Friday, October 09, 2009

किस रिश्ते से उस बालिका को जनकपुत्री बताते हैं(चर्चा हिन्दी चिट्ठो की )

नमस्कार , आप सबको .
पंकज मिश्रा आपके साथ आपके चिट्ठो की चर्चा लेकर .  मुझे कुछ तकनीकी ज्ञान कम है इस मामले में इसीलिए  जो टूटी फूटी है लिख दे रहा हु .


सबसे पहले एक बात अपने यहाँ चल रही मजहब युद्ध पर !

मंदिर बाटा, मस्स्जिद बाटा , बाट दिया भगवान् को !

धरती बाटी सागर बाटा, मत बाटों इंसान को !!!

रूपचंद शास्त्री जी ने कमाल की रचना की है करावा चौथ पर , मन को मोह लेती है ये रचना .
"एक पाती सजनी के नाम" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

मैंने जब दर्पण देखा प्रतिरूप तुम्हारा पाया।

मेरे साथ तुम्हारा हरदम रूप उभर कर आया।।
बाहर की दौलत का क्या है, केवल आनी-जानी है।
अन्तरतम की प्यारभरी दौलत जग ने मानी है।।
जब तक सूरज-चाँद रहेंगे, प्यार करूँगा मन से।
मोह कभी नही भंग करूँगा मैं अपने प्रियतम से।।

आज कल कुछ अपराजक ततं हमारी ब्लॉग जगत में अपनी सिर्फ की धर्म प्रचार में लगे है , चलिए यहाँ तक टी ठीक है लेकिन प्रचार करने के चक्कर में किसी और धर्म को बकवास बताना गलत है ना बस इसी बाट को लेकर तकलीफ में है श्रीमान रस्टी साहब और उन्होंने लिखा है
धर्म प्रचार पर हंगामा हो रहा है हमारी ब्लॉग दुनिया में, इसे दूर करें !!!!!
विरोध में सात दिन ब्लॉग पर पोस्ट पब्लिश नहीं करुँगा…

अब आप बताइये क्या ये अराजक तत्व उनके इस विरोध  को मानेगे ?


वीर बहुटी कहानी का अगला अंक

एक सुन्दर रचना पढिये ,

छोड़ दो थोड़ा-सा दूध थनों में

गायों के बच्चों के लिए

पेड़ में कुछ टहनियां छोड़ दो

नई कोपलों के आने के लिए

थोड़ी-सी हवा छोड़ दो

गर्भवती स्त्रियों  के लिए

थोड़ा सा जल

मछलियों के लिए


राजीव ओझा जी बता रहे है मानसून के बदलते रवैये से नष्ट होने वाले जीव डालफिन के बारे में , उनके शब्दों में
खबर आई कि सरकार ने गंगा की डालफिन को नेशनल एक्वाटिक एनिमल घोषित कर दिया
है. ऐसा विलुप्त होती डालफिन को बचाने के लिए किया गया है. कभी पूरी गंगा
डॉलफिंस से भरी रहती थी, कहा जा रहा है कि अब यहां मुश्किल से दो सौ ही
बची हैं. बादलों में शरद ऋतु का चांद, बेमौसम बारिश और गायब होती डॉलफिंस,
ये सब पर्यावरण में बदलाव के खतरनाक संकेत हैं. बचपन में अपने गांव में
गंगा किनारे मुश्किल से आधा घंटा खड़े रहने पर पानी में गोता लगाती
सूंस(डॉलफिन) दिख जाती थीं लेकिन अब नहीं दिखतीं. गंगा की डॉलफिन समुद्र्र
में नहीं रह सकती और गंगा का पानी हमने इनके रहने लायक नहीं छोड़ा. बाघ और
मोर के बाद गंगा की डॉलफिन को नेशनल एक्वाटिक एनिमल का दर्जा मिलना गर्व
की बात तब होगी जब इनके वजूद को बनाए रखने में हम कामयाब होंगे. डॉलफिन के
बहाने हमें पर्यावरण के खतरों को समझना होगा. वरना कहीं डॉलफिंस हमेशा के
लिए ना चली जाएं.



ब्लाग जगा में चल रहे सम्प्रदाय वाद को लेकर ही एक पोस्ट लिखी है अनिल पुष्कर जी ने


सलीम भाई पांचो ऊंगलियां समान नही होती,जो जिस काम की हो उससे वही काम लिजिये दूसरा नही





पता नही ब्लाग क्या सोच कर बनाया गया था पर देख रहा हूं कि ये आजकल सिर्फ़
और सिर्फ़ ऊंगली करने के काम आ रहा है।खासकर धर्म के नाम पर।क्या ज़रूरत है
कि किस धर्म मे क्या अच्छा है और किस मे क्या गलत बताने की?क्या उसे उस
धर्म के लोग नही जानते? सलीम भाई अगर सभी लोग अपने-अपने धर्म को उसके सही
तौर-तरीके पर आत्मसात कर ले तो दुनिया चमन हो जाये।अब आप ये बताईये कि ये
पूछ कर आपको क्या ज्ञान मिला कि किस ईशदूत ने वेदों को लाया था
 
कार्टून : हमें भी खरीदना है गाँधी जी का घर !
मोटरसाइकिल से गंगा यमुनोत्री यात्रा से वापस आये है मनीष .

आप जानते ही होंगे कि भारतीय राष्ट्रीय
कांग्रेस की स्थापना किसी भारतीय ने नहीं बल्कि एक अंग्रेज ए.ओ. (अलेन
ऑक्टेवियन) ह्यूम ने सन् 1885 में, ब्रिटिश शासन की अनुमति से, किया था।
कांग्रेस एक राजनैतिक पार्टी थी और इसका उद्देश्य था अंग्रेजी शासन
व्यवस्था में भारतीयों की भागीदारी दिलाना। ब्रिटिश पार्लियामेंट में
विरोधी पार्टी की हैसियत से काम करना। अब प्रश्न
यह उठता है कि ह्यूम साहब, जो कि सिविल सर्विस से अवकाश प्राप्त अफसर थे,
को भारतीयों के राजनैतिक हित की चिन्ता क्यों और कैसे जाग गई?


एक गजल प्रस्तुत है अजनबी के ब्लॉग पर पढिये .
तुझसे मिलने का जो अंजाम असर देख रहा हूँ।


तुझे हर साँस, सुबह- शाम ओ‘ सहर, देख रहा हूँ।

खूब गुजरी थी मेरी रात, तेरे तसव्वुर की फिजां में,

फिर हुआ जो मेरा अंजाम-ए-सहर, देख रहा हूँ।
अजय झा जी की चिंता भी जायज है( कमाल है, हर साल पर्यावरण दिवस मनाते हैं...फ़िर ये बाढ क्यों....?)
अभी तो दिल्ली की गरमी से थोडी बहुत राहत मिलनी शुरू हुई थी...थोडी सी बूंदा
बांदी से लगने लगा था कि अब कम से कम इस बात का एहसास तो होगा कि सच में ही
अक्तूबर का महीना आ गया है।
 


हिमांशु भाई के ब्लॉग सच्चा शरणम पर
मैं सहजता की सुरीली बाँसुरी हूँ

घनी दुश्वारियाँ हमको बजा लें ।

मैं अनोखी टीस हूँ अनुभूति की


कहो पाषाण से हमको सजा लें ।

मैं झिझक हूँ, हास हूँ, मनुहार हूँ

प्रणय के राग में इनका मजा लें ।
सुर्ख गालों पे भंवर आज भी आते होंगे उस हँसी पर कई मर आज भी जाते होंगे
जबीं को अब भी कोईजुल्फ सताती होगी ज़हनो-दिल में कई अरमान जगाती होगी उन
निगाहों के दिए आज भी जलते होंगे अब भी आंखों में कई दर्द मचलते होंगे अब
भी पलकों में कोई ख्वाब सजाया होगा खुश्क होंठों पे कोई नाम तो आया होगा
उसके जलवों पे मुझे नाज़ वही है अब भी मेरी तारीफ़ का अंदाज़ वही है
 

धर्म के नाम पर भड़काने वाले लोगो के बारे में बता रहे है राकेश सिंह जी आप खुद पढ़ लो
नीचे विडियो भी है


क्यो क्या हुआ जनाब चक्कर में पड़ गये ना। ये तो होना ही था, आप लोग सोच
रहे होंगे कि मैं तो पुरुष हूँ तो अपनाउंगी का क्या मतलब तो जनाब सब्र
करिये ये बात भी साफ हो जायेगी। जी तो मेरी बात शुरु होती है यहाँ से। कल
ब्लोगवाणी देख रहा था कि अचानक मेरी नजर इक पोस्ट पर पड़ी जहाँ सलीम महाशय
से ये कहा जा रहा था
कि "मैं इस्लाम धर्म अपनाना चाहती हूँ लेकिन " जी तो
मुद्दा यहाँ से शुरु होता है। अब ये शुरु तो हो गया है कब खत्म होगा बताना
मुश्किल होगा। अब बात करता हूँ उस पोस्ट की जो रचना जी ने नारी ब्लोग पर
लिखा था सलीम जी के नाम। रचना जी का कहना था कि "मैं इस्लाम धर्म को
अपनाना चाहती हूँ बसर्ते मुझे स्कर्ट, जींस और शर्ट पहनने की आजादी, जब
मैं शादी करुंगी.



अपने हेमंत भाई बता रहे है कि किस तरह आदमी के लिए अस्वस्थता वरदान साबित होती है , हेमंत भाई आपको जल्द स्वास्थय लाभ के कामना 11111111
अस्वस्थता से

स्वास्थ्य-लाभ की यात्रा में

बड़े सरोकार हैं

और पैरोकार भी

बन जाता है स्वास्थ्य-लाभ


एक उत्सव-सा

इस भागमभाग से

कुटुम्ब और समाज

अदा

क्योँ दशानन रक्तपूरित कलश जनक के खेत में दबाता है ?
क्योँ
जनक के हल का फल उस घड़े से ही जा टकराता है ?
कैसे रावण के पाप का घड़ा कन्या का स्वरुप पाता है ?
क्योँ उस कन्या को जनकपुर सिंहासन बेटी स्वरुप अपनाता है ?
किस रिश्ते से उस बालिका को जनकपुत्री बताते हैं ?
मेरे विचार, फिर बार बार जनक के खेत तक जाते हैं


अविनाश वाचस्पति जी बुझा रहे है पहेली आप सादर आमंत्रित है .

पारुल जी  रचना
तंग सा हो चला था मैं फितूर से
कुछ तो थी खलबली जिंदगी में जरुर से
न थी अपनी ख़बर,न रास्तों का पता
माफ़ हो न सकी ख्वाहिशों की खता
ख़ुद को रोका बहुत,ख़ुद को टोका बहुत
हो चले थे ख्वाब भी मजबूर से ।
जिंदगी का कोई भी ठिकाना नही
इस लिए मुझको उस तक जाना नही
मैं बना लूँगा ख़ुद आशियाना कहीं
न चलूँगा ज़माने के दस्तूर से ।
हर शाम को एक
पहेली राम प्यारी के द्वारा ताउजी के ब्लॉग पर

अपूर्व जी का  रचना
वहीं कहीं पर
कुछ लपलपाती लंपट जुबानों ने
कुछ पैने हिंसक नाखूनों ने
कुछ लोहे के सख्त हाँथों ने
दबोच लिया था
एक अशक्त, बूढ़े मौसम की
इकलौती, जवान हवा को,
वहीं कहीं पर
उन्होने गला घोंट कर की थी
एक मासूम चीख की भ्रूणहत्या;
रश्मी जी  सुन्दर रचना

अब आज का नमस्कार !!
~~~आपका दिन शुभ हो ~~~~

23 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया विस्तृत चर्चा. मेहनत रंग ला रही है. बधाई.

अजय कुमार झा said...

वाह पंकज जी..चर्चा दिनानुदिन परिपक्व होती जा रही है..और आप विशेषज्ञता हासिल करते जा रहे हैं...हमारी शुभकामनाये आपके साथ है..

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

पंकज मिश्र जी!
ब्लॉगर्स तो चिट्ठाकारी में अपना रचनाधर्म निभा ही रहे हैं, मगर आप उनकी चर्चा करके निश्चितरूप से एक नया आयाम और मुकाम इन प्रविष्टियों को प्रदान कर रहे हैं।
बहुत-बहुत धन्यवाद!

Arvind Mishra said...

हिमांशु की कविता यहाँ पूरी दे देते तो एकबारगी यहाँ भी पढने का आनंद आ जाता !

ताऊ रामपुरिया said...

वाह , आज तो बहुत शानदार और चित्रमयी चर्चा कर डाली आपने. वाकई दिनों दिन निखार आता जारहा है इस चर्चा में. बहुत शुभकामनाएं.

रामराम.

अनूप शुक्ल said...

सुन्दर!

विनोद कुमार पांडेय said...

सुंदर चिट्ठा चर्चा...ब्लॉगर के चित्र के साथ तो और भी बढ़िया लगता है..सराहनीय और सफल प्रयास ..बधाई!!!!

Mithilesh dubey said...

वाह-वाह बहुत खुब। लाजवाब रही चिट्ठा चर्चा

Suman said...

nice

हिमांशु । Himanshu said...

चर्चा की नियमितता सबसे बड़ी विशेषता है चर्चा-चिट्ठे की । अकेले आप इतने नियमित हैं, आश्चर्य होता है ।

बेहद खूबसूरत चिट्ठे शामिल हुए हैं यहाँ । आभार ।

रचना said...

kyaa koi khaas vajeh haen ki naari blog ki post ki charcha yaahaan nahin haen

चंदन कुमार झा said...

बढ़िया लिंक्स के साथ अच्छी चर्चा ।

रचना said...

koi khaas vajeh haen ki naari blog ki post kaa koi jikr nahin hotaa yaahan

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

चिट्ठा चर्चा बहुत ही बढिया रही......

Pankaj Mishra said...

रचना जी इस बात के लिए  क्षमा चाहता हु आगे से हमेशा इस बात का ध्यान रखुगा कि आप का ब्लॉग शामिल किया जाए ,
सादर
पंकज मिश्र

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

पंकज मिश्र जी!
टिप्पणीकारा रचना जी का प्रोफाइल तो ब्लॉग-जगत पर है ही नही या खुल नही रहा है। यह आपकी महानता है कि आपने इनकी सही बात को गम्भीरता से लिया है।

रचना said...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
profile dikhana band kar diyaa haen aap naari blog hi padh liyaa karey profile maere kyaa rakhaa haen jab aaye thee profile saath laayee thee par samay kae saath saath uski jarurat kahtam ho gayee haen

रश्मि प्रभा... said...

chitron ke saath chiththa charcha bahut hi aakarshak laga........shubhkamnayen

Nirmla Kapila said...

इस सुन्दर चर्चा के लिये धन्यवाद्

दिगम्बर नासवा said...

सुंदर चिट्ठा चर्चा.........

Meenu Khare said...

सुन्दर!बढ़िया लिंक्स!

'अदा' said...

are waah !!
kya chittha charcha kiye hain
ye hi baat par dhanywaad ham diye hain...
sundar, manohaari...

Apoorv said...

पंकज भई आपकी चिट्ठाविश्व के प्रति इतनी लगन और इतना परिश्रम प्रशंसनीय भी है और प्रेरक भी..हम जैसे छुटभैया ब्लॉगर्स को जगह देना भी आपकी चर्चा के विस्तार की झलक देता है..बधाई

पसंद आया ? तो दबाईये ना !

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