Saturday, February 20, 2010

क्या पुलिस वाले इंसान नही कीड़े-मकौड़े है?“चर्चा हिन्दी चिट्ठों की” (ललित शर्मा)

आज मिडिया पर से भी लोगों का भरोसा उठता जा रहा है, इतने चैनल हैं कि कुछ भी उल-जलुल दिखाते रहते हैं। कुछ तो अंधविस्वास को अविश्नीय तरीके से बढावा दे रहे हैं। ताबीज बेचना रुद्राक्ष बेचना टोना-टोटका बताना तो आम हो गया है। समाचार को इतना सनसनीखेज बना देते हैं कि उसका महत्व ही खतम हो जाता है। हर चैनल मे जो समाचार दिखाए जाते हैं उनमे एक पुछल्ला साथ मे लगा होता है कि "हमारे चैनल पर सबसे पहले" और सभी इसी को दोहराते रहते हैं। जैसे कि इन्होने खबर दिखा कर कोई बहुत बड़ा अहसान दर्शकों  पर कर दिया। इनकी हरकतों ने मिडिया पर से दर्शकों का विश्वास खो दिया। अब मै ललित शर्मा आपको ले चलता हुँ आज के हिन्दी चिट्ठों की चर्चा पर................

कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया ...... sangiv tivari
भिलाई में इन दिनों नगर पालिक निगम द्वारा अवैध कब्‍जा हटाओ अभियान चलाया जा रहा है. इस अभियान में पूरी की पूरी बस्‍ती को उजाड कर करोडो की जमीन अवैध कब्‍जों से छुडाई जा रही है. लोगों से पूछो तो ज्‍यादातर का कहना है कि निगम द्वारा व्‍यवस्‍थापन कर इन्‍हें
“दो सौ रुपये दीजिए! सम्मान लीजिए!!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
“तस्कर साहित्यकार” कुछ दिन पूर्व मेरे पास एक जुगाड़ू कवि आये। बोले- “मान्यवर! अपना एक फोटो दे दीजिए!” मैंने पूछा- “क्या करोगे?” कहने लगे- “आपको बाल साहित्य के पुरस्कार से सम्मानित करना है! मैं एक कार्यक्रम करा रहा हूँ। उसमें केवल उन्हीं को सम्मानित किया

मैं तुझ जैसों के मुँह नहीं लगता-चक्कर घनचक्कर "चिट्ठी चर्चा" (ललित शर्मा)lalit.a
स्वस्थ रहने के लिए आराम करना भी जरुरी है. इससे नयी उर्जा मिलती है काम करने के लिए. हम भी छुट्टी पर थे, लेकिन आराम करने का समय ही नहीं मिला. अभी कुछ आराम किया. पर भाजपा आराम करने के मूड में नहीं है. इंदौर में भाजपा का सम्मलेन चल रहा है. इस सम्मलेन में

छू कर मेरे मन को
.............. पक्षियों का कलरव शोर नही कहलाता क्योंकि जिस रव में अपनों से मिलने की उत्कंठा हो ,अपनों को सम्हालने का भाव हो सहयोग एवं प्रेम की उत्कठ पुकार हो वो शोर कैसे होगा। ...........पुस्तकें वे तितलियां है जो ज्ञान के पराकणें को एक मस्तिष्क से दूसरे

कुसुम कुमारी कुँज बेहारी
सपने के भीतर एक और सपना था , पानी पर तैरती मरी मछली के पेट जैसा , पीला फीका और निस्तेज़ । ऐसा नहीं था कि जागी दुनिया कुछ शोख चटक थी लेकिन सपनों से एक दूसरे उड़ान की कल्पना और उम्मीद तो रखी ही जा सकती थी । शहरज़ाद की हज़ार कहानियों वाली अरेबियन टेल्स की तरह


उसकी प्यास न पानी बनी न आगउस रात वो अकेली नहीं उस के साथ रात भी जली थी मैंने उसे आग

अर्पित की वो और भी सर्द हुई समन्दर की बात की तो वो और भी खुश्क हुई उस की प्यास न पानी बनी ना आग उसके दोष अँधेरे नहीं रौशनी थे उसकी भटकन केवल रिद्हम थी जब साज निशब्द हुए तो वो मीरा बनी राबिया हुई

कैसे पढ़ी जाती हैं स्त्रियाँ
-अनामिका-पढ़ा गया हमकोजैसे पढ़ा जाता है कागजबच्चों की फटी कापियों काचना जोर गरम के लिफाफे बनाने के पहले!देखा गया हमकोजैसे कि कुफ्त हो उनींदेदेखी जाती है कलाई घड़ीअलस्सुबह अलार्म बजने के बाद!सुना गया हमकोयों ही उडते मन सेजैसे सुने जाते हैं ‍फल्मी

सजना सम्मुख सजकर सजनी खेल रही है होली..
परिकल्पना फगुनाहट सम्मान-2010  हेतु नामित रचनाकारों क्रमश:  ललित शर्मा, अनुराग शर्मा और वसंत आर्य की रचनाओं की प्रस्तुति के क्रम में हम आज प्रस्तुत है अभनपुर जिला रायपुर छत्तीसगढ़ के श्री ललित शर्मा के गीत--सजना सम्मुख सजकर सजनी खेल रही है

प्रियतम तो परदेस बसे हैं, नयन नीर बरसाये रे
नीर अर्थात् सलिल, नीरद, नीरज, जल या पानी! यह नीर कभी नयन से बरसता है तो कभी मेघ से बरसता है। नयन से नीर जहाँ गम में बरसता है वहीं खुशी में भी बरसता है। प्रियतम के विरह में प्रियतमा कहने लगती हैःप्रियतम तो परदेस बसे हैं, नयन नीर बरसाये रेतो दूसरी ओर
क्या पुलिस वाले इंसान नही कीड़े-मकौड़े है? क्या उनका कोई मानवाधिकार नही?anilPUSADKAR
सुबह-सुबह मोबाईल की स्क्रीन पर एक अंजान नम्बर चमका।थोड़ा कन्फ़्यूसियाने के बाद कौन हो सकता है?जिज्ञासा के कीड़े को शांत करने की गरज़ से रिस्क लेकर काल रिसीव कर ली।उधर से आवाज़ पहचानी-पहचानी सी थी लेकिन एकदम से पहचान नही पाया और पूछ बैठा कौन?उधर से आवाज़ आई
Dipa1 रोना भी क्या एक कला है
" रोना भी क्या एक कला है "रोना क्यों कर दुर्बलता है ?यह तो नयनों की भाषा है ।सुख देखे तो छलक जाता है ।दुःख में फिर भी सहज आता है ।लाख संभालो , न तब रुकता है ।न निकट हो कोई आहत करता है ।उमड़ घुमड़ जो बस जाता है ,श्रांत ह्रदय वह कर देता है ।रोना भी क्या एक
taau-new खुल्ला खेल फ़र्रुखाबादी (194) : आयोजक उडनतश्तरी
बहनों और भाईयों, मैं उडनतश्तरी इस फ़र्रुखाबादी खेल में आप सबका आयोजक के बतौर हार्दिक स्वागत करता हूं.जैसा कि आप जानते हैं कि अब खुल्ला खेल फ़र्रुखाबादी का आयोजन सिर्फ़ मंगलवार और शुक्रवार शाम को 6:00 PM पर किया जाने लगा है. आईये अब खेल शुरु करते हैं.नीचे
जब की रेलगाड़ी की सवारी-कविवर की दूर हुई बिमारी (ललित शर्मा)
थकान कुछ ज्यादा है दो रातों के जागरण ने हालत बिगाड़ दी, आधा दिन और रात सोये तब कहीं जाकर थोड़ी तबियत सुधरी. एक व्यंग्य लिखा था कुछ माह पहले और उसे ठेल भी दिया था ब्लाग पर, लेकिन आलस  के मारे कुछ नया नहीं लिखा जा रहा है. इसलिए उसे रिठेल प्रकिया के
महंगाई कम करना डॉ. रमन सिंह के हाथ में होता तो महंगाई बढ़ती ही क्यों ?
स्वाभाविक है, नौटंकी लगना। राज्य सरकार साइकिल पर सवार होकर महंगाई के  प्रति विरोध प्रदर्शित करती है तो कांग्रेस के पास इसके सिवाय कहने को और क्या है कि यह नौटंकी है। केंद्र सरकार मंत्रिमंडल की बैठक कर महंगाई पर चिंता प्रगट करती है और महंगाई कम करने
इंटेलेक्चुअल आतंकवाद क्या होता है.???swapna
कहीं पढ़ा था इंटेलेक्चुअल आतंकवाद क्या होता है...सोचा मेरी समझ में जो आया बता दूँ...आप क्या कहते हैं  ? ये हैं इन्तेलेक्तुअल आतंकवाद...?एम्. ऍफ़. हुसैन की पेंटिंग्स ...मेरी नज़र में
नितिन गडकरी के तेवर चौकड़ी के लिए खतरे की घंटी बजा रहे हैं
भाजपा के राष्ट्रीय  अधिवेशन से जो समाचार आ रहे हैं, वे समाचार यदि सिर्फ बातें न रहकर क्रियान्वयन तक पहुंच गए तो भाजपा में सब कुछ बदला बदला सा दिखायी पड़ेगा। जब नितिन गडकरी को भाजपा का राष्ट्रीय  अध्यक्ष बनाया गया तब किसी को भी उम्मीद नहीं थी कि
वक्त की डोर
कहते हैं जो रात गयी सो बात गयी ऐसा भी कभी ही होता है पर बात जो दिल में जाये उतर क्या वो लाख भुलाये भी भूलता है। ये तो एक बहाना है अपने मन को बहलाने का वरना इतना आसान नहीं जो धोखे पे खाता धोखा है क्या दिल उसका इसे मानता है। है वक्त बड़ा मरहम सबसे जो बड़े
तो आ ही गया परीक्षाओं ....अरे नहीं आत्महत्याओं का दौर ....
अब तो नए साल की शुरूआत से ही समय जिनके लिए कर्फ़्यूनुमा हो जाता है , जिनके आने जाने घूमने फ़िरने, खेलने कूदने तक पर मनाही हो जाती है .....वे होते हैं दसवीं और बारहवीं की बोर्ड परीक्षा में शामिल होने वाले विद्यार्थी । और फ़िर परीक्षाओं का समय जैसे जैसे नजदीक

आकाश राज जी ... क्‍या आप अपने गांव और जिले का नाम लेने से परहेज कर सकेंगे ??
भारतवर्ष के इतिहास में खत्री जाति के लोगों ने प्रजा की रक्षा के लिए बहुत काम किए हैं । समाज में , राज्‍य में और शासन व्‍यवस्‍‍था को सुचारू रूप से चलाने में उनकी अहम् भूमिका रही है। पर कालांतर वे सिर्फ व्‍यवसाय में ही रम गए और आज भी उसी में

...और फैल गया रायता
ये रायता क्यों फैला है भाई. बारात तो विदा हो गई लेकिन शादी के पंडाल के किनारे ये गाय, कौवे और कुत्ते किस ढेर पर मुंह मार रहे हैं. अच्छा-अच्छा कल रात में यहां भोज था. भुक्खड़ लोग जिस तरह भोजन पर टूट पड़े थे उसे देख कर रात में ये कुत्ते शरमा कर भाग खड़े हुए.

एक सत्य (कविता)
उम्र के हिसाब से ये कविता मुझे नहीं लिखनी चाहिए थी मगर मुझे नहीं पता मैंने ऐसा क्यों सोंचा और कैसे कैसे ये कविता कागज पर उतर आये... एक सत्यमृत्यू सत्य है,डर जाओगे तुम भी एक दिन मर जाओगे बचपन के डर को मरते देखा फिर बचपन को मरते देखा युवा में सब नया नया सा
अच्छा लगे बड़ा ही ,कुदरत का ये वर्ताव
अच्छा लगे बड़ा ही , कुदरत का ये  वर्ताव.चढ़ने को है सूरज ,बढ चली है नाव.वृक्षों की पत्तियों पर ,ओस का ये छिडकाव.अकड़ी सी टहनियों में , यूँ बला का घुमाव.नटखट सी नदी का , अलबेला सा ठहराव.महकी सी हवा का , शर्मीला सा बहाव .चहकते से पंछियों का ,तट पर ये
अब आप ही बताइये की ये विश्वास है या अंध विश्वास !
आज खुशदीप सहगल की पोस्ट पढ़कर मुझसे रहा नहीं गया और आज पोस्ट न लिखने का दिन होते हुए भी ये पोस्ट डाल रहा हूँ। हमारा देश एक धार्मिक देश है जहाँ विभिन्न धर्मों को मानने वाले लोग मिलकर रहते हैं।जहाँ भी देखो मंदिर, मस्जिद , गुरद्वारे और गिरिजा घर दिखाई दते
सडक के शोहदे बनाम छात्र नेता और 15 फरवरी
सरगुजा के सबसे बडे कॉलेज पीजी कॉलेज की इमारत बीते पंद्रह तारीख से उदास और स्‍तब्‍ध है। इस कॉलेज को कॉलेज बनाने वाले प्रोफेसर भी चेतनाशून्‍य से है। अंग्रेजी की क्‍लास में गैरवाजिब उपस्‍थिती पर सही सवाल उठा छात्रा को बाहर करने का परिणाम यह हूआ कि, कॉलेज तो

अ र र र र झम !…. लो जी आ गया वो….

…. लो जी आ गया वो …. अरे वो ही …. जिसने खिला दिए हैं चमन में नए
नए फूल… और खींच मारे हैं दिल के बीचो बीच विरह के शूल …. भाई ये वही
है जो सब ऋतुओं के राजा बसंत के सर चढ कर बोलता हैं और ले जाता है एक नई


उस रात फिर एक ख्वाब थपकियाँ देकर सुला दिया गया !
वो बैठी थी चुप, ख़ामोशी में खोयी सी । कमरे की खिड़की पर लगा अख़बार बार-बार हवा के तेज़ झोंके से फडफडाता और शांत हो जाता था । बाहर चाँदनी मद्धम-मद्धम झर रही थी । खिड़की की दरारों से शीत लहर अन्दर प्रवेश कर जाती थी । तब ख़ामोशी को तोड़ते हुए मेज पर पढ़ा हुआ
एक कथा है बाघ भी
केदार नाथ सिंह की इस कविता- कथाआें से भरे इस देश में मैं भी एक कथा हूंॅ एक कथा है बाघ भी इसलिए कई बार जब उसको छिपने को नहीं मिलती कोई ठीक ठाक जगह तो वो धीरे से उठता है और जाकर बैठ जाता है किसी कथा की ओट में िफर चाहे जितना ढूंढो चाहे छान डालो जंगल की
आतंकियों को मेरा खुला सन्देश ....
आतंकियों को मेरा भी खुला सन्देश है अगर किसी भी माध्यम से उनके पास तक पहुँच रहा हो तो वो भी कान खोलकर सुन लें ! ना तो हम कायर है और ना ही मौत के सौदागर है अगर हमारा कानून हमें कुछ पलो की इजाजत दे-दे तो तुझे तेरे घर में घुसकर तेरी ही सरजमीं में रहने

दयानंद जी ने क्या खोजा क्या पाया (भाग २)
वैसे तो यह गुमनाम पुस्तक समीक्षा के काबिल भी नहीं है किन्तु ऐसी कुतर्कों भरी अनेक पुस्तकें नेट पर प्रचारित की जा रहीं है इसीलिए एक का खंडन करने से आप समझ सकते हैं बाकी सब भी इसी तरह की बकवास से भरी पढ़ी हैं। मैं इस पुस्तक के
है अपनी जनता पर है बहुत भोली-भाली
हमारे देश में नारी के लिए "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता" यानि  जहाँ नारी की पूजा की जाती है, वहां देवता रमते हैं. लेकिन वास्तव में  कुछ ऐसा दिखता नज़र नहीं आता है. आज जिस तरह से नारी संबोधनकारी गलियों की बौछार सरेआम होते

मैं खुद ही खुद को प्यार करने लगा ....
जब लगे,दुत्कारने,मुझको सभी,परित्यक्त ,सा हर कोई,व्यवहार करने लगा॥खुद को,उठाया,गले से,लगाया,में खुद ,खुद को,ही प्यार करने लगा॥जीता रहा,जिस दुनिया को,अपने,सीने से लगाए,मुझे अपने से,दूर जब ये,संसार करने लगा॥खुद को,सम्भाला,संवारा-सराहा,स्नेह से,पुचकारा,खुद
लो क सं घ र्ष !: दीन-बंधु सम होय
किसी गांव में नदी के किनारे एक ज्योतिषी जी लोगों का भाग्य बताने के लिये बैठते थे, सहसा दो लोग (बाप-बेटे) वहाँ पहुंचे, नदी पर पुल नही था न ही नाव थी, उन्हें उस पार के गांव जाना था, यह पता नहीं था कि नदी कितनी गहरी है, ज्योतिषी जी ने उनकी सहायता करने के

इतना सब पढ़ने के बाद भी हम ब्लॉग पढ़ते हैं
          राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की स्थापना सन 1988 में हुई । और इसके तुरंत बाद देश के विभिन्न ज़िलों में साक्षरता अभियान की शुरुआत हुई । दुर्ग ज़िले में भी इस अभियान का प्रारम्भ 1990 में हुआ । राष्ट्रीय महत्व के इस

छत्तीसगढ़ की अनोखी और अनूठी पहल
इस दशक की शुरुआत के साथ जब तीन नये राज्यों का गठन हुआ तो इनमें से एक छत्तीसगढ को भी हर जगह पिछड़े और अविकसित राज्य के रूप में ही ज्यादा प्रचारित किया गया था। यहां के वाशिंदों की शांतिप्रियता, सादगी और भोलेपन पर

लिखे कविता जीतें ईनाम--------------------------(मिथिलेश दुबे)
हिन्दी साहित्य मंच "चतुर्थ कविता प्रतियोगिता" मार्च माह में आयोजित कर रहा है। इस कविता प्रतियोगिता के लिए किसी विषय का निर्धारण नहीं किया गया है अतः साहित्य प्रेमी स्वइच्छा से किसी भी विषय पर अपनी रचना

देशभक्ति का दानव
देशभक्ति का दानव मुझमेंजाने क्यूँ मचलता रहता हैइसका कोई मान नहीइसकी कोई पहचान नहीफिर भी अपना राग सुनाता रहता हैसिर्फ चुनावी बिगुल बजनेपर ही सबको याद ये आता हैवरना सियासतदारों कोफूटी आँख ना भाता हैआज के युग मेंदानव ही ये कहलाता हैइसकी माला जपने

मुसहर के बच्चे भी पढ़ें, प्रयास कर रहा है एक किशोर
छोटे प्रयास से भी समाज में एक सार्थक बदलाव लाया जा सकता है वशर्ते सहीमंशा के साथ साथ रचनात्मकता और लगन हो। समाज को कुछ देने की एक छोटी सीकोशिश दिख गई एक दलित वस्ती में जहां एक मानदेय पर नियुक्त टोला सेवकलगन,

गम नहीं वहाँ
गम नही वहाँ जहाँ हो अफसाना आपकाखुशियाँ वहाँ ढूंढती है हर पल आशियाना आपकाआप उदास न होना कभी क्योकि ,बहुत अच्छा लगता है हमें मुस्कराना आपका एक लहर को प्यार था किनारे से ,पर उसकी शादी हो गयी सागर सेकिनारे की प्रीत लहर को खिंच लाती है ,पर बदनाम न हो
अजीब दास्ताँ है ये.......(2 )(हास्य-वयंग्य)
सर्वप्रथम तो आप सब का मुझे झेलते रहने का आभार प्रकट करना चाहुंगा!जिन्होंने मुझे "टिप्पणी ब्रांड" उत्साहवर्धक टोनिक की दो बूँद दी है,उन्हें मै बताना चाहूँगा के उनका ये प्रयोग सौ फीसदी सफल रहा!हर एक बूँद मेरे लहू में मिल जो

दैनिक जागरण में 'बीबीसी हिन्दी ब्लॉग'
19 फरवरी 2010 को दैनिक जागरण के नियमित स्तंभ 'फिर से' में बीबीसी हिन्दी ब्लॉग की एक पोस्ट

त्यागपत्र : भाग 15
पिछली किश्तों में आप पढ़ चुके हैं, "राघोपुर की रामदुलारी का परिवार के विरोध के बावजूद बाबा की आज्ञा से पटना विश्वविद्यालय आना! फिर रुचिरा-समीर और

अब हम बड़े हो गए है
........बात उन दिनों की है जब....कब पढ़ते पढ़ते आँख लग जाती थी पता ही नही चलता था.......और ये किस्सा आज का है की नींद

आपका मस्तिष्क दुनिया का सबसे बड़ा सुपर कम्प्यूटर
विश्व के सबसे बड़े सुपर कम्प्यूटर का मालिक अमेरिका नहीं है। विश्व के सबसे बड़े सुपर कम्प्यूटर के मालिक आप हैं। यह
दुष्कर्म के लिए महिलाएं भी ज़िम्मेदार - रिपोर्ट
* "द वेक अप टू रेप" रिपोर्ट पर विवाद (कमल सोनी)>>>> दुनिया भर में आये दिन बलात्कार के कई मामले सामने आते हैं. इसीलिये बलात्कार जैसे संगीन मामलों के पीछे छिपे कारणों का आंकलन करने के लिए ब्रिटेन में एक अध्ययन के आधार
दो लिंक्स..
दो चीज़ें यहां अपने रेफ़रेंस के लिए टांक रहा हूं, पहली कुछ दिनों पहले गोरखपुर में फ़ि‍ल्‍मकार कुंदन शाह से की भूपेन की बातचीत है, भूपेन की बेतैयारी के सवालों का जहां कुंदन की ओर से दिया गया बड़े धीरज, सलीके और व्‍यापक संदर्भों को समेटे बड़ी समझदारी के

देशी !
हीथ्रो हवाई अड्डे से प्रस्थान के वक्त भी उन दोनों बाप-बेटी को एयर पोर्ट तक ड्रॉप करने आई माँ ने एक पर फिर से रश्मि को, जिसे माँ-बाप प्यार से 'रिश' कहकर पुकारते थे, हिदायत भरे लहजे में समझाया था कि बेटा रिश, लौटते में वहां से फालतू का कूडा-कचडा मत उठा

मां की आत्महत्या वाले मुकद्दमे में छह वर्षीय बच्चे ने पिता के खिलाफ गवाही दी
दिल्ली की तीस हजारी अदालत में अपनी मां की आत्महत्या मामले में एक छह वर्षीय बच्चे ने पिता के खिलाफ गवाही देते हुये कहा कि दादी व पिता की पिटाई के चलते उसकी मां ने आत्महत्या की है। बच्चे की गवाही के

एक रिक्त अहसास!
हाँमैं नारी हूँ,वन्दनीय औ' पूजिताकहते रहे हैं लोग,कितने जीवन जिए हैं मैंनेकहाँ तो सप्तरिशी की पंक्ति मेंविराजी गई,सतियों की उपमा देपूजी गई।मर्यादाओं में भी भारीपड़ रही थी,तब जागा पुरूष अंहकारउसको परदे में बंद कर दिया,सीमाओं में बाँध दियाचारदीवारी से

निर्मल पांडे और नैनीताल
आज शाम होते-होते कई पुराने दिनों के मित्र परिचित कुछ थोड़ी देर के बाद निर्मल पर लौट आये.निर्मल को कुछ बार नैनीताल में देखा, कुछ थोड़ी बहुत बातचीत, कुछ ८९-९० के बीच उनके कुछ नाटक (नैनीताल युगमंच द्वारा आयोजित) को देखने का

दिनचर्या का वर्केबल मॉडल ढूंढा जाना चाहिये
आजकल हर घर में हर समय सिनेमा चलता है। स्कूली बच्चे, आफिस जाने वाले पति–पत्नी, बिजनिस में लगे लोग और घर के बड़े–बूढ़े अपनी दिनचर्या का काफी समय बिस्तर या सोफे पर पड़े रहकर टीवी देखने में खर्च
क्या खत्म हो जायेगा भारतीय बाघ
फ़ोटो साभार: सीजर सेनगुप्त*कृष्ण कुमार मिश्र* धरती पर बाघों का उत्थान व पतन की करूण कथा: बाघ जंगल का कुशल कूटनीतिक चाणक्य होता है किन्तु कंकरीट के जंगलों में रहने वाले चाणक्यों की कुटलनीति ने उसके अस्तित्व पर ही सवाल खड़े कर दिये है
स्वप्न मेरे................: ख्वाबों के पेड़ ...
स्वप्न मेरे................: ख्वाबों के पेड़ ...digambar ji behad sakaratmak soch se apani baat kahi hai .achchhi rachna hai.
फ़ेसबुक को जीमेल में जोड़ें
फ़ेसबुक समेत कई सारी सोशल नेटवर्किंग सेवाओं को हम अपने जीमेल से जोड़ सकते हैं. इससे होगा ये, कि आपको सभी चीजें एक ही जगह पर मिल जाया करेंगी. आइए देखते हैं कि यह कैसे किया जाए. सबसे पहले सेटिंग्स में जाएं फ़िर लैब वाली टैब में क्लिक
गूगल यानि कि बम कैसे बनाते हैं?
शीर्षक पढकर चौंक गए? आपने यूआरएल छोटा करने की सेवाओं के बारे में तो खूब सुना होगा. उपयोग भी किया होगा. अभी एक नई सेवा आई है, नाम है www.shadyurl.com. ये आपके असली यूआरएल के पते को खतरनाक और संदेहजनक बना देती है. मैंने गूगल का पता इसमें डालकर देखा तो इसने
स्वर्ग की यात्रा-टिकट
आखिर स्वर्ग किसे अच्छी नहीं लगेगी.स्वर्ग तो आखिर स्वर्ग ही है तभी तो लोग उसे स्वर्ग कहते हैं.स्वर्ग जाने के लिये बडे से बडे अपराधी भी कुछ न कुछ पुण्य का काम कर ही लेता है.मिला-जुलाकर सभी स्वर्ग की चाहत रखते हैं.......लेकिन स्वर्गानन्दजी की बात अलग थी.वह

जब हुआ नाड़ी निरीक्षण
गत 17 फरवरी से योग शिविर जा रहा हूँ, एक दोस्त के निवेदन पर, ताकि दोस्ती भी रह जाए और सेहत में भी सुधार हो जाए। योग शिविर में जाकर बहुत मजा आ रहा है, क्योंकि वहाँ पर बच्चा बनने की आजादी है, जोर जोर से हँसने की आजादी है, वहाँ पर बंदर उछल कूद करने की आजादी
मेरी जिंदगी में किताबें - 2
छुटपन से ही पापा तरह-तरह की किताबें लाकर मुझे देते थे। उनमें लिखी कहानियां मैंने सैकड़ों बार पढ़ी थीं। रोम का वह दास, जिसे भूखे शेर के सामने छोड़ दिया गया था और शेर उसे खाने के बजाय उसके पैरों के पास बैठकर उसके तलवे चाटने लगा था, क्‍योंकि बहुत साल पहले जब
फाल्गुन आया रे !
गोरी को बहकाने फाल्गुन आया रे । रंगों के गुब्बारे फूट रहे तन आँगन, हाथ रचे मेंहदी के याद आते साजन ॥ प्रेम-रस बरसाने फाल्गुन आया रे । यौवन की पिचकारी चंचल सा मन, नयनों से रंग कलश छलकाता तन ॥ तन-मन को भरमाने फाल्गुन आया रे । [] राकेश 'सोहम' dhanyavad

ऐसे खत्म होगा लाल आतंक
देश के लिए आंतरिक चुनौती बने इस लाल आतंक का क्या कोई इलाज है? हिंसक नक्सलवाद से पार पाने का एक सफल प्रयोग भारत के ही एक कोने में हुआ है. यह कोना जहाँ नक्सलवाद का उदय हुआ वहाँ से ठीक विपरित दिशा में है. यहाँ के लोगों ने युद्ध व हथियार छोड़ कर शांति और

अनार कली कहां चली.....
भाई ना तो हम कवि है, ओर ना ही शायर, लेकिन इन सात दिनो मै इतने शेर पढे, ओर इतनी बाते पढी की मजा आ गया...जब हम रोहतक जा रहे थे तो जेसे जेसे ट्रको पर, ट्रालियो पर स्कुटरो पर ओर रिक्क्षा पर नजर पडती तो कुछ ना कुछ पढने को मिल जाता ओर सफ़र भी जल्द ही खत्म भी हो

ताज़गी और बदलाव के लिए ब्लागीरी
अशोक उद्यान में हरी दूब के मैदान बहुत आकर्षक थे। हमने दूब पर बैठना तय किया। ऐसा स्थान तलाशा गया जहाँ कम से कम एक-दो दिन से पानी न दिया गया हो और दूब के नीचे की मिट्टी सूखी हो। हम बैठे ही थे कि हरि शर्मा जी के मोबाइल की घंटी बज उठी। दूसरी तरफ कुश थे। वे
ऐश्वर्या कि बीमारी के खबर पर भड़के बिग-बी..'प्रतीक्षा' के बाहर कि ताज़ा 'तस्वीर'!
महंगाई पर एक कार्टून ...............
अब देता हुँ चर्चा को विराम-आप सभी को ललित शर्मा का राम-राम

15 comments:

Arvind Mishra said...

विस्तृत चर्चा और विपुल संकलन

RaniVishal said...

bahut bhadiya aur vistrat charcha ke liye dhanywaad!
http://kavyamanjusha.blogspot.com/

ललित शर्मा said...

अरविंद जी राम-राम

Udan Tashtari said...

बहुत विस्तार और तसल्ली से की गई उम्दा चर्चा. साधुवाद!

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत विस्तृत चर्चा, सुंदर संकलन.

रामराम.

काजल कुमार Kajal Kumar said...

वाह जी बहुत बढ़िया राम राम

'अदा' said...

sach mein lalit ji aapki energy ke aage sab fail hain...ham to samjh hi nahi paate aap itna sab kaise kar lete hain...baap re ...aapko hamar dandwat pranaam baba...:):)

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

बहुत अच्छी एवं वृ्हदाकार चर्चा!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

विस्तृत चर्चा अच्छी लगी!

Mishra Pankaj said...

धन्यवाद शर्मा जी आपने ध्यान दिया और चर्चा को शास्त्री जी और आपने जो निरन्तर रूप दिया है उसके लिये धन्यवाद

डॉ. मनोज मिश्र said...

विस्तृत और अच्छी चर्चा ..

Anil Pusadkar said...

nice.

अजय कुमार झा said...

वाह वाह ललित जी एकदम कमाल की चर्चा रही, बहुत सारी पोस्टों को पढना अभी बांकी है , बहुत बहुत शुक्रिया
अजय कुमार झा

रावेंद्रकुमार रवि said...

सुंदर चर्चा!
--
कह रहीं बालियाँ गेहूँ की - "वसंत फिर आता है - मेरे लिए,
नवसुर में कोयल गाता है - मीठा-मीठा-मीठा! "
--
संपादक : सरस पायस

मनोज कुमार said...

विस्तृत और अच्छी चर्चा ..

पसंद आया ? तो दबाईये ना !

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