Saturday, December 19, 2009

मैं रुका रहा किसी बाँस की डाली की तरह.. (चर्चा हिन्दी चिट्ठों की )




अंक : 114
प्रस्तुतकर्ता : हिमांशु । Himanshu

"मैं रुका रहा
किसी बाँस की डाली की तरह
हवा के सामने झुका रहा
और आवाज सुनता रहा एक
कि नति ठीक है
मगर मना नहीं है तुम्हारे लिये गति
हमने तो तुमसे उन्नत होने के लिये कहा है
विरति की बात कहाँ कही है हमने
रत रहने के लिये कहा है हमने तो तुमसे
सुनने को सुनता रहा मै यह आवाज
मगर समझ लिया मैंने
कि यह एक सलाह है
अपनी एक राह है मेरी
रुकने की और झुकने की
किसी न किसी जगह
पूरी तरह चुकने की ।"

दो दिन पहले  कहा था शास्त्री जी ने - " कल की चर्चा आराम फरमा रहे लोग करेंगे ।" मुझे लगा, यह मुझे ही  कहा जा रहा है (वैसे आराम मैं ही नहीं फरमा रहा था केवल !) । चर्चा करनी चाही ।  कर न पाया । नित्य और अनित्य के बीच झूलता रहा है मेरा यह चर्चा कर्म । एक नयी प्रवृत्ति को अख्तियार कर लेना, फिर उस पर समर्थ गतिशीलता रखना - चुनौती है यह ! चर्चा करते हुए मन दूर-दूर उड़ता है, बहुत कुछ कहना चाहता है । चिट्ठे पढ़ते हुए (चर्चा करते वक्त) लगता है जैसे मेरे अन्तस के बहुविध स्वर इन चिट्ठों के स्वर से तादात्म्य कर बह रहे हैं , और फिर चर्चा कर्म पीछे छूट जाता है । उठा नहीं पाता हूँ वह दुःसह भार जो इन चिट्ठों की अभिव्यक्ति से हृदय पर जमा हो जाता है । कारण इनके लिये अभिलषित, सुयोग्य अभिव्यक्ति का न मिलना है । चिरराजित एवं अनभिव्यक्त स्वरों का न उभर पाना अपूर्णता की प्रतीति देने लगता है । महसूस करता हूँ, ’हूँ ही नहीं ।" यह छटपटाहट तब तक तारी रहती है जब तक यह अभिव्यक्ति के प्राण-स्वर Outlet Vent (निकास-मार्ग) नहीं ढूँढ़ लेते ।

ब्लॉग-जगत ने जो कुछ भी देखा इन दिनों (मोह-व्यामोह, अपने तुम्हारे का अतिरेकी गान, अबूझ-सा दर्प, नियंत्रण से निकल गयी अभिव्यक्ति, पूर्वाग्रह के विकसते कण्टक, संवेदना के अस्पष्ट आशय, पलायन-पुनरावतरण, आग्रह-निग्रह और भी न जाने क्या-क्या ) उसने विचलित किया ! हम इस नये अभिव्यक्ति के माध्यम का उत्सव मना रहे हैं । इसे हमने ही शक्ति दी है, हमने ही सजाया है - हम ही इसे प्राण देंगे ! चाहिये बस समष्टि हित का ध्यान रखता हुआ तदनुरूप अभिनव आत्मानुशासन ! सबका अधिकार है यह । अनुशासन और संयम तो प्रतीति के बंधन हैं - सब के हित के निमित्त । क्या इससे किसी के स्वातंत्र्य में व्यवधान पड़ेगा ! अज्ञेय ने लिखा है एक जगह -
"उत्तरोत्तर लोक का कल्याण ही है साध्य
अनुशासन उसी के हेतु है ।"

जरा और पढ़ लें ’अज्ञेय’ को (चिट्ठाकारी समझने के लिये ही न !) -
"तुम्ही दाता हो, तुम्हीं होता, तुम्हीं जजमान हो,
-- यह तुम्हारा पर्व है ।
----------------------------------------------
श्रष्टा तुम्हीं हो इस नये रूपाकार के !
तुम्हीं से उदभूत होकर बल तुम्हारा
साधना का तेज - तप की दीप्ति,
तुम को नया गौरव दे रही है !"


अरे ! गौरव-चिह्न तो दिखा ही नहीं पाया आपको । यह रही चिट्ठों की प्रस्तुति । पहला नाम वह है, जिसके हाथ झटकते हुए भी कह दिये जाने वाले लापरवाह वाक्य-छंद आपको सम्मोहित किये जायेंगे । गति अविरत, मति स्थिर है इनकी । दूसरा गिरिजेश राव ! आप सहमत होंगे न इस बात से कि क्या एक गिरिजेश राव ने कम कहर ढाया है कि दूसरा ले आये ! चलिये सुभीते के लिये इन्हें इनके नाम से ही पुकारते हैं, इनका क्लेम न रहे कि "पहचान तो हमारी भी जबरदस्त है, दूसरे के नाम से क्यों बुला रहे हो?" । अमरेन्द्र जी की बात कह रहे हैं हम । अवधी के हस्ताक्षर बनने वाले हैं यह । पहले ’कुछ औरों की ’ फिर ’कुछ अपनी’ कहते हैं । यह देखिये आज की पोस्ट -




 अंतिम आकांक्षा
'आचार्य रामचंद्र शुक्ल ( १८८४-१९४१ ) :
आचार्य रामचंद्र शुक्ल का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है | आज हम हिन्दी साहित्य के इतिहास को आचार्यवर से अलग करके नहीं देख सकते | हिंदी साहित्य के इतिहास के 'काल- विभाजन' और 'नामकरण' दोनों में हम उनके प्रति कृतज्ञ  हैं | इसके अतिरिक्त शुक्ल जी हिन्दी
साहित्य के प्रथम व्यवस्थित आलोचक हैं | ' व्यावहारिक' और 'सैद्धान्तिक', दोनों तरह की आलोचना को उन्होंने संस्कार दिया | निबंध लेखन में शुक्ल जी एक युग का प्रतिनिधित्व करते हैं यानी 'शुक्ल युग ' |


ठीक यहीं अपने अतीत का वैभव निहारते अवनीश मिश्र और काम के देवता कामदेव की कथा कहते जी०के०अवधिया की ठौर मिलेगी  -


नयी इबारत पर अवनीश मिश्र और धान के देश पर जी० के० अवधिया -
नालंदा महाविहार:इतिहास आपके सीने में उतरता है 
कामदेव याने कि सेक्स के देवता ..
आज से लगभग 800 साल पहले इस विश्व के सबसे पुराने और  सबसे  बड़े आवासीय विश्वविद्यालय को तुर्क हमलावर बख्तियार खिलजी ने भारी क्षति  पहुचाई और नालंदा महाविहार धीरे -धीरे ना सिर्फ समय और  विस्मृति के मलवे में, बल्कि सचमुच के ईंट- पत्थर और मिट्टियों  के भीतर  दफन हो गया ..रेत पर पड़े आदमी  के पैर   के निशानों की तरह ज्ञान के इस भव्य केंद्र का  नामोनिशान ही मिट गया.. लेकिन कुछ निशाँ समय के निर्मम चोटों से पूरी तरह मिटते नहीं हैं बल्कि फिर से झाँकने लगते हैं ...दरअसल वैसे निशाँ जो सिर्फ जमीन पर नहीं होते बल्कि जमीन के भीतर तक धंसे होते हैं..वे निशाँ जिनकी जड़ें होती हैं ,सदियों की झुलसती सुखाड़ को भी झेल लेने का माद्दा  रखते  हैं , हैं और फिर उग आते  है.
कामदेव याने कि सेक्स के देवता ...उनके प्रभाव से भला कोई बचा है?
तुलसीदास जी लिखते हैं:
    "सम्पूर्ण जगत् में स्त्री-पुरुष संज्ञा वाले जितने चर-अचर प्राणी थे वे सब अपनी-अपनी मर्यादा छोड़कर काम के वश में हो गये। वृक्षों की डालियाँ लताओं की और झुकने लगीं, नदियाँ उमड़-उमड़ कर समुद्र की ओर दौड़ने लगीं। आकाश, जल और पृथ्वी पर विचरण करने वाले समस्त पशु-पक्षी सब कुछ भुला कर केवल काम के वश हो गये। सिद्ध, विरक्त, महामुनि और महायोगी भी काम के वश होकर योगरहित और स्त्री-विरही हो गये। मनुष्यों की तो बात ही क्या कहें, पुरुषों को संसार स्त्रीमय और स्त्रियों को पुरुषमय प्रतीत होने लगा।"

आनन्द देव जी (पेशे से पत्रकार) ने ब्लागिन्ग की शुरुआत कर दी है ..और प्रकाश डाले है तेलान्गना के बटवारे को लेकर हुए विवाद के बाद उत्तर प्रदेश मे चल रहे पुर्वांचल के बटवारे की बात को लेकर…आप सबसे निवेदन है कि आनंद जी के ब्लाग पर जाकर  स्वागत करे और उन्हे नियमित लेखनी के लिये प्रेरित करे ..धन्यवाद

विकास का कौन सा सपना देख रहे है पूर्वांचल की वकालत करने वाले लोग ?  आनंद देव..

वैसे तो पूर्वांचल राज्य के गठन की मांग काफी लम्बे समय से चली आरही है लेकिन बीच में यह आन्दोलन कमजोर पड़ गया था । लेकिन इधर तेलंगाना की बहस छिड़ते ही इस image बुझते आन्दोलन को जैसे नई ऊर्जा मिल गयी है । मुख्यमंत्री मायावती ने भी जोर सोर से छिड़ी इस बहस की आग में तपते तवे पर राजनीति की रोटी सेंकने में कोई कोर कसार बाकी नहीं रखी और उन्हों ने केंद्र सरकार को आनन् फानन में प्रस्ताव भी भेज दिया । अब सवाल यह उठता है की पूर्वांचल राज्य के गठन की वकालत करने वाले लोग आखिर किस विकास का सपना देख रहे है ? क्या पूर्वांचल या फिर पूरे उत्तर प्रदेश की दुर्दशा का कारण यही है की इसकी गिनती रकबे की दृष्टी से बड़े राज्यों में होती है ?

राजनीतिक कौशल दिखाने के अवसर बढ़ते हैं, अगर दो-तीन 'योग्य' विधायक हों तो वे सरकार गिरा सकते हैं या बना सकते हैं. एक रिटायर हो रहे नेता के लिए गर्वनरी का विकल्प भी उपलब्ध होता है. झारखंड के मुख्यमंत्री रहे मधु कोड़ा इस बात के ताज़ा उदाहरण है । मेरा मतलब कि अगर आप छोटे राज्य का एकेडेमिक आधार पर समर्थन करते हैं तो कोई एतराज़ की बात नहीं है, अगर आप उसे करियर ऑप्शन के तौर पर देख रहे हैं तो आपका भविष्य उज्ज्वल हो सकता है.लेकिन छोटे राज्य के सहारे अगर गरीबी दूर करने ,विकास की गंगा बहाने की सोच रहे है तो बिहार, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश से टूट कर अलग हुए झारखंड ,छत्तीस गढ़ और उत्तरा खंड की आम आवाम की राय लेनी चाहिए ।

>


अरविन्द जी के साथ दुर्घटना घट गयी, लताड़ दिये गये, यद्यपि बात सही ही कह गये थे, शब्द सही ही प्रयोग कर दिया था । विडम्बना के हाँथ आपकी तरफ बढ़ ही जाते हैं । लिखते हैं कुछ, मतलब कुछ निकलता है । विमर्श के लिये प्रविष्टियाँ लिखते हैं, होने लगता है संघर्ष ! अब कोई क्या करे ! खैर आज यह बात नहीं । आज तो निष्कर्ष निकलता दिख रहा है । आप यहाँ देख लें -


 क्या विवाहिता को सुश्री कहना अनुचित है?
एक सज्जन ने मुझे लताड़ा है कि मैंने विवाहिता के लिए भी सुश्री का संबोधन दिया है जो कि गलत है! सुश्री का संबोधन केवल अविवाहिता के लिए ही होना चाहिए! यह मामला अब मैं ब्लॉग जगत की महापंचायत में रख रहा हूँ -अपनी समझ बुद्धि के अनुसार मैंने उन्हें यूं समझाया है -
"मैं समझता हूँ कि सुश्री चूंकि वैवाहिक स्थिति को नहीं दर्शाता इसलिए आधुनिक रीति रिवाज में यह विवाहित महिलाओं  के लिए भी प्रयुक्त होता है ....
क्या कहते हैं प्रबुद्धजन ,शिष्टाचार नियामक और पंच लोग ? 

अरविन्द जी की प्रविष्टि की चर्चा कर लेने के बाद क्या यह कविता मौजूँ नहीं ! संवाद घर के संजय जी मेरे पसन्दीदा चिट्ठाकारों में एक हैं । उनकी प्रत्येक प्रविष्टि में ’आभ्यंतर सार-तत्व परिवर्तित युग-बोध के अनुरूप नये साँचे में सुगमता से ढला’  मिलेगा । उनका व्यक्तित्व नयी मर्यादाओं के जामे तलाशता है और अपने को किंचित रूपांतरित कर ’फिट’ बैठा देता है । पढ़िये कवितायें उनकी, आनन्दित होईये -



संजय ग्रोवर : संवाद घर
कुछ खुरदुरी सी दो गज़लें /
कुछ बुरी-सी दो गज़लें
जोकि ये समझ रहे हैं मुझे कुछ पता नहीं   है
उन्हें जाके ये बता दो उन्हें ख़ुद पता नहीं है
यूंही ख्वाहमख्वाह ही डरके कोई बात मान लेना
इसे तुम हया न समझो, हरगिज़ हया नहीं है
दुत्कारना दलित को, चालू को चाट लेना
जो इसी को जीत समझे कभी जीत़ता नही है



दिखा जो उनको कीचड़
लिथड़ गए सब लीचड़
ठग-वग की जगमग से,
चमक रहा है प्रांगण
पढ़े-लिखे नंगों से
सहम गए हैं अनपढ़ 
फ्यूज़-उड़े-कट-आउट
कड़क रहे हैं कड़-कड़

संजय जी की कविता के बाद मुकेश कुमार तिवारी जी की कविता (मोस्ट अपीलिंग ) और आराधना चतुर्वेदी (मुक्ति) की कविता का सम्मानपूर्वक उल्लेख कर रहा हूँ  । मुकेश जी की कविता की सम्पदा उसकी गहरी संवेदना है । हार्दिक अनुभूतियों का बहुरंगा कलेवर मिलेगा यहाँ । मुझमें विचारने, कहने की सामर्थ्य कहाँ ?
मुक्ति जी की कविता का अपना अलग स्वभाव है । नारी की सहज छवियों को अर्थपूर्ण बना देती हैं इनकी कवितायें । आप इन दोनों विभूतियों की कविताओं का रसास्वादन करें -



कवितायन पर मुकेश कुमार तिवारी और फेमिनिस्ट पोएम पर मुक्ति
कोई अकेला तो नहीं बूढ़ा होता
पर... माँ
हमारे
बीच सभी कुछ
भाग रहा हो हड़बड़ी में
जैसे दीवारें मचलती है
मुँह बाये नये रंगों के लिये
या बाल धकेल रहे हों
खिज़ाब को अपने से परे
केवल एक उम्र का फासला स्थिर है
और हम बुढ़ा रहे हैं
एकसाथ
बाबूजी का लाड़
अपने जैसा था
भाई का प्यार भी
अनोखा था
बहन के स्नेह का
कोई सानी नहीं / पर
इन सबसे बढ़कर था माँ
थपकी देकर
सुलाते हुये तुम्हारा
मेरे सिर पर
हाथ फेरना.


अब मिलवाता हूँ आपको जॉर्जिया ड्वेट से । ये हमारे देश की नहीं हैं । डच हैं, पर रहने वाली हैं बेल्जियम की । हिन्दी बोलती हैं, लिखती हैं । अपनी हिन्दी के लिये उन्होंने एक विश्लेषण चुना है बिन्दास ! पहली बार जाना गिरिजेश जी के भेंजे लिंक से । फिर यहाँ विस्तार से प्रविष्टि थी उनके बारे में - राजू बिन्दास ने बिन्दासियत को सम्मान दिया था । सोचने लगा, हिन्दी में कशिश है - बेल्जियम वासी भी खिंचे चले आते हैं । बात अलग है कि हम भारतीय हिन्दी को लेकर कहाँ-कहाँ नहीं उलझे/ उलझ रहे हैं । मैं पढ़वाता हूँ आपको उनकी ताजा दो प्रविष्टियाँ और आमंत्रित करता हूँ उनके ब्लॉग पर नियमित भ्रमण के लिये-



घीसू और माधव
हमारी रानी का महल
आजकल फिर प्रेम चंद का मशहूर कफ़न पढ़ना शुरू किया...जब मैं अपने देश में हिंदी पढ़ती थी, उस वक्त पहली मुलाक़ात हुई थी मेरी, घीसू और माधव से। लगता है कि प्रेम चंद के लफ्स बार-बार पढ़कर आजकल एक और, एक ख़ास, और पहले से अलग अहसास और असर मेरे अंदर पैदा करते रहते है। पढ़ने में, लगता है कि ज्यों-ज्यों घीसू और माधव अचानक असली व्यक्ति होते जा रहे हैं। जैसे उनकी शकल मेरे तरफ फोकस्ड हैं, जैसे मेरे तरफ देखते रहते है और घूरते रहते है, जैसे रोज़ मेरी तरफ होता है, जब मैं हजरतगंज या चौक या अमीनाबाद के मोहल्ले में घुमा करती हूँ। लगता है कि हर दिन मैं घीसू और माधव कि नज़र से मिलती हूँ, हज़ारों एकदम हिन्दुस्तानी आँखों से माधव और घीसू कि तस्वीर नजर आती हैं। यह तो एक बिलकुल पूरानी कहानी है, स्थितियां पूरानी, एक पुराना ज़माना और शायद एक पूर्व ज़माना...या यूं कहूँ "शायद ही एक पुराना या पूर्व ज़माना ।
आदिमुझको नहीं पता कि लुक्नाऊ में एक रानी जीती थी। और उनका एक महल नहीं लेकिन दो महल थे । मैं सिर्फ एक अजनबी हूँ तो मैं जान नहीं सकती महाल कि अंदर सही-सही क्या क्या हो रहा है। फिर भी मुझको उत्सुकता हो रही है। बहार से मैं देखती हूँ कि महल के आसपास काफी मजबूत आदमी फिर रहे है, fancy and flashy अम्बसदोर गाड़ी चल रही हैं, काफी लोग अन्दर सफाई कर रही है और महाल पर बहुत कम हो रहा है।

हमारे यहाँ की कहानियें में, रानियाँ कभी ज़ालिम कभी अच्छी हो सकती हैं। अगेर वह ज़ालिम होती तो उनका ज़ुल्म कल्पना के बहार होता। आमतौर पर, fairytales में, ज़ालिम रानी की बेटी भी होती है, लेकिन वह हमेशा एक पूर्व पत्नी की है। वह बेटी बहुत खुबसुरत होती है, और आखिर में, उसके घोड़े पर चलते हुए वीर की मदद से ज़ालिम रानी की महल से बच सकती है




अब मानसी जी के ब्लॉग से  उनकी नयी प्रविष्टि और ’अदा ’ की काव्य-मंजूषा से बिलकुल अलहदा-सी प्रविष्टि की झलक देखें -

मानसी पर मानसी तथा काव्य-मंजूषा पर स्वप्न-मंजूषा शैल
मैं छोटे, बड़े सभी को सम्मान दूंगा
मेरा घर, मेरे बच्चे 
पिछले साल, मैंने अपने स्कूल में बुलींग प्रिवेन्शन को लेकर काफ़ी काम किया था।  कई वर्कशाप में जाकर मैंने जाना कि मनोवैज्ञानिक या साइकोलॉजिकल बुलींग बहुत खतरनाक होती है, और बच्चों में, ख़ासकर लड़कियों में होती पाई जाती है। विशेषकर उनके साथ जो स्कूल में नये आते हैं।  उनको अनदेखा करना, अलग-थलग कर देना, बात न करना, मुँह फेर लेना आदि...और मैं सोचती थी, बड़ों की दुनिया कहाँ अलग है?
आज सुबह स्कूल में  ’आज का विचार’ पढ़ा गया, " मैं छोटे, बड़े सभी को सही सम्मान दूँगा।"
इन दिनों कुछ भी नया लिखने के लिए समय ही नहीं मिल पा रहा है...कारण मेरा छोटा बेटा मृगांक शेखर हॉस्टल से आया है....
और जैसा की आप जानते हैं बच्चे हॉस्टल से आयें तो सबसे ज्यादा खाने की ही बात होती है...कि क्या-क्या खिलाया जाए.... इसलिए ज्यादातर समय खाना बनाने और खिलाने में ही जा रहा है....हर दिन नई नई फरमाईश .... अपने खाने-पीने के मामले में मृगांक बहुत ही संयत है...लेकिन घर आते साथ ही सारा अनुशासन धरा का धरा रह जाता है...कहाँ मिल पता है उसे घर जैसा खाना ?

जगदीश्वर चतुर्वेदी जी के चिट्ठे पर वैचारिक विमर्श का सामान सदैव तैयार मिलेगा । आज वहाँ प्रविष्टि है स्त्रीवादी आलोचिका सुधा सिंह जी की लेखनी से निःसृत, गौर फरमायें -

आज सारे भारत में उच्च शिक्षा के स्तर पर सेमेस्टर प्रणाली लागू करने की कवायद चल रही है। यू जी सी का दबाव है और दण्डानुशासन जनित भय भी कि लगभग हर विश्वविद्यालय का प्रशासन इसे लागू करने की प्रक्रिया आरंभ कर चुका है। इस प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा है पाठ्यक्रम में बदलाव। अब तक का जो पाठ्यक्रम चला आया है , जिसे पढकर मेरी पीढी और मेरी माँ की पीढ़ी बडी हुई है ,उससे स्त्री की कोई छवि निर्मित नहीं होती। बारह चौदह वर्ष की पढाई करने के बाद अगर प्रश्न किया जाए कि हमने जो अध्ययन किया उसके आधार पर बताएँ कि स्त्री कैसी थी, उसका संसार कैसा था, वह कैसे सोचती थी तो उत्तर नकारात्मक होगा। न तो इतिहास, न भाषा का अध्ययन,  न खानापूर्ति के अलावा समाजशास्त्र स्त्री के बारे में कुछ बताता है। 

 वर्षा की प्रविष्टि पढ़िये उनके ब्लॉग पर, पढ़ते हुए कुछ-कुछ पूजा उपाध्याय याद आयीं -
"ज़िंदगी की पिकनिक खत्म होने लगी थी। नौकरी हासिल करने की मुश्किल भरी चुनौती सामने थी। मैं पहले यूनिवर्सिटी जाती फिर एक टुच्ची सी जगह पर दो-तीन घंटे की नौकरी पर। पैसे तो नहीं मिलते, अनुभव जरूर हासिल होता। नौकरी के लिये भी अपने स्कूटर पर सवार होकर इधर-उधर के खूब धक्के खाये। इंटरव्यू दिये।
दरअसल मेरे हिसाब से ड्राइविंग से आपके पास विकल्प तो बढ़ते ही हैं, मानसिक दृढ़ता भी बढ़ती है, सड़क पर दौड़ती गाड़ियों को ओवरटेक करने के साथ आप ज़िंदगी को ओवरटेक करना भी सीखते हैं। आगे बढ़ना सीखते हैं। मुश्किलों से जूझना सीखते हैं।
साहित्यकारों, विभूतियों पर केन्द्रित स्वतंत्र चिट्ठे अभी बहुत नहीं हैं हिन्दी में जिन पर उस विशेष विभूति के व्यक्तित्व-कृतित्व का सर्वांगीण परिचय मिले । ऐसा ही एक उल्लेखनीय़ चिट्ठा शुरु किया है अनिल कांत ने ’मिर्जा गालिब’ पर । स्वाभाविक ही था कि अनिल जी गालिब को चुनते -

उनकी हास्यप्रियता और एक मित्र की सिफारिश ने उनकी रक्षा की । हुआ यूँ कि जब गोरे मिर्ज़ा को गिरफ्तार करके ले गये तो अँग्रेज सार्जेंट ने इनकी अनोखी सज-धज देखकर पूंछा कि "क्या तुम मुसलमान हो ?" मिर्ज़ा ने हंसकर जवाब दिया "मुसलमान तो हूँ पर आधा ।" वह इनके जवाब से चकित हुआ । पूछा "आधा मुसलमान कैसे ?" मिर्ज़ा बोले "साहब, शराब पीता हूँ ; सूअर नहीं खाता ।"

एक और महत्वपूर्ण प्रविष्टि से आप का परिचय कराता चलूँ । दिल-ए-नादाँ ब्लॉग पर गीतकार शैलेन्द्र के कृतित्व को रेखांकित करती जानदार पोस्ट है यह -
हिंदी का जो रंग शैलेंद्र जमाने में कामयाब हुए उसकी मिसाल नहीं। कैफी, साहिर और मजरूह जैसे गीतकारों ने भले ही अपनी अपनी शायरी में प्रलेस के मूल्यो को थोडा बहुत अपनाया लेकिन सिने गीत लेखन के क्षेत्र में वे पारसी थियेटर के गीत लेखन की परंपरा की कडी को ही मजबूती देते देखे गए। कहें तो देवनागरी लिपि में हिंदी की प्रतिष्ठा स्थापित कराने वाले शैंलेंद्र पहले गीतकार थे। हिंदी पट्टी यानी पूरब का रंग शैलेंद्र के बाद किसी के यहां नहीं देखने को मिला।

चलते-चलते दो तकनीकी प्रविष्टियाँ और इति-श्री !


हिन्दी ब्लॉग टिप्स और हिन्दी टेक ब्लॉग की प्रविष्टियाँ -
क्या आप अपनी सारी टिप्पणियां पढ़ना चाहेंगे?
ब्लॉगर विजेट : स्क्रऑल करते फॉलोवर्स
आज ब्लॉग सर्फ़िंग के दौरान अचानक श्रीश पाठक 'प्रखर' जी की इस पोस्ट पर नज़र पड़ी- मेरी सारी टिप्पणियां इकठ्ठी हो सकती हैं क्या...? पोस्ट पढ़कर पता चला कि विभिन्न चिट्ठों पर की गई टिप्पणियां किसी धरोहर से कम नहीं। उन्हें फ़िर से पढ़ना मतलब पुरानी यादों

अपने फॉलोवर्स को दिखाए नए रूप में, आपके सभी फॉलोवर्स एक एक करके आते हुए दिखाई देंगे ।
इसमें आप अपने ब्लॉग या साइडबार के आकार के अनुसार इस विजेट को व्यवस्थित कर सकते हैं
फॉलोवर्स की संख्या बदल सकते है, फॉलोवर्स के फोटो का आकार भी बदल पाएंगे।



बस इतना ही ! शेष फिर !

29 comments:

Suman said...

nice

विनोद कुमार पांडेय said...

एक नयी योद्धा हिन्दी ब्लॉगिंग में और वो भी बेल्जियम से जॉर्जिया ड्वेट के बारे में पढ़ कर बहुत अच्छा लगा..हिन्दी ब्लॉगिंग में केवल हिन्दुस्तानी नही बल्कि और देशों के लोगों की बढ़ती लोकप्रियता ब्लॉगिंग के बेहतरीन भविष्य की ओर इंगित करती है...

खूबसूरत रचनाओं से सजी बहुत बढ़िया चिट्ठा चर्चा...बहुत बहुत आभार हिमांशु जी

Arvind Mishra said...

शुक्रिया ,कितने ही नए लिंक मिल गए जिन्हें असावधानी वश छोड़ गया था !
आप तो सच्ची ब्लाग -वर्म हो गए हो हिमांशु !

वाणी गीत said...

उठा नहीं पाता हूँ वह दुःसह भार जो इन चिट्ठों की अभिव्यक्ति से हृदय पर जमा हो जाता है । कारण इनके लिये अभिलषित, सुयोग्य अभिव्यक्ति का न मिलना है । चिरराजित एवं अनभिव्यक्त स्वरों का न उभर पाना अपूर्णता की प्रतीति देने लगता है...
यह तो हो ही नहीं सकता यदि चिट्ठाकार, चिट्ठाचर्चाकार या टिपण्णीकार हिमांशु हों ...
आपकी प्रविष्टियों की ही तरह सुन्दर साहित्यिक तटस्थ चिट्ठाचर्चा ....आभार ...!!

मनोज कुमार said...

वाह... बहुत अच्छी चर्चा।

ललित शर्मा said...

himamshu ji shundar charcha, kai naye link mil gaye. teen dino se ghar se bahar hun aru mere nye leptop me hindi install nahi hai isliye roman me likhna pad raha hai. abhar

श्यामल सुमन said...

खुबसूरत चर्चा के साथ खुद टिप्पणी को एक साथ पढ़ने की शानदार जानकारी भी। सुन्दर।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman. blogspot. com

Udan Tashtari said...

वाह , क्या कवरेज है...आनन्द आ गया!! बहुत खूब!!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बढ़िया चर्चा!
कम से कम आपने सुध तो ली इस ब्लॉग की!

काजल कुमार Kajal Kumar said...

बढ़िया जी.

अजय कुमार झा said...

बहुत बढिया और सुंदर चर्चा हिमांशु भाई और नई ब्लोगर से परिचय तो सबसे बडी खासियत रही ..आभार ...आपकी चर्चा की विशिष्टता तो देखते ही बनती है ॥

AlbelaKhatri.com said...

waah waah !

bahut khoob !

ताऊ रामपुरिया said...

बेहद लाजवाब चर्चा, इस तरह की साहित्यिक शब्दों से सजी चर्चा पहली बार पढी. आज तक की सुंदरतम चर्चा.

रामराम.

श्रीश पाठक 'प्रखर' said...

आहा हिमांशु जी ,,,मज़ा आ गया..आप आराम तो फरमा ही नही सकते...प्रमाण है ये बहुरंगी चर्चा..!

चर्चा मे चयन महत्वपूर्ण होता है.जितना सुंदर,comprehensive चयन उतनी ही सुघड़ चर्चा...!

इस ब्लॉग जगत मे लेखक बहुत हैं पर सुपाठक बेहद कम. और ये शर्त चर्चा के लिए सर्वाधिक लागू होती है. हिमांशुजी का g-reader share करता हूँ और समझ सकता हूँ कि कितनी गहराई से चिठ्ठा चयन करते है आप.

ऊपर से यदि लेखन शैली भी शास्त्रीय और जानलेवा हो तो फिर मत पूछिए...आज की चर्चा देख मन गदगद हो गया. थोड़ा आराम फरमा के ही आयें तो भी हर्ज़ नही जो इतनी सुंदर चर्चा करें...भाई हिमांशुजी को अनगिन बढ़ाइयाँ...!

अमरेंदर्जी अक्सर चिट्ठा चर्चा मे छूट जाते थे, यदि कभी भी मै चर्चा करता तो आज की तरह ही शुरुआत उनके ही चिट्ठे से करता..आभारी हूँ..!

शानदार चर्चा...हिमांशु भाई को एक बार फिर से बधाई..!

निर्मला कपिला said...

बहुत अच्छे लगी चिठा चर्चा। धन्यवाद्

अल्पना वर्मा said...

title hi bataa raha hi ki aaj ki charcha sahityik shbdon se saji hogi.
Himanshu ji is sundar charcha ke liye abhaar.
Prastuti to bahut hi achchee lagi.

अल्पना वर्मा said...

bahut achchhee prastuti.
Shirshak bhi bahut badhiya lagaa.

kul mila kar bahut sundar and sarthak !

महेन्द्र मिश्र said...

बहुत बढिया और सुंदर चर्चा...

गिरिजेश राव said...

@ इसे हमने ही शक्ति दी है, हमने ही सजाया है - हम ही इसे प्राण देंगे ! चाहिये बस समष्टि हित का ध्यान रखता हुआ तदनुरूप अभिनव आत्मानुशासन ! सबका अधिकार है यह । अनुशासन और संयम तो प्रतीति के बंधन हैं - सब के हित के निमित्त । क्या इससे किसी के स्वातंत्र्य में व्यवधान पड़ेगा ! - मास्साब क्या बात कह दी !
अज्ञेय की पंक्तियाँ! इस जगह और इतनी सन्दर्भयुक्त ! सोचा न था।

जाने क्यों 'बनपाखी बोला' याद आ रहा है! ब्लॉग जगत के गायन पाखी तो आप ही हैं।
चर्चा के लिए ब्लॉग चयन में तो आप ने कमाल ही कर दिया है। मैं तो कहूँगा कि पहले से ही लॉंचित अमरेन्द्र जी को आप ने बूस्टर रॉकेट की ऊर्जा दे दी है। मेरा नाम लेना जरूरी था क्या? वे स्वयं समर्थ हैं (वैसे हम भी दिल में बाग बाग बगइचा बगइचा हुए जा रहे हैं - तारीफ किसे अच्छी नहीं लगती? इस शिल्प की हो बात ही क्या?)

जॉर्जिया के ब्लॉग को मान और स्थान दे आप ने पुण्यकर्म किया है। उनकी हिन्दी भले 'बेल्जियन तासीर' लिए हो लेकिन भावों और नजर के क्या कहने !

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

बढ़िया चर्चा!

Mishra Pankaj said...

हिमांशु जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद ..अपने इस मंच का ध्यान रखा ...आगे से भी आपसे यही अपेक्षा रहे गी..मै चर्चा तो कर लेता हु लेकिन आपकी तरह ज्ञानमयी मुझ जैसा निपट गवार कहा से कर सकता है ..एक बार पुनः आपका धन्यवाद

मनोज कुमार said...

अच्छी चर्चा।

Gagan Sharma, Kuchh Alag sa said...

मेहनत साफ दिख रही है।

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...

हिमांशु भाई !
क्या कहूँ .. कहने को बहुत कुछ है पर
कहूँगा नहीं ...... अनुशासन पसंद हो बैठा यकायक !
नहीं तो बंधन कौन चाहता है ! .. वैसे भी , आपकी बात मानना
मेरे या किसी के लिए बेहतर होगा ---
'' चाहिये बस समष्टि हित का ध्यान रखता
हुआ तदनुरूप अभिनव आत्मानुशासन ! ''
कई बड़े अच्छे लिंक मिल गए .. '' जॉर्जिया ड्वेट'' को जानना आज की
मेरी उपलब्धि रही .. आभार !
@गिरिजेश राव
राव साहब !
आपकी विनम्रता की तारीफ किये बिना नहीं रहूँगा ..
सुन्दरता की तारीफ में कविवर तुलसीदास ने अभीष्ट के वर्णन - क्रम में कहा ---
'' सुन्दरता कहुं सुन्दर करई ''
आपकी विनम्रता पर कहना चाहता हूँ ---
............ '' विनम्रता कहुं विनम्र करई '' .............. यानी , आपसे !

डा० अमर कुमार said...


हिमाँशु को पढ़ना सुखद है, चाहे वह जहाँ भी लिख रहे हों ।
हम दम्पत्ति ( मैं और मेरी वो ) अपनी मौज़ियाते नोंक झोंक में इन्हें चर्चा-पाँडे का नाम दे रखा है ।
कोई इनकी कीबोर्ड से निकली कोई भी चर्चा पढ़ ले, पृष्ठाँकित करने को बाध्य हो जायेंगे ।

खुशदीप सहगल said...

इट्स डिफरेंट...चर्चा का अलग अंदाज़ दिलचस्प है...

जय हिंद...

मुकेश कुमार तिवारी said...

प्रिय हिमांशु,

आपने डॉ. शास्त्री साहब के अभिप्राय को स्वीकार एक बहुत अच्छी व्यापक, विस्तृत, चिट्ठा-चर्चा की।

अब तो बेल्जियम की सैर भी हो जायेगी और हिन्दी का मोह भी नही छूटेगा।

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

वन्दना said...

badhiya charcha rahi.

mukti said...

बहुत अच्छे हिमांशु,
आपने इतने चिट्ठों को समेटा, और उनकी सुन्दरता से प्रस्तुति की. संक्षिप्त एवं सटीक.

पसंद आया ? तो दबाईये ना !

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