमएक्ठो रहें बड़े ओहदे वाले बड़का ब्लॉगर.. सो डिस्केशन डिस्केशन में उनका डिलेवर भी ब्लॉग-श्लॉग लिख लेने लगा रहा । उनकी काम वाली बाई भी कुछ कविताई की बेहयाई कर ले ती रही, सो  वहू  ब्लॉगर को पकड़ लिहिस । उनका नौकर भी कहीं से कुछ टीप टाप कर एक रेजिस्टर में चेंप देता रहा, छापे में कौन छापता.. सो खुदै कम्पूटर नामक एकु मशीन में लिख कर टाँग देता रहा । ई-सब आदत पकड़  लिहै  से  उनकी  अकड़  की  तो  आप  पूछौ मति ! एहर साहब को डीप-रेस्सन का शौक रहा, जब वह गोली खाय के मूड़ झुकाय के बईठें, तो यहि देख के, ई दुईनो तीनों जन उनके ठियाँ पर जाँय अउर टिपिया आवत रहें । गँज़ी चाँद पर टिपियावै में नौकरी जाय का खतरा, पर ईहाँ टिपियाये पर पगार बढ़वाय का जतरा । दफ़तर जाये से पहिले साहब जी नाश्ते में एक छोटा-कप बीति-ताहि बिलागरस ज़रूर लेत रहें । कुल मिला कर ज़ायज़ा यह कि उनकी एक सुसम्पन्न ब्लॉगर परिवार की  छवि  बनती  रही..

पाल ले इक रोग नादां... पर है गौतम राजरिशी  जी !

1 (1) "love means not ever having to say you are sorry"...हम जैसे कितने ही आशिकों के लिये परम-सत्य बन चुकी इस पंक्ति के लेखक एरिक सिगल की मृत्य हो गयी इस 17 005302जनवरी को और मुझे इस बात का पता चला बस कल ही। यहाँ कश्मीर वादी के इस सुदूर इलाके में राष्ट्रीय अखबार वैसे ही एक दिन
विलंब से आते हैं और विगत कुछ दिनों से छब्बीस जनवरी के मद्देनजर से बढ़ी हुई चौकसी की वजह से अखबारों पे नजर नहीं फेर पा रहा था।...अचानक से कल निगाह पड़ी इस खबर पर तो धक्क से रह गयी धड़कनें एकदम से।
वर्ष 1993 की बात थी। सितम्बर या अक्टूबर का महीना। राष्ट्रीय रक्षा अकादमी में मेरा पहला सत्र। हम  कैडेटों को एक-एक प्रोजेक्ट मिला था करने को। मेरे प्रोजेक्ट का विषय था "20th Century's Best-sellers"...और अपने उसी प्रोजेक्ट के सिलसिले में मेरा वास्ता पड़ा
LOVE STORY से। उफ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़्फ़...!!! जेनिफर औरओलिवर की इस अद्‍भुत प्रेम-कहानी ने मुझे मेरे पूरे वज़ूद को तरह-तरह से छुआ था और जाने
कितनी बार पढ़ गया था मैं इस सौ पृष्ठ वाले उपन्यास को। उपन्यास की पहली ही पंक्ति में लेखक नायिका को मार देता है और फिर इस ट्रेजिक प्रेम-कहानी का ताना-बाना कुछ इतनी खूबसूरती से बुना गया है...विशेष कर जेनिफर-ओलिवर के बीच के संवाद इतने मजेदार हैं कि आह...और अचानक से जो पता चला कि एरिक सिगल नहीं रहे तो दुखी मन मेरा ये पोस्ट लिखने बैठ गया। लव-स्टोरी की वो पहली पंक्ति याद आती है:

कुछ कल्पनाऐं, थोड़ा चिन्तन ओर बहुत सारी बकवास..पर चिट्ठाद्योग सेवा संस्थान............

मूल्य सूची:---
1. कविता----मूल्य 100 रूपये
2.गजल----मूल्य पचास रूपये प्रति शेर के हिसाब से
3.कहानी---250 रूपये
4.कहानी(धारावाहिक)----200 रूपये प्रति किस्त के हिसाब से(न्यूतम 3 किस्तें), 5 किस्तों की कहानी पर कुल मूल्य पर 15% की छूट दी जाएगी।
5.सामयिक लेख----कीमत विषय अनुसार निश्चित की जाएगी ।
6 हास्य-व्यंग्य----मूल्य 250 रूपये
05
7 चुटकुले/लतीफे----मूल्य प्रति चुटकुला 20 रूपये (एक साथ 10 चुटकुलों के साथ में 1 पहेली फ्री)

डा. मनोज मिश्रा जी है अभी तक आदमी बनकर तुम्हे जीना नहीं आया..........पर

तु म्हारे पास बल है बुद्धि है विद्वान भी हो तुम
इसे हम मान लेतें हैं बहुत धनवान भी हो तुम
विधाता वैभवों के तुम इसे भी मान लेते हम
मगर यह बात कैसे मान लें इंसान भी हो तुम।

और TSALIIM पर है ज़ाकिर अली ‘रजनीश जी कह रहे है .... का दूध पिया हो, तो सामने आओ।

एक किलो सोयाबींस से लगभग 10 लीटर दूध बनाया जा सकता है। यही कारण है कि यह सामान्य दूध की तुलना में सस्ता भी पड़ता है। हालाँकि सोया मिल्क के स्वाद में हल्की सी गंध होती है, जिसके कारण इसको बिना फ्लेवर के पीना मुश्किल होता है। इस दूध से आप पनीर भी बना सकते हैं। इससे बने पनीर को टोफू कहा जाता है। साथ ही सोया मिल्क का दही भी जमाया जा सकता है।
काफी समय पहले से सोया मिल्क चीन के जरिए भारत में प्रवेश पा चुका है। यह दूध भारत सहित लगभग पूरी एशिया में उपयोग में लाया जा रहा है। यहाँ तक कि जापान, कोरिया और मलेशिया जैसे देशों में तो सोया मिल्क के बहुत सारे खाद्य पदार्थ भी बनाए जाने लगे हैं, जिनमें सूप प्रमुख है।

और अंत मे चलते –चलते दो कविताये ताऊ डाट इन और काव्यमंजूषा से!

जीने दो मुझे (कन्या भ्रूण-हत्या )

जीने दो मुझे, मैं भी जिंदा हूँ

क्या दोष मेरा ? हूँ मैं अंश तेरा

ऐसे समाज पर, मैं बहुत शर्मिंदा हूँ !!

कहलाती पराई सदा ही रही

जन्म मिला तो, मृत्यु सी पीर सही

हैवानो मुझ पर दया IMGA000JPG (1)

ना कुक्ष में कुचलो हया करो !!

अमानवीयता से, सदा मैं हार रही

सुन बिलख-बिलख कर, पुकार रही

तेरे भीतर नन्ही जान हूँ मैं

तेरी ममता का सम्मान हूँ मैं

माँ तू भी, मुझे क्यों मार रही !!!

नदी में उगा एक शहर- वेनिस!! : उडनतश्तरी

नदी में उगा एक शहर- वेनिस!!
अथाह जल राशि
और
उनके बीच ऊग आया
एक शहर..
ऐसा शहर
जिसमें मकान हैं
बाजार हैं
दफ्तर हैं
samam11
लोग हैं..
बस नहीं है
तो इन सबको
आपस मे जोड़ती
उलझती, बल खाती
रिश्ते निर्धारित करती
काली काली सड़के..
उनको जोड़ता है
यह तरल तार..
मद्धम थमा हुआ..
जिसका अपना कोई रंग नहीं..
चेहरे पर मुस्कराहट लिए..
रात चाँद उतरता है

Sunday, January 24, 2010

"तुम मुझे खून दो मै तुम्हे आजादी दूंगा"(चर्चा हिन्दी चिट्ठों की)

नमस्कार, पंकज मिश्रा  आपके साथ…चर्चा हिन्दी चिट्ठों की –मे

मुंबई बम कांड का अपराधी आजकल मराठी भाषा का बहुत प्रयोग कर रहा है ,,अदालत के सवाल जवाब मे भी वह मराठी भाषा का प्रयोग करता है..राज साहब ठाकरे तो बहुत खुश होगे कि कोई तो उनकी पीडा समझता है :)

न्युज चैनल अखबार समाचार सभी जगह कसाब के इस भाषा प्रयोग का चर्चा हो रहा है और उन खबरिया बाजार मे कोई भी माई का लाल ये पुछने की जुर्रत नही कर रहा है कि ऐसे अपराधी से जेल मे दोस्ती कौन किया है जो उसको मराठी भाषा और सभ्यता सिखा रहा है ..क्या यह एक नेक काम है कि आप जेल के समय मे उस्का टाईम पास कर रहे है भाषा सिखाकर ?

चलिये चर्चा की तरफ़ चलते है…

रतन सिहः शेखावत जी है आज के चर्चा पर और बता रहे है एलोवेरा (ग्वार पाठा ) के बारे में जानकारी के अन्तर्गत -shekhawatji

Aloe Vera Plant एलोवेरा लिलेक परिवार का पौधा है जिसका उपयोग मनुष्य हजारों वर्षों से करता आ रहा है | दुनिया में २०० से अधिक  प्रकार की किस्मो का एलोवेरा पाया जाता है | इसमें एलो बाबिड़ेंसिस को मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए सबसे ज्यादा लाभदायक मन जाता है | इस पौधे का रस बुढ़ापा प्रतिरोधी तत्व है | इसके प्रयोग से इंसान लम्बे समय तक अंदरूनी और बाहरी तौर पर जवान बना रह सकता है | पौधे का सबसे ज्यादा महत्वपूरण है इसका रस जिसे बाजार में एलो जेल के नाम से जाना जाता है | एलोवेरा का रस इसके पत्तों से तब निकला जाता है जब पत्ते तीन साल के हो जाते है | तभी उस रस में अधिकतम पोष्टिक तत्व मौजूद होते है | गवार पाठे का पौधा गरम और खुश्क जलवायु में पनपता है इसे ज्यादा खाद या सिंचाई की जरुरत नहीं होती | किसान अपनी खेतों के मेड़ों पर व बंजर पड़ी भूमि में भी इसकी खेती कर सकते है |

समीर लाल जी का व्यंग लेख कैसे सच का सामना??

policeप्रोग्राम हमारा है, यह स्टेटमेन्ट चैनल की तरफ से, याने अगर हमने कह दिया कि ’यह सच नहीं है’ तो प्रूव करने की 1447094209_600c819d47_oजिम्मेदारी प्रतिभागी की. हमने तो जो मन आया, कह दिया. पैसा कोई लुटाने थोड़े बैठे हैं. जो हमारे हिसाब से सच बोलेगा, उसे ही देंगे.

पहले ६ प्रश्न तो लाईसेन्स, पासपोर्ट और राशन कार्ड आदि से प्रूव हो गये मसलन आपका नाम, पत्नी का नाम, कितने बच्चे, कहाँ रहते हो, क्या उम्र है आदि. लो जीत लो १०००००. खुश. बहल गया दिल.

आगे खेलोगे..नहीं..ठीक है मत खेलो. हम शूटिंग डिलीट कर देते हैं और चौकीदार को बुलाकर तुम्हें धक्के मार कर निकलवा देते है, फिर जो मन आये करना!! मीडिया की ताकत का अभी तुम्हें अंदाजा नहीं है. हमारे खिलाफ कोई नहीं कुछ बोल सकता.

तो आगे खेलो और तब तक खेलो, जब तक हार न जाओ.

प्रश्न ५ लाख के लिए :’ क्या आप किसी गैर महिला के साथ उसकी इच्छा से अनैतिक संबंध बनाने का मौका होने पर भी नाराज होकर वहाँ से चले जायेंगे.’

जबाब, ’हाँ’

एक मिनट- क्या आपको मालूम है कि आज पॉलीग्राफ मशीन के खराब होने के कारण यहाँ उसके बदले दो पुलिस वाले हैं. एक हैं गेंगस्टरर्स के बीच खौफ का पर्याय बन चुके पांडू हवलदार और दूसरे है मिस्टर गंगटोक, एन्काऊन्टर स्पेश्लिस्ट- एक कसूरवार के साथ तीन बेकसूरवार टपकाते हैं. बाई वन गेट थ्री फ्री की तर्ज पर.

आगे है अनिल पुसादकर जी और कह रहे है चोर-डाकूओं को तो पकड़ पा नही रहे हैं,धूल-मिट्टी से परेशान जनता को मुंह ढांक कर घूमने से मना कर रहे हैं,कंही देखा है ऐसा सड़ेला सिस्टम!

My Photoधूल और धुयें के लिये शायद दुनिया भर के प्रदूषित शहरों को टक्कर दे रहे रायपुर मे लोगों ने इससे निज़ात नही मिलती देख,मज़बूरी में मुंह पर स्कार्फ़,रूमाल,गमछा या चुनरी लपेट कर अपना बचाव करना शुरू कर दिया था।ये सिस्टम सालों से चल रहा था मगर राजधानी की एक्सपर्ट पुलिस की जितनी तारीफ़ की जाये कम ही होगी।उसने हाल ही में अपनी नाकेबंदी के बावज़ूद बैंक लूट कर भाग रहे लूटेरों और दिनदहाड़े हत्या करके फ़रार होने वाले हत्यारों को पकड़ने मे असफ़ल रहने के लिये ज़िम्मेदार समझा मुंह ढांक कर धूल-धुयें से बचने के तरीके को।सो तुगलक भी शरमा जाये ऐसा फ़रमान जारी कर दिया।अब शहर के लोगों को धुल-धुयें को पुलिस की मेहरबानी से निगलते हुये जीना होगा और उससे बचने के लिये मुंह ढांक कर घुमने का तरीका छोड़ना होगा।छोड़ा तो ठीक नही तो पुलिस के मुस्टंडे हर चौक-चौराहों पर तैनात रहेंगे और आपसे बदतमीजी करके आपके मुंह पर पड़ा कपड़ा नोच कर देखेंगे कंही आप डाकू,हत्यारे,लूटेरे या कोई बड़े शातिर आतंकवादी तो नही है।


रंजना [रंजू भाटिया] जी है  कुछ मेरी कलम से kuch meri kalam se ** पर और एक चित्र कविता उनके ब्लाग पर [kuch+sawal.jpg]
आगे है गिरिजेश राव जी 
कविताएँ और कवि भी..पर पुरानी डायरी से -12 : श्रद्धा के लिए

तुम्हारा बदन

स्फटिक के अक्षरों में लिखी ऋचा 
प्रात की किरणों से आप्लावित
तुम्हारा बदन।
दु:ख यही है
मेरे दृष्टिपथ में
अभी तक तुम नहीं आई।
कहीं  ऐसा तो नहीं
कि तुम हो ही नहीं !
नहीं . . . .
पर मेरी कल्पना तो है -
"तुम्हारा बदन

स्फटिक के अक्षरों में लिखी ऋचा

प्रात की किरणों से आप्लावित

तुम्हारा बदन।"

निर्मला कपिलाजी है वीर बहुटी – पर और कहानी का अन्तिम भाग प्रस्तुत है

मुझ अतृप्त की कितनी बडी परीक्षा लेना चाहती थी आप। मैं निराश हो गया। आपका तर्क था कि अगर मैं काम मे व्यस्त रहूँगी तो सुधाँशू के गम को भूल पाऊँगी, दूसरा मैं तिम पर बोझ बनना नहीं चाहती।क्या यही दुख हम दोनो मिल कर नहीं बाँट सकते थी? मैने तो सुना था कि माँ बाप बच्चों पर बोझ नहीं होते । बच्चे कभी उनका कर्ज़ नहीं चुका सकते। मगर माँ वो आपकी सोच थी मैं ऐसा नहीं सोचता था। मुझे लगता था कि मैं आपका और आप मेरा बोझ बाँट लेंगी--- जीवन भर की अतृप्त इच्छाओं का बोझ। खैर सारी आशायें छोड मैं फिर से लखनऊ आ गया। आते वक्त पिता जी की कुछ फाईलें और एक डायरी आप से बिना पूछे उठा लाया था। इतना तो उन पर मेरा हक बनता था। मुझे लगा था कि शायद मैं फिर कभी लखनऊ न आ पाऊँगा।यहाँ भी मन नहीं लगता कई बार आपको फोन किया महज औपचारिक बातें हुयी। मैं उसके बाद घर न

आज मिलेगे दिल से दिल-सजेंगी रायपुर में ब्लागरों की महफिल राजकुमार ग्वालानी जी कह रहे है!मेरा फोटो
छत्तीसगढ़ के ब्लागरों की एक महफिल सजाने की योजना करीब 10 दिनों से पहले बनी थी। पिछले रविवार को प्रेस क्लब में मजमा लगने वाला था, लेकिन अचानक शनिवार को रविवार का कार्यक्रम स्थगित करना पड़ा। छत्तीसगढ़ के ब्लागरों के चहेते और आदरणीय भाई अनिल पुसदकर जी उस दिन प्रेस क्लब की बैठक के साथ कुछ और कार्यक्रमों में बहुत ज्यादा व्यस्त थे। ऐसे में उनका महफिल में शामिल होना मुश्किल था। उन्होंने जब अपनी यह व्यथा हमें बताई तो हमने ब्लागर मित्रों से चर्चा की। सभी का एक स्वर में यही मानना था कि अनिल जी के बिना बैठक कदापि नहीं। वैसे भी बहुमत का जमाना है। जब बहुमत यही रहा कि अनिल जी के बिना महफिल नहीं सजेगी, मतलब नहीं सजेगी। सो महफिल स्थगित कर दी गई। इस स्थगन की सूचना यूं तो सबको दे दी गई, पर बिलासपुर के एक ब्लागर मित्र भाई अरविंद कुमार झा को संभवत: यह सूचना नहीं मिल सकी थी और वे रायपुर आ गए थे।

ताऊ पहेली – 58 अंक है आप भी मजा लिजिये अगले अंक के साथ अगले शनिवार

ये आप पढ सकते है तेरे बाप के पास तो मस्त पटाखा मॉल है न खुद चलता है न औरो को चलाने देता है।

मोहल्ले वाले कहते हैं की तेरे बाप के पास तो मस्त पटाखा मॉल है न खुद चलाता है न औरो को चलाने देता है। (एक छोटी सी बच्ची बोली) .अरे पागल वो सब तो तेरी माँ के बारे मैं कह रहे होंगे। उस छोटी सी बच्ची का बाप बोला। (मैं आप सभी लोगो से माफ़ी मांगता हूँ इसे लिखना नहीं चाहता था मगर लिखना पड़ा) ये शब्द हैं एक टी वी प्रोग्राम्म मैं एक छोटे से बच्ची की जो गंगुं बाई के रोल मैं सब को हँसाने का काम करती है।
काल शाम को बार बार टी वी मैं एड आ रही थी , मैंने भी ध्यान दिया तो पता चला की वाह रे भारतीय संस्कृत और व्यस्था, सब बड़े मजे से उस छोटी सी बच्ची के द्वारा कहे गए शब्दों के उपर हँसे जा रहे थे, हँसने वाले सब बड़े थे बच्चे नहीं। और उस बच्ची के माँ बाप भी थे।
परिकल्पना पर रवीन्द्र प्रभात

मैंने कभी महाप्राण निराला को नहीं देखा मगर एक व्यक्ति की आँखों में मैंने देखी है निराला की छवि
सुने नगमा ग़ज़ल की किताब आई थी जिसपर विस्तार से चर्चा हुयी . मैंने उन्हें उसी दौरान उन्हें सीतामढ़ी में होने वाले विराट कवि सम्मलेन सह सम्मान समारोह में आने हेतु ससम्मान आमंत्रित किया जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया ...आदरणीय आचार्य जानकी बल्लभ शास्त्री जी के उस सान्निध्य को याद करते हुए इस अवसर पर प्रस्तुत है उनकी वसंत पर आधारित उनकी एक अनमोल रचना -  


जब भी वसंत की चर्चा होती है राधा और कृष्ण की चर्चा अवश्य होती है , इस सन्दर्भ में आचार्य जी ने कभी कहा था ,कि - - कृष्ण सबके मन पर चढ़ते हैं। जीवन के यथार्थ में राधा ने कृष्ण को आत्मसात कर लिया। इसीलिए राधा वाले कृष्ण सबको भाते हैं। कृष्ण में तन्मय होने के कारण  राधा ने स्वयं को अलग से जानने की जरूरत ही नहीं समझीं। स्वयं वही हो गयीं, यानी कृष्णमय हो गयी । राजनीति ने कृष्ण को भिन्न-भिन्न रूपों में बांटा, पर एकमात्र प्रणय ने राधा को कृष्णमय बना दिया। प्रेम का यही शाश्वत रूप सही मायनों में वसंत का रूप है ।

रंग लाए अंग चम्पई

नई लता के

धड़कन बन तरु को

अपराधिन-सी ताके

निरंतर पर महेन्द्र जी है और बता रहे है
नेताजी जयंती "तुम मुझे खून दो मै तुम्हे आजादी दूंगा" नेताजी और जबलपुर शहर ....


तुम मुझे खून दो मै तुम्हे आजादी दूंगा का नारा देने वाले नेताजी सुभाष चंद बोस की आज जयंती है. स्वतंत्रता संग्राम के अमर सेनानी का यह नारा आज भी जनमानस के दिलो पर छाया हुआ है जो दिलो में जोश और उमंग पैदा कर देता है . वे कांग्रेस के उग्रवादी विचारधारा के सशक्त दमदार नेता थे . उन्होंने राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी को खुली चुनौती दी थी . महात्मा गाँधी ने नेताजी को दो बार कांग्रेस के अध्यक्ष के पद पर आसीन कराया था पर वे नेताजी की कार्यप्रणाली से असंतुष्ट थे .दूसरे विश्व युद्ध के समय महात्मा गाँधीनिरन्तर अंग्रेजो की मदद करने के पक्ष में थे परन्तु नेताजी गांधीजी की इस विचारधारा के खिलाफ थे और उस समय को वे स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए उपयुक्त अवसर मानते थे .
सुभाष चंद बोस का जबलपुर प्रवास पॉंच बार हुआ है . स्वतंत्रता के पूर्व सारा देश अंग्रेजो से त्रस्त था . स्वतंत्रता संग्राम में सम्मिलित होने वाले वीर क्रांतिकारियो को चुन चुन कर अंग्रेजो द्वारा जेलों में डाला जा रहा था . नेताजी ने भूमिगत होकर अंग्रेजो से लोहा लिया और आजाद हिंद फौज का गठन किया . सबसे पहले सुभाष जी को पहली बार 30 मई 1931 को गिरफ्तार कर जबलपुर स्थित केन्द्रीय जबलपुर ज़ैल लाया गया और यहं उन्हें बंदी बनाकर रखा गया जहाँ की सलाखें आज भी उनकी दास्ताँ बयान कर रही है .. दूसरी बार 16 फ़रवरी 1933 को तीसरी बार 5 मार्च 1939 को त्रिपुरी अधिवेशन मे सुभाष जी का बीमारी की हालत मे नगर आगमन हुआ था.

तस्मै सोमाय हविषा विधेम! (वैदिक बूटी सोम ,सोमरस और सोमपान ).....ऐसा कहना है साहब जी का हमारे बडे भाई श्री मान अरविन्द मिश्रा जी का!

101_0482 अध्ययनों से पता चलता है कि वैदिक काल के बाद यानी ईसा  के काफी पहले ही इस बूटी /वनस्पति की पहचान मुश्किल होती गयी .ऐसा भी कहा जाता है किसोम[होम] अनुष्ठान करने वाले ब्राह्मणों ने इसकी जानकारी आम लोगो को नही दी ,उसे अपने तक ही सीमित रखा और कालांतर मे ऐसे अनुष्ठानी ब्राह्मणों की पीढी/परम्परा के लुप्त होने के साथ ही सोम की पह्चान भी मुश्किल होती  गयी .सोम को न पहचान पाने की विवशता की झलक रामायण युग मे भी है -हनुमान दो बारहिमालय जाते हैं ,एक बार राम और लक्ष्मण दोनो की मूर्छा पर और एक बार केवल लक्ष्मण की मूर्छा पर ,मगरसोम की पहचान न होने पर पूरा पर्वत ही उखाड़ लाते हैं:दोनो बार -लंका के सुषेण वैद्य ही असली सोम की पहचान कर पाते हैं यानी आम नर वानर इसकी पहचान मे असमर्थ हैं [वाल्मीकि रामायण,युद्धकाण्ड,७४ एवं १०१ वांसर्ग] सोम ही संजीवनी बूटी है यह ऋग्वेद के नवें 'सोम मंडल ' मे वर्णित सोम के गुणों से सहज ही समझा जा सकता है .
सोम अद्भुत स्फूर्तिदायक ,ओज वर्द्धक  तथा घावों को पलक झपकते ही भरने की क्षमता वाला है ,साथ ही अनिर्वचनीय आनंद की अनुभूति कराने वाला है .सोम केडंठलों को पत्थरों से कूट पीस कर तथा भेंड के ऊन की छननी से छान कर प्राप्त किये जाने वाले सोमरस के लिए इन्द्र,अग्नि ही नही और भी वैदिक देवता लालायितरहते हैं ,तभी तो पूरे विधान से होम [सोम] अनुष्ठान मे पुरोहित सबसे पहले इन देवताओं को सोमरस अर्पित करते थे , बाद मे प्रसाद के तौर पर लेकर खुद स्वयम भीतृप्त हो जाते थे .कहीं आज के 'होम'  भी उसी परम्परा के स्मृति शेष तो नहीं  हैं?  पर आज तो सोमरस की जगह पंचामृत ने ले ली है जो सोम की प्रतीति भर है.कुछपरवर्ती  प्राचीन धर्मग्रंथों मे देवताओं को सोम न अर्पित कर पाने की विवशता स्वरुप वैकल्पिक पदार्थ अर्पित करने की  ग्लानि और क्षमा याचना की सूक्तियाँ भी हैं

कल्पतरु पर है विवेक रस्तोगी जी चैन्नई में भी कम लूट नहीं है.. लुटने वाला मिलना चाहिये..

यहाँ पर ऑटो मीटर से चलाने का रिवाज ही नहीं है, हमें अपने गंतव्य तक जाने के लिये रोज ही मगजमारी करना पड़ती है, रोज इन ऑटो वालों से उलझना पड़ता है, जितनी दूरी का ये लोग यहाँ ८० रुपये मांगते हैं, उतनी दूर मुंबई में मीटर से मात्र १५-१८ रुपये में जाया जा सकता है।

आशीष खन्डेल्वाल जी तकनिकी ब्लाग-लगाइए सर्च को धार - रिफाइन सर्च के चंद फॉर्मूले

इंटरनेट पर मनचाही सामग्री की तलाश के लिए मदद ली जाती है सर्च इंजन की। सामग्री से जुड़े की-वर्ड को जैसे ही सर्च इंजन में डाला जाता है, हजारों रिजल्ट मिलते हैं। अब समस्या शुरू होती है कि इनमें से कौनसे पेज को खोलकर देखा जाए, जिसमें जरूरत के मुताबिक सामग्री मिल सके। एक-एक कर पेज खोले जाते हैं और उसी रफ्तार से बंद भी कर दिए जाते हैं। अगर किस्मत अच्छी है तो जल्द ही सामग्री मिल जाती है और अगर आप किसी खास चीज को तलाश कर रहे हैं, तो हो सकता है कि इसके लिए कई घंटे लग जाएं

खंडहर हुए इन्द्र प्रस्थ में धृतराष्ट्र की तरह राज करना!!

सुरेश शर्मा की तुलिका सेअभी महाराष्ट्र सरकार ने जो निर्णय लिया है उसके दूर गामी परिणाम होंगे. समुद्र के किनारे मुंबई को बसाने और बनाने में उत्तर भारतीयों का भी हाथ है. उन्होंने ने भी अपने खून और पसीने से इस शहर को सींचा है. जितना हक़ तुम्हारा बनता है उतना ही हक़ उत्तर भारतियों का भी है. क्या मराठी भारत में महाराष्ट्र में ही बसते हैं? और कहीं नहीं?. जरा अकल से काम लो. जिस दिन ये कामगार मजदुर मुंबई से चले जायेंगे उस दिन तुम्हे दाल आटे का भाव पता चल जायेगा. अगर पीने को पानी भी मिल जाये तो वह बहुत बड़ी बात होगी. मुंबई में मराठी भाषियों से अधिक अन्य भाषा-भाषी लोग रहते है. जो उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, राजस्थान,  गुजरात केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश से आते है.मुंबई के कल कारखानों को अपने पसीने और मेहनत के दम चलाने वाले यही लोग हैं.

और अंत मे दो कविता शास्त्री जी और विनोद पांडेय जी के ब्लाग से

“नवगीत” (ड़ॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक

नीड़ में अब भी परिन्दे सो रहे,
फाग का शृंगार कितना है अधूरा,
शीत से हलकान बालक हो रहे,
चमचमाती रौशनी का रूप भूरा

रश्मियों के शाल की आराधना है।

छा रहा मधुमास में कुहरा घना है।।

सेंकता है आग फागुन में बुढ़ापा,

चन्द्रमा ने ओढ़ ली मोटी रजाई,
खिल नही पाया चमन ऋतुराज में,
टेसुओं ने भी नही रंगत सजाई,

"अपने ही समाज के बीच से निकलती हुई दो-दो लाइनों की कुछ फुलझड़ियाँ-3"

कुछ ऐसे भी वीर हैं,भारतवर्ष में आज,जिनकी अम्मा रोरहीं,देख पूत के काज.
मलमल का कुर्ता पहिन,घूम रहें हैं गाँव,खबर नही क्या चल रहा,आटा-दाल का भाव.
आलस में डूबे हुए,इतने हैं उस्ताद,घर में आते हैंमियाँ,दिन ढलने के बाद.
बीड़ी व सिगरेट में,फूँक दिए कुल देह,बेच दिए बर्तन कई,घर में मचा कलेह.
नही कोई परवाह इन्हें,घर हो या परिवार,चाहे भैया फेल हो,या हो बहिन बीमार.
जिंदा जब तक बाप है,तब तक है आराम,फ्यूचर इनका क्या कहें,इज़्ज़त राखे राम.

दिजिये इजाजत मिलते है अगले अंक मे तब तक के लिये नमस्कार!

 

Tuesday, January 19, 2010

मौज लेने वालों के सर्वनाश का इतिहास: संभल जाओ’(चर्चा हिन्दी चिट्ठो की )

JJ (3)नमस्कार ..चर्चा हिन्दी चिट्ठो के  इस अंक में मै पंकज मिश्रा आप सभी का स्वागत करता हु !  JJ
कुछ दिन पहले से चल रहे मौजुलिया रोग से पिडित ब्लाग समुदाय आप अकेले नही हो ..मौज और उससे होने वाले नुकसान बहुत पहले से चला आ रहा है और इसके बारे मे आज प्रवचन मे बताये है श्री श्री १००८ बाबा ताऊनंद जी महराज ने ! समीरानंद आशर्म के तत्वाधान मे चल रहे इस प्रवचन मे आत ताऊनंद जी ने बताया ’ मौज लेने वालों के सर्वनाश का इतिहास: संभल जाओ’

 

                                                                          कीर्तन करते भक्तगण और प्रवचनरत बाबा ताऊआनंद महाराज

भक्तगणों एक रोज कुछ सिद्ध तपस्वी महात्माओं का दल द्वारका आया. और वहां एक जगह ठहर गया. इन्ही यादव राजकुमारों और उनके चमचों को जब खबर लगी तो ये सारे मौज लेने की नीयत से वहां पहुंच गये. और उन महात्माओं की मौज लेने की युक्ति सोचने लगे. उन दुष्ट चेले चमचों ने उम्र और पद का भी लिहाज नही किया.
भक्तगणों फ़िर उन्होनें राजकुमार साम्ब को स्त्री के कपडे पहनाये और उसके पेट पर कपडे बांध कर उसको इन महात्माओं के सामने ले गये और पूछने लगे - हे महात्मा लोगों आप तो त्रिकाल दर्शी हैं. बताईये इस औरत को लडका होगा या लड्की?
महात्माओं को इस तरह अपनी मौज लिये जाना अच्छा नही लगा और वो क्रुद्ध होगये. और उन्होने कहा कि - अरे मंद बुद्धि और मौज मे उन्मत दुष्टों, इसको ना तो लडका होगा और ना ही लडकी होगी. इसको तो मूसल पैदा होगा और वही मूसल तुम्हारे कुल के विनाश का कारण बनेगा.

समीर लाल जी "समीर " जितनी बात की जाय कम जितने लेख छपे वो भी कम और जितने साक्षात्कार छपे ओ भी कम ही है ..
कल समीर जी का साक्षात्कार मीडिया मंच पर छपा तो देखकर सुखद अनुभूति हुई ..प्रेरणा स्रोत श्री समीर जी को बधाई !
समीर लाल  से  मीडिया मंच के एडिटर लतिकेश शर्मा की ख़ास  मुलाक़ात
मिलिए हिन्दी के सबसे बड़े ब्लागर समीर लाल से - कनाडा में रहने के बाद भी मेरा दिल हिन्दुस्तान में बसता है !

ब्लॉ ग  लिखनेवालों   के बीच यु तो कई नाम लोकप्रिय है ,लेकिन एक  ऐसा नाम  है, जिनसे ब्लॉग लिखनेवाला शायद ही कोई शख्स  वाकिफ़ ना हो . हम बात कर रहे 'उड़नतश्तरी' नाम से ब्लॉग लिखने वाले समीर लाल की . समीर  रहते तो कनाडा में हैं  ,लेकिन उनका दिल हिंदुस्तान में  बसता है   .  मीडिया मंच की टीम अपने  पाठकों को  समीर लाल से  मिलवाना चाहती थी . लेकिन इस रास्ते में कनाडा की दूरी आड़े आ रही थी . ऐसे   में  हमने  समीर लाल के लिए मेल के  ज़रिये  सवाल लिख कर भेज दिए और उन्होंने उसका ज़वाब लिख कर हमें वापस मेल कर दिया . तो आइये आप भी मिलिए ब्लोगिंग की दुनियां के सबसे बड़े लिखाडू समीर लाल से .

सवाल -ब्लॉगर बनने  का आईडिया कहा से आया और  क्या आप को उम्मीद थी की आप का ब्लॉग उड़नतश्तरी इतना पापुलर  हो जायेगा .

ज़वाब  - शुरुआती  दौर में मैं हिन्दी में कुछ कविताएँ लिखने का प्रयास किया करता था और याहू पर ईकविता ग्रुप से २००५ में जुड़ा. वहाँ हिन्दी कविता वालों का जमावड़ा था और वहीं से हिन्दी ब्लॉग के बारे में जाना.जब मार्च २००६ में अपना ब्लॉग बनाया, तब तक मैं ईकविता ग्रुप में एक पहचान तो बना ही चुका था लेकिन निश्चित ही  ब्लॉगजगत में आकर इतना स्नेह और लोकप्रियता हासिल होगी, यह कभी नहीं सोचा था.
चलिए  एक दुसरे शख्श से मुलाक़ात करवाते है ये है
श्री रतन सिंह शेखावत  जी ...आप है
राजपूत वर्ल्ड और ज्ञानदर्पण के मालिक
shekhawatji
    आज तक कितने बड़े से बड़े नुख्शे बता दिए है आपको हमको लेकिन अपने मुह मिया मिट्ठू नहीं बने है कभी ये है शान हमारे आज के शेखावत जी के !
आज शास्त्री जी को ब्लागजगत में एक साल पूरा होने को है और शास्त्री जी ने लिखा है
“ब्लॉग की दुनिया में एक वर्ष” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

मेरा परिचय यहाँ भी है!मित्रों! यह सब लिखने का उद्देश्य मेरी आत्म-श्लाघा नही है अपितु ब्लॉग की दुनिया के लिए यह सन्देश है कि लेखन में निरन्तरता से ही आगे बढ़ना सम्भव है।

आपके भीतर प्रेरणा जगे और हिन्दी-भाषा का उन्नयन आप सभी चिट्ठाकारों के द्वारा हो!इसी कामना के साथ

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”

अब अदा जी की बात दिल.!! हाय मेरा दिल ...!! 

हृदय इतना सशक्त और क्रियाशील है कि अनेक वर्षों तक लगातार बिना थकन या शिथिलता दिखाए हुए अपना कार्य करता ही रहता है...यह कभीजल्दी से धोखा भी नहीं देता...प्रति मिनट ५ लीटर रक्त हमारी नाड़ियों में प्रवाहित करता रहता है...यह अबाध रूप से २४ घंटे अपना कार्य करता है...यह अचेतन मन कि भांति ऐसा अंग है जो न नींद जानता है न आराम...बस चलता रहता है ......चलता रहता है....

साथ मे है दिगम्बर नासवा जी और कह रहे है गिर गइ थी नीव घर फिर भी खड़ा था और ताऊ जी की कविता "कवि चोर करेलवी कैसे कहलायेंगे"?

यूँ तो सारी उम्र ज़ख़्मों से लड़ा था
हिल गई बुनियाद घर फिर भी खड़ा था
बस उबर पाया नहीं तेरी कसक से
भर गया वो घाव जो सर पे पड़ा था
वो चमक थी या हवस इंसान की थी
कट गया सर जिसपे भी हीरा जड़ा था
कोई उसके वास्‍ते रोने न आया
सच का जो झंडा लिए था वो छड़ा था
आज का हो दौर या बातें पुरानी
सुहनी के लेखे तो बस कच्चा घड़ा था

“कवि चोर करेलवी कैसे कहलायेंगे”

कवि सम्मेलन में उदघोषक बोला
अभी तक आपने सुना झुमरू देहलवी को
अब सुनिये चोर करेलवी को
चोर करेलवी मंच पर आये और बोले
"प्रभुजी मोरे अवगुण चित ना धरो"
जनता चिल्लाई...बंद करो..बंद करो.. माल चोरी का है...
साफ़ साफ़ रैदास जी का है
चोर करेलवी बोले
आपने बिल्कुल दुरुस्त फ़रमाया
ये रचना बिल्कुल रैदास जी की है

अजय भाई ने हम सबकी बात का कद्र किया और वापस चर्चा कर्म मे लग गये है और कह रहे है कि यदि ऐसा ही है तो लीजीये अब चर्चा ही चर्चा..अजय भाई स्नेह बनाये रखिये !

ajay जी कहिन :- यहां पर आप मुझे अपनी ब्लोग पटरियां बिछाते हुए देख ही चुके हैं और आप सबने उसे स्नेह भी खूब दिया है ये यहां चलती रहेंगी मगर अब इसमें आपको बीच बीच में "चिट्ठा चालीसा " भी पढने को मिलेगी । जी हां चालीसा मैं इसे क्यों कह रहा हूं ये तो आपको पढने के बाद ही पता चलेगा ॥तो बोलिए जय बजरंग बली की जय ॥

तेताला :-अविनाश भाई के स्नेह निमंत्रण को हमने स्वीकार कर लिया है और इस मंच पर मेरे द्वारा सिर्फ़ और सिर्फ़ नए ब्लोग्स और नए ब्लोग्गर्स की चर्चा की जाएगी । उम्मीद है कि इससे नए ब्लोग्गर्स की न सिर्फ़ शिकायत कम होगी बल्कि उनका परिचय भी आप सबसे हो सकेगा और उनका प्रोत्साहन भी होगा ॥

महफ़ूज अली जी सिर्फ एक सवाल का जवाब आज मांगता हूँ...: महफूज़

कहाँ खो गयीं थीं तुम?

जवाब दो....clip_image003

मत पूछो हाल मेरा,

पर मेरे हर आंसू  का हिसाब दो.

बुना था जो ख़्वाब तुम्हारे साथ,

उसे धड़कन बना कर पास रखा था,

तस्वीर जो बनाई थी तुम्हारी,

उसे आँखों में बसा कर रखा था.

सिर्फ एक सवाल का जवाब आज मांगता हूँ तुमसे,

क्या दूर रह कर तुम भी उदास रहतीं थीं?

यशवन्त मेहता जी है देलही से और बता रहे है जब भुत दिखा जंगल में

जंगल में घूमते हुए लघुशंका लग गयी। हरे भरे पेड़ आमंत्रण दे रहे थे परन्तु हमने कृपा करी एक झाड़ी पर। निवारण क्रिया चल ही रही थी कि झाड़ी में से कुत्ते के भोकने की आवाज आई और महाराज झाड़ी से बहार आकर हमारे पीछे लग गए। हम दो अबोध बालक अपने वस्त्रो को सम्भालते स्कूल की और भागे। भय के कारन पीछे मुड़कर देखा नहीं। जब सांस थमी तो बहस शुरू हो गयी --- कुत्ता या भेड़िया। इस बात पर सहमति थी कि जंगल की औकात इतनी नहीं की भेड़िया वहां रहे और कुत्ते की इतनी औकात नहीं की वो जंगल में आ सकें। सो न तो वो कुत्ता था न भेड़िया। वो था भूत।

कैनवास पर है dr jsb naidu और लिख रहे है -

Dr Naiduभीषम जी, मेरे मित्र विश्वरंजन के बड़े दामाद हैं । वे गुजरात में अहमदाबाद में रहते हैं । उन्होंने मुझे एक SMS भेजा - Do you know that why the cars front glass are so large a nd the rear view mirror is too small .. ? .. because future is more important than the past .. althoough do not ignore the rear view but look ahead with a broad view .. मैं इसे पढ़कर प्रभावित हुआ । इस message के अनंर्तनिहित भाव ने मुझे इसे ब्लाग में लिखने प्रेरित किया । कहते हैं कि समझदार को इशारा काफी होता है । इसलिये सोचता हूं कि इसके आगे क्या लिखना .. ।

खुल्ला खेल फ़र्रुखाबादी (176) : आयोजक उडनतश्तरी पहेली चित्र प्रतियोगिता

चित्र देखिये और बताईये कि इस तस्वीर में कौन कौन है?

घुघूतीबासूती -हम फिर चूक गए..............घुघूती बासूती

मुझे लगता है कि यह एक सुअवसर था जब भारत में अंगदान, नेत्रदान व शरीरदान के महत्व की चर्चा लोगों से की जाती। मीडिया एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता था। समाचार पत्र इस विषय पर लिखते, टी वी में कुछ समय के लिए सिनेमा के महानायकों, भविष्यवाणियों, महामंत्रों, आस्थाओं आदि को विश्राम देकर ज्योति बसु ने जो किया वह क्यों किया और उससे कैसे मानव कल्याण होगा बताया जाता। चिकित्सकों को चर्चा के लिए बुलाया जाता। वे आँकड़े देते कि कितने रोगी गुर्दों की व नेत्रहीन आँखों की आस में बैठे हैं और कैसे हम ये उपयोगी अंग या तो जला देते हैं या गाड़ देते हैं, उनका दानकर हम अपने आप को व अपनी मानवता को नई ऊँचाइयाँ प्रदान कर सकते हैं। रोगियों व नेत्रहीनों का साक्षात्कार लिया जाता। जिनका जीवन अंगदान या नेत्रदान के कारण सुधरा है उनका साक्षात्कार दिखाया जाता। हमें बताया जाता कि हम किस पते पर कहाँ पत्र लिखकर या ई मेल करके अपने नेत्र या गुर्दे आदि के दान का प्रण ले सकते हैं। या फिर यह बताया जाता कि नेट पर कहाँ जाकर कोई फॉर्म डाउनलोड किया जा सकता है और भरकर कहाँ भेजा जा सकता है।

और अंत मे कविता रविकान्त जी के ब्लाग से अपना भारत इक झंडे के नीचे आये तो कैसे

खून-पसीना खेतों में तो जनता रोज बहाती है
लेकिन किसके हल के नीचे बोलो सीता आती है
षडयंत्रों का खेल रचाता घात लगाकर झूठ मगर
सच्‍चाई फिर भी लाक्षागृह से जिंदा बच जाती है
बेशर्मी जब-जब बढ़ती है मर्यादा की सीमा से
शूर्पणखा तब- तब लक्ष्मण के हाथों नाक गंवाती है
घर से निकलो तो हिम्‍मत की छतरी भी संग ले लेना
हिंसा की बूंदें बरसेंगीं, मौसम ये बरसाती है
अपना भारत इक झंडे के नीचे आये तो कैसे
कोई मुंबइ वाला है तो कोई यहां गुजराती है
सदियों की सब धूल हटाकर बंद कपाटें खोलीं तो
सुब्‍ह सवेरे अब खिड़की पर आकर धूप जगाती है
कागज़ और कलम के दम पर मुश्किल तुझको खत लिखना
पुरवाई के हाथ पठाई खुश्‍बू की ये पाती है
सोच रहा हूं मैं अब तुझको भूलूं पर ये शोख हवा
कानों को छूकर हौले से तेरी याद दिलाती
है

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अब कहते है राम राम मिलते है कल !उपर की दोनो फ़ोटो मेरी ही है :)

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