Thursday, February 04, 2010

आखिर ताऊ की हिंदी चिठ्ठा चर्चा शुरु हो ही गई..(चर्चा हिन्दी चिट्ठों की )

नमस्कार , चर्चा हिन्दी चिट्ठों के इस अंक के साथ मै पंकज मिश्रा ! चर्चा को मिल रहे आप सबके इस सपोर्ट के लिये हम सब आप सबके बहुत – बहुत आभारी है और आशा है कि आगे भी आप सबका सहयोग भरपुर मिलता रहेगा!

circus2

 

सर्कस यह नाम शायद आने वाली पीढ़ी के लिये अपरचित हो जाएगा, बदलते दौर में करतबों की बाजीगरी अब मुश्किल हो चली है, जहां एक डेढ़ दशक पहले जिस शहर में सर्कस लगना होता था, इसके तम्‍बू व पण्‍डाल लगते ही लोग रूचि लेने लगते थे कि कब शुरू होगा, और अब इसका बिल्‍कुल उल्‍टा होने लगा है, अब सर्कस कम्‍पनी शहर में प्रवेश करते ही प्रचार-प्रसार करने लगती है कि दूर-दराज के लोग भी इसे देखने के लिये पहुंच सकें, किसी भी शहर में कम से कम अवधि इसकी एक माह होती है, 25-30 वाहनों के काफिले में इनका पूरा साजो-सामान पहुंचता है और फिर एक बड़ा तम्‍बू लगाकर इसका रिंग तैयार किया जाता है, जिसके चारों तरफ दर्शकों के बैठने की व्‍यवस्‍था रहती है

कुछ ऐसी ही यादों से परिचित करवा रहा है आपको यह ब्लाग गुमनाम होता सर्कस!

आखिर ताऊ की हिंदी चिठ्ठा चर्चा शुरु हो ही गई..(चर्चा हिन्दी चिट्ठों की )

 

अभी कुछ समय पहले ही ताऊ और रामप्यारी ने केश वर्धक तेल, कद वर्धक तेल, भाग्य वर्धक तेल और ब्लाग हिट कराऊ एवम टिप्पणी खींचू तेल बेचना शुरु किया था पर जैसा ताऊ के साथ हमेशा होता आया है वही हुआ. यानि सब माल उधारी पर बांट दिया और रकम वापस आई नही और ताऊ की ये दुकान भी बंद होगई.
अब ताऊ और रामप्यारी ने बैठकर विचार विमर्श शुरु किया कि क्या किया जाये? महंगाई के जमाने में बिना काम धंधे गुजर बसर भी बडी मुश्किल है. संतू गधा भी अब पढ लिख कर आ चुका था सो उससे भी विचार मांगे गये. संतू आजकल ब्लाग जगत में दिन भर निर्बाध घुमता था और पढा लिखा तो था ही सो उसने अपने विचार व्यक्त किये कि - ताऊ, आजकल सबसे ज्यादा चर्चा मे है चिठ्ठों की चर्चा...
ताऊ बोला - यार संतू, यहां बात होरही है काम धंधे की और तू बीच मे ले आया ये चिठ्ठों की चर्चा का खटराग...अरे तेरे को क्या इसलिये लिखाया पढाया था कि तू दिन भर बैठा यहां ब्लाग पढता रहे और हिरोगिरी करके हमारी छाती पर मूंग दलता रहे? अरे नामाकूल..तुझे पढा दिया..लिखा दिया...अब कुछ कमा कर बता...
संतू बोला - ताऊ...कूल डाऊन...कूल डाऊन..मेरे पास एक बहुत ही जबरदस्त आईडिया है कमाने का...
ताऊ जबरदस्त आईडिये के नाम पर तुरंत ही बीच में बोल पडा - अरे जल्दी बता...जल्दी बता...
संतू गधा बोला - ताऊ..वेट..वेट...आई एम गोइंग टू टेल यू... द होल प्लान...यू नो...?
ताऊ बोला - अरे सुसरी के...जल्दी बता...यो तेरी अंगरेजी बात मे झाड लेना...
और संतू ने सारा प्लान ताऊ और रामप्यारी को समझा दिया. उसी अनुसार अब ताऊ ने निम्न बिजनेस करना तय किया

चलते है डा. साहब के तरफ़ और देखते है कि टिप्पणी क्या कोई कर्मकांड है?

अब आज की शीर्षक चर्चा ..... देखिये मानव मन  ही ऐसा है कि वह अपनी प्रशंसा सुनना चाहता है .ऐसा न होता तो चमचे चाटुकारों का बिलियन डालर का व्यवसाय न होता .जिनके चलते देशों के सरकारे हिल डुल जाती हैं .उनके पद्म चुम्बन से पद्म पुरस्कारों तक में भी धांधली हो जाती है .तो वही मानव मन  यहाँ ब्लागजगत में अपनी पोस्टों पर टिप्पणियाँ भी चाहता है .कौन नहीं चाहता ? मैं नहीं चाहता या समीर भाई नहीं चाहते . मगर हम उतनी उत्फुल्लता से दूसरों के पोस्ट पर टिप्पणियाँ नहीं  करते .समीर भाई अपवाद हैं . इस टिप्पणी शास्त्र पर बहुत चर्चा पहले भी हो चुकी है -मैं विस्तार नहीं करना चाहता .मगर यह भी है कि टिप्पणी की चाह एक व्यामोह नहीं बन जाना चाहिए .एक व्यसन न हो जाय टिप्पनी पाने का .आप श्रेष्ठ रचोगे समान धर्मा लोग मिलगें ही ,टिप्पणियाँ भी झकाझोर आयेगीं -आखिर ससुरी जायेगीं कहाँ ? मगर शर्त वही श्रेष्ठता की है .अन्यथा पीठ खुजाई का अनुष्ठान टिकाऊ नहीं है .संत लोग कहीं डोल डाल  लिए  तो  फिर मजमा उखड़  जाएगा और सन्नाटा छा जाएगा .संत लोग  कोई टिकाऊँ होते हैं कहीं?

बडी खुशी की बात है कि ब्लॉगगढ़ में आ गया गब्बर का बाप...खुशदीप

सांभा...
सरकार कहण लाग रि...कह देई गब्बरवा से...इब उसका भी बाप ब्लॉगगढ़वा में खूंटा गाढ़ देओ से...
गब्बर...
हमरा बुढ़ऊ हरि सिंह (गब्बरवा का बापू) तो शोले से भी पहल का टैं बोल गयो से...ई कौण हमार दादी के नए जणे की बात करण लागरि सरकार...
सांभा...
सरदार..ईब तो तोरी भलाई इसी में लाग री के तू भी मेरी तरियो चट्टान पे चढ़ धूनी जमाई ले...नहीं वो तेरा बाप तोहार भी गिच्ची दबा देईगा...

रायपुर ब्लागर मीट: कुछ रोचक अनुभव बता रहे है पंकज अवधिया जी

" क्या अभी तक आप बेकार है? जब हमने यह राजकुमार ग्वालानी जी से पूछा तो वे मुस्कुरा दिए| आशा है अब उनके पास कार आ गयी होगी?"
" अनिल जी ने बार-बार अलबेला जी को याद किया| उम्मीद है कि इस मंच में उनसे जल्दी ही मुलाक़ात होगी|"
" ब्लॉगर निर्मल साहू पूरे मन से संवाद सुनते रहे| उनके अखबार दैनिक छत्तीसगढ़ ने हिन्दी ब्लॉग जगत से आम लोगो परिचित कराने में अहम् भूमिका निभाई है| राज्य के ब्लॉगर इस अखबार के माध्यम से आम जनता से रूबरू होते ही रहते है| "

भ्रष्टाचार

भारतीय संस्कृति का बन गया ......आचार
स्वाद नया है , भ्रष्टाचार !!
राजनीति क्या ? राज्य समिती क्या ?
क्या नवयुवको के उच्य विचार
छेड़ खानी करे लड़कियों से
माता पिता से करे है, दुराचार
भारतीय संस्कृति का बन गया .......आचार
स्वाद नया है ,भ्रष्टाचार !!

विडम्बना

 

अक्सर -
सुबह सड़क पर
नन्हें बच्चों को देखती हूँ ,
कुछ सजे - संवरे
बस्ता उठाये
बस के इंतज़ार में
माँ का हाथ थामे हुए
स्कूल जाने के लिए
उत्साहित से , प्यारे से ,
लगता है
देश का भविष्य बनने को
आतुर हैं

एक मजदूर के घर में कैसे बनी खीर ??

My Photo

 

एक मजदूर के घर में कई दिनों से घर में खीर बनाने का कार्यक्रम बन रहा था , पर किसी न किसी मजबूरी से वे लोग खीर नहीं बना पा रहे थे। बडा सा परिवार , आवश्‍यक आवश्‍यकताओं को पूरी करना जरूरी था , खीर बनाने के लिए आवश्‍यक दूध और चीनी दोनो महंगे हो गये थे। बहुत कोशिश करने के बाद कई दिनों बाद उन्‍होने आखिरकार खीर बना ही ली। खीर खाकर पूरा परिवार संतुष्‍ट था , उसकी पत्‍नी आकर हमारे बरामदे पर बैठी। आज पूरे परिवार ने मन भर खीर खाया था , यहां तक कि उसके घर आनेवाले दो मेहमानों को भी खीर खिलाकर विदा किया था।
हमारे घरवालों को आश्‍चर्य हुआ , कितना खीर बनाया इनलोगों ने ?
पूछने पर मालूम हुआ कि उनके घर में एक किलो चावल का खीर बना था।
यह हमारे लिए और ताज्‍जुब की बात थी , दूध कितना पडा होगा ?
मालूम हुआ .. 1 किलो।
अब हमारी उत्‍सुकता बढनी ही थी ..चावल गला कैसे ?
उसमें दो किलो पानी डाला गया।
अब इतनी मात्रा में खीर बनें तो चीनी तो पर्याप्‍त मात्रा में पडनी ही है , पूछने का कोई सवाल नहीं !!

यही द्वन्द होने लगा है !

अब सोचने को रहा भी क्या है बाकी ,
मन को बस यही द्वन्द होने लगा है,
जिंदगी के सब ख्वाब धूमिल हो चुके,
इन्तजार का हर पहलु बंद होने लगा है !
उम्मीद दामन छुडाने को बेताब है,
धैर्य दिल का भी मंद होने लगा है,
तन्हाइयां कुरेदने लगी है जख्मो को,
असंतुलित भावो का छंद होने लगा है !

कैसे जीवन बीतेगा

राशन नही मिलेगा भाषन
पीने को कोरा आश्वासन
नारों की बरसात हो जब
तब कैसे जीवन बीतेगा
भीख मांगती भारी जवानी
नही बचा आँखों का पानी
बेशर्मी से बात हो जब
तब कैसे जीवन बीतेगा

अब तैयार हो जाईये विश्व स्तरीय ब्लोग्गिंग के लिए ....एक्शन और लीगल एक्शन के साथ ...-अजय भाई हम तो तैयार बैठे है !

से टिप्पणी से आहत होते ही उसके नाम से जो मन में आया लिख मारते हैं । अभी हाल ही के एक विवाद में , एक तरफ़ तो हिंदी ब्लोग्गिंग में उस खास नाम से किसी संवेदना , आत्मीयता होने का दावा किया जा रहा है , मगर उसके लिए किसी से भी ( बेशक ये किन्हीं एक नाम के इर्द गिर्द घुमाया जा रहा है , मगर प्रयास तो सामूहिक ही था ) कम से कम एक बार स्नेहपूर्वक गुजारिश तो करनी ही चाहिए थी ....मगर फ़िर आभासी होने हवाने का दावा करने वालों ने शायद इसे ठीक रास्ता नहीं माना चलिए ठीक भी था ........हालांकि मुझे अब भी संदेह है कि यदि यही सब किसी रिचर्डसन, राबर्ट , या ऐसे ही नाम और सुदूर नागरिकता वाले के साथ जुडता तो भी क्या उसे ये सब समझाया या जताया जा सकता था , तो अब जब बिना ये सब किए ....वो तथाकथित आभासी दुनिया वाले कदम को ही उचित माना गया तो फ़िर उसके अनुरूप ही आगे के लिए भी तैयार ही रहना चाहिए ।

महेन्द्र मिश्रा जी कुछ चुटकुले हँसने के लिए ....हा हा हा हा हा हा हा

Copy of DSCN0166प्रेमिका - क्या तुम मुझसे प्रेम करते हो ?
प्रेमी - इसमें क्या संदेह है .
प्रेमिका - तो क्या तुम मेरे लिए मर भी सकते हो ?
प्रेमी - नहीं प्रिये मेरा अमर प्रेम है.
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टिर्री टिर्रा से - एक नई बीमा की योजना बनी है जो बहुत अच्छी है जब तुम नब्बे के हो जाओगे तो तुम्हें हर माह ढाई सौ रुपये मिलने लगेंगे इस तरह आप अपने माँ बाप के लिए बौझा साबित नहीं होंगे .
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एक साहब ने अपनी नई नवेली स्टेनो को एक लंबी चिट्ठी डिक्टेट कराई और अंत में पूछा - मिस मेरी कुछ पूछना हो तो बताओ ?
स्टेनो - सर आपने डिअर सर और यूअर्स फैथफुली के बीच में क्या लिखवाया था ?
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जन्मकुंडली में विद्यमान विभिन्न राजयोगों की वास्तविकता (भाग 1)My Photo

 

ये सब देखकर लगने लगा है कि आज ये विद्या अपनी सत्यता से कितनी दूर निकल आई है। प्राचीन वैदिक, ज्योतिषीय ग्रन्थों में जो सत्य समाहित है, वो अधिकतर रूपकों और अभिप्रायो की सहायता से प्रकट किया गया है। लेकिन उन आवरणों को हटाकर उनके अभिप्रायों को पहचानने की बजाय आज अधिकतर ज्योतिषी अनुसन्धानों,आविष्कारों के नाम पर अपने अपने मन के कपोल कल्पित सिद्धान्तों,नियमों के ऎसे आवरण चढाते चले जा रहे है कि जिसके नीचे वास्तविक ज्ञान कहीं गहरे छिपता चला जा रहा है। यदि सच्चाई को पहचानना है तो प्राचीन शास्त्रों, ग्रन्थों की अन्त:कुक्षी में सत्य के जो बीज मन्त्र छिपे हैं, उन्हे फिर से खोज निकालना होगा।

अब दिजिये इजाजत , नमस्कार

23 comments:

Udan Tashtari said...

बढ़िया चर्चा..जारी रहो.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

सुंदर चर्चा!

वाणी गीत said...

अच्छी चर्चा ..!!

हेमन्त कुमार said...

बेहतर चर्चा ।
आभार..।

बी एस पाबला said...

जारी रखिए

बी एस पाबला

मनोज कुमार said...

अच्छी चर्चा।

Arvind Mishra said...

जमाए रहिये पंकज ..अब तो आप करीब पहुँच रहे हैं ....

संगीता पुरी said...

बहुत बढिया चर्चा किया .. आपका आभार !!

Suman said...

nice

Mithilesh dubey said...

उम्दा चर्चा रही ।

ललित शर्मा said...

पंकज जी, सुंदर चर्चा के लिए आभार

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत हि लाजवाब चर्चा.

रामराम.

sangeeta swarup said...

बढ़िया चर्चा रही....आभार

sada said...

बहुत ही सुन्‍दर चर्चा, बधाई के साथ शुभकामनायें ।

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

वाह्! एकदम फर्स्टक्लास चर्चा!!!
शुभकामनाऎँ!!!

दिगम्बर नासवा said...

बढ़िया चर्चा.. .. धन्यवाद हमको भी शामिल करने का ...........

shikha varshney said...

badhiya charcha rahi.

हिमांशु । Himanshu said...

सुन्दर चर्चा । काबिलेतारीफ प्रयास ! आभार ।

डॉ. मनोज मिश्र said...

सुंदर चर्चा...

महफूज़ अली said...

सुंदर चर्चा के लिए आभार.......

अजय कुमार झा said...

बहुत खूब पकंज भाई ,आपने , ललित जी ने और शास्त्री जी ने खूब जोरदार मोर्चा संभाला हुआ है , हम भी रविवार की ब्लोग बैठकी के बाद आते हैं फ़ार्म में
अजय कुमार झा

Dr Satyajit Sahu said...

ये शानदार पत्रिका निकाली है आप लोगों ने भाई साहब
सराहनीय

RaniVishal said...

Dil se Aabhar!!

पसंद आया ? तो दबाईये ना !

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