Monday, January 04, 2010

"चुनौती को हम स्वीकार करते हैं" (चर्चा हिन्दी चिट्ठों की)

UNDAY, JANUARY 3, 2010

अंक : 124

ज़ाल-जगत के सभी हिन्दी-चिट्ठाकारों को डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"" का सादर अभिवादन!

“मानसिक हलचल की हिन्दी सेवा का प्रवचन” एक लेख नही अपितु एक ललकार भरी चुनौती है जी! आपकी इस चुनौती को हम स्वीकार करते हैं जी!

पाण्डेय जी आप शायद भूल गये हैं कि "चर्चा हिन्दी चिट्ठों की" के व्यवस्थापक अपनी व्यस्तताओं के कारण 40 दिन तक बाहर रहे लेकिन कलम के इस छोटे सिपाही ने "चर्चा हिन्दी चिट्ठों की" की में प्रति दिन चर्चा की। एक दिन की भी अनुपस्थिति नही होने दी।
हमारा यह हिन्दी सेवा का प्रवचन” मात्र प्रवचन नही बल्कि एक सच्चाई है!
शायद आपको हमारा हिन्दी प्रेम रास नही आ रहा है, मगर हमें “मानसिक हलचल” की मानसिकता का पता लग गया है।
भ्राता ज्ञानदत्त पाण्डेय जी तो हिन्दी की महान सेवा कर रहे हैं और हम आज से 35 वर्ष पूर्व हिन्दी-संस्कृत में स्नातकोत्तर करने के उपरान्त भी उनके अनुसार घास ही छील रहे हैं क्या?

श्री पाण्डेय जी के पास तो इसका उत्तर शायद नही है, इसीलिए तो वे अपनी पोस्ट पर टिप्पणी के द्वार ही बन्द करके बैठ गये हैं। देखिए तो सही कि ये क्या लिख रहे हैं-

हिन्दी सेवा का प्रवचन


बड़ी थू-थू में-में हो रही है हिन्दी ब्लॉगरी में। जिसे देखो, उगल रहा है विष। गुटबाजी का यह कमाल है कि अश्लीलता का महिमामण्डन हो रहा है। व्यक्तिगत आक्षेप ब्लॉग साहित्य का अंग बन गया है। जिसको देखो, वही पोस्ट हटाने, टिप्पणी हटाने का लीगल नोटिस जेब में धर कर चल रहा है।
अगर हिन्दी ब्लॉगरी इस छुद्रता का पर्याय है तो भगवान बचाये।
ऐसे में हिन्दी ब्लॉगरी को बढ़ावा देने का श्री समीरलाल का अभियानात्मक प्रवचन मुझे पसन्द नहीं आया। यह रेटोरिक (rhetoric) बहुत चलता है हिन्दी जगत में। और चवन्नी भर भी हिन्दी का नफा नहीं होता इससे। ठीक वैसे जैसे श्रीमद्भाग्वत के ढेरों प्रवचन भी हिन्दू जन मानस को धार्मिक नहीं बना पाये हैं। सत्यनारायण की कथा का कण्टेण्ट आजतक पता न चल पाया। इन कथाओं को सुनने जाने वाले अपनी छुद्र पंचायतगिरी में मशगूल रहते हैं।
कम से कम मैं तो हिन्दी सेवा की चक्करबाजी में नहीं पड़ता/लिखता। और मेरे जैसा, जिसका हिन्दी का सिंटेक्स-लेक्सिकॉन-ग्रामर अशुद्ध है; हिन्दी सेवा का भ्रम नहीं पालना चाहता समीरलाल के बरगलाने से।


हां, मुझे अपने लिये भी लगता है कि जब तब मीडिया, हिन्दी साहित्य या सेकुलरिज्म आदि पर उबल पड़ना मेरे अपने व्यक्तित्व का नकारात्मक पक्ष है। और नये साल से मुझे उससे बचना चाहिये। ऐसे ही नकार से बचने के लक्ष्य और लोग भी बना सकते हैं।
मुझे बहुत प्रसन्नता होगी जब लोग हिन्दी ब्लॉगरी को गुटबाजी, चिरकुटत्व, कोंडकेत्व आदि से मुक्त करने के लिये टिप्पणी-अभियान करें तो। अन्यथा तो यह सब बहुत जबरदस्त स्टिंक कर रहा है जी। सड़क किनारे के सार्वजनिक मूत्रालय सा - जहां लोग अपनी दमित वर्जनायें रिलीज कर रहे हैं और कोई मुन्सीपाल्टी नहीं जो सफाई करे मूत्रालय की। आपको गंध नहीं आ रही?
और मुझे लग रहा है कि
चिठ्ठाचर्चा कुछ समय से जो घर्षण उत्पन्न कर रहा है, उसे देखते हुये उसे तात्कालिक रूप से गाड़ दिया जाना चाहिये। साथ साथ; भांति भांति की चिठ्ठाचर्चायें न हिन्दी की सेवा कर रही हैं न हिन्दी ब्लॉगरी की।
मुझे मालुम है कि मैं यह लिख बहुतों में कसमसाहट पैदा कर रहा हूं। पर मित्रों, इस पोस्ट पर मैं टिप्पणी आमन्त्रित नहीं कर रहा। :-)………….

पाण्डेय जी!
आपको लघु-भ्राता कहूँ या बड़े भइया कहूँ!
आप अंग्रेजी मिश्रित पोस्ट लिखकर कथितरूप से हिन्दी की महान सेवा कर रहे हैं। हम तो अपनी पोस्ट में एक भी अंग्रेजी का शब्द नही लिखते। इसलिए आपके अनुसार हम जैसे बहुत से लोग न तो हिन्दी की सेवा कर रहे हैं और न ही ब्लॉगरी की सेवा।
आपने पोस्ट लिखी अच्छा लगा, लेकिन टिप्पणी के द्वार क्यों बन्द कर दिए?
आज तक तो आपने ऐसा नही किया फिर इस पोस्ट को लगाकर अपनी कायरता क्यों उजागर कर दी।

"संस्कृति एवं सभ्यता" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

किम् संस्कतिः?
(संस्कृति क्या है?)
या सम्यक् क्रियते सा संस्कृतिः।
(जो सम्यक् (भद्र) किया जाता है, वह संस्कृति है।)
अब प्रश्न उठता है कि - सम्यक् क्या है?
किसी कार्य को करने से पहले यदि उत्साह, निर्भीकता और शंका न उत्पन्न हो तो उसे सम्यक् कहा जायेगा और शंका,भय और लज्जा उत्पन्न हो तो वह सम्यक् अर्थात् भद्र नही कहा जा सकता।”

आपके मन मे इस पोस्ट को लिखने से पहले यदि कायरता और शंका उत्पन्न हो रही थी तो आपने इस पोस्ट को लिखा ही क्यों?
यदि लिखा तो टिप्पणियों का सामना करने मे अपने को इतना असमर्थ व अक्षम क्यो पाया?
सम्भव हो तो इन प्रश्न का उत्तर देने का कष्ट स्वीकार करें।

आइए अब आज की चर्चा के अपने रंग में आते हैं-
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मेरा फोटो
Udan Tashtari
एजेक्स (Ajax), ओंटारियो (ontario), Canada


देखा कैसे चल दिया, बिना कहे यह साल

आज महावीर जी के ब्लॉग पर नव वर्ष का कवि सम्मेलन आयोजित किया गया है. बेहतरीन और नामी गिरामी कवियों के बीच मुझ अदना से कवि को भी स्थान दिया गया है, बहुत आभार आयोजक मंडल का.

मेरे इस गीत को स्वरबद्ध कर अनुग्रहित किया है काव्य मंजूषा ब्लॉग की स्वप्न मंजूषा शैल 'अदा' जी ने. सुनने के लिए नीचे प्लेयर पर जायें.

देखा कैसे चल दिया, बिना कहे यह साल
बरसों बीते देखते, इसका ऐसा हाल...

अबकी उसके साथ था, मन्दी का इक दौर
लोग राह तकते रहे, मिल जाये कहीं ठौर
जाने कितनों को किया, उसने है बेहाल...
देखा कैसे चल दिया, बिना कहे यह साल...

ख्वाब में आके वो सताने लगा - पिछले वर्ष के अंतिम सप्ताह में कोटा से गुजरने वाले अलाहाबाद को अहमदाबाद से जोड़ने के लिए बन रहे राष्ट्रीय उच्चमार्ग पर निर्माणाधीन हैंगिग ब्रिज पर हादसा हु...
एक पंक्ति - ये उज्रे - इम्तहाने जज्बे -दिल कैसा निकल आया,मैं इल्जाम उसको देता था कुसुर अपना निकल आया।* मोमिन
दिल की बातें......... - दिल की बातों का असर अब नही होता। दुसरो के लिए कोई यहा अब नही रोता। जिन्हें सदा देख कर , मुस्कराते थे हम, उनकी तस्वीर है ये, यकी अब नही होता। खेल है किस्...

.0.0.0.0.0.0.0..0.0.0.0.0.0.0.0.0.0.0.0

"इस साल का पहली कविता जैसे एक पैगाम,

अपने ही देश के कुछ लोगों के नाम,

कृपया बुरा ना मानें क्योंकि कही कुछ तो ऐसा है ही."

हम जनता है, हमको तो बस शोर मचाना आता है,
मुट्ठी में है लोकतंत्र,लेकिन हम अज्ञान पड़े,
बस रोज़ी-रोटी मिल जाए,यही हमारे लिए बड़े,
सोच यही पर सिमट गयी है,इसीलिए कुछ नही चली,
जिधर घूमाओ घूमेंगे हम,बने हुए बस कठपुतली,
जनता होने का हमको, बस फर्ज़ निभाना आता है.......
इलाहाबाद में अमरूद के लिए तरसने का मजा… !?! -मुझे इलाहाबाद में नौकरी करते हुए ढाई साल हो गये। इसके पहले एक दशक से कुछ ही कम साल विद्यार्थी के रूप में यहाँ गुजार चुका हूँ। *इलाहाबाद
कोवलम का सूर्यास्‍त - Sunset @ Kovalam Originally uploaded by Pallav Budhkar http://www.flickr.com/photos/avdhoot/
नववर्ष-2 / साल-दर-साल, बारम्बार

पिछली कड़ी-नववर्ष-1 / बारिश में स्वयंवर और बैल

4159994350_cc29b27175र्ष की रिश्तेदारी जिस तरह वर्षा ऋतु से है उसी तरह अंग्रेजी के ईयर year शब्द का संबंध भी वर्षा से ही है। यह शब्द मूलतः इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार का है। इसी तरह वर्ष और बरस के साम्य पर साल के लिए ग्रीक भाषा में ओरस (oros) शब्द है। स्पष्ट है कि वर्षा पर ही वर्ष का ज्ञान आधारित था। अंग्रेजी का ईयर year प्राचीन भारोपीय भाषा परिवार का शब्द ही है। इसकी मूल धातु है yer-o जिसमें वर्ष या ऋतु का भाव है। अवेस्ता में इसका रूप है यारे yare जिसमें वर्ष का भाव है। साफ है कि प्राचीन काल से ही काल या अवधि की बड़ी इकाइयों की गणना मनुष्य ने ऋतु परिवर्तन और सूर्य-चंद्र के उगने और अस्त होने के क्रम की आवृत्ति यानी दोहराव को ध्यान में रखते हुए की। प्रकृति में दोहराव का क्रम महत्वपूर्ण है। यहां नया कुछ नहीं है बल्कि हर क्षण लौट कर आ रहा है। सृष्टि का अर्थ ही पुननिर्माण है। सृष्टि एक चक्र में बंधी है। काल-गणना में यह चक्रगति या दोहराव महत्वपूर्ण है। प्रोटो जर्मनिक धातु है jer जिसमें फसलों की बुवाई वाले मौसम का भाव है। वर्षा शब्द का रिश्ता मूलतः वृ धातु से है। वर्षम् या वर्षः शब्द के मूल में वृष् या वृ धातु है जिसमें शक्ति, ऊपर उठना, तर करना, अनुदान देना, बौछार करना आदि। यहां वर्षा या बारिश का भाव स्पष्ट है। वृष् का पूर्व रूप वर् था जिसमें ऊपर उठने, चुनने, वितरित करना, नियंत्रित करना जैसे भाव हैं। प्रोटो जर्मनिक धातु है jer....................
तीन मुक्तक - न्याय बिकता है तराजू तोल ले, हृदय की संवेदना का मोल ले, हर तरफ है रुपया आज बोलता, बेचने अपनी पिटारी खोल ले. बचे हुए भी चार गांधी चुक गये, सत्य अहिंसा पुस्त..
ब्लोगवाणी के नाम हास्य कवि अलबेला खत्री का विनम्र पत्र - मुझे मेरी आज़ादी लौटा दो प्लीज़ ! - सम्मान्य ब्लोगवाणी जी ! वन्देमातरम ! हालांकि मैं हिन्दी ब्लॉग को प्रचारने-प्रसारने के आपके अप्रतिम योगदान के प्रति हृदय की गहराइयों से कृतज्ञ हूँ लेकि...
ANALYSE YOUR FUTURE

इस वर्ष की कुछ उपलब्धियां -
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शुभकामनाएँ : जिन्होंने खिला दी ओंठों पर मधु-मुस्कान - ओंठों पर मुस्कान खिलाती शुभकामनाएँ प्रस्तुतकर्त्ता - रावेंद्रकुमार रवि मुझे कई बच्चों के शुभकामना-पत्र मिले! आप भी देखिए इनकी कुछ झलकियाँ! बुलबुल की च...

टांक लेने दे उसे मोहब्बत के पैरहन पर इश्क़ का बटन ......!! - आसमां ने फिर उछाले हैं कुछ अल्फाज़ .......... जिसमें दस्तकें हैं मोहब्बत की ... देख तेरे जिस्म के सन्नाटे मुट्ठियों में भर लाई है सबा वह खोलती है तो बिखर जात..
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खुशदीप जी गए छुट्टी पर - इसमें मक्खन क्या करे -नए साल में सूरज के दर्शन मुश्किल हो गए . ठण्ड ने कमाल कर दिया कभी कभी लगता है ठण्ड के मारे सूरज छुट्टी पर सुसराल चले गए . हां सुसराल से ध्यान आया बड़े बड़े...
चिट्ठा चर्चा
ज्ञानविमुख हिन्दी का चिट्ठाकार… -आज सुबह सवेरे जबर्दस्त मानसिक हलचल मची और विचार आया - *“और मुझे लग रहा है कि **चिठ्ठाचर्चा** कुछ समय से जो घर्षण उत्पन्न कर रहा है, उसे देखते हुये उसे ता..

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said:

अच्छा भोजन परोसा है जी।
खुश्बू से ही पेट भर गया!

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said:
वैसे तो हिन्दी ब्लागिंग की वर्तमान दशा दुर्दशा को देखते हुए ज्ञानदत्त जी ने जो भी चिन्ता जाहिर की...उससे तो कोई भी बुद्धिसम्पन, हिन्दी हिताकांक्षी व्यक्ति असहमत हो ही नहीं सकता किन्तु उनका ये कहना कि भान्ती भान्ती की चिट्ठाचर्चाएं न तो हिन्दी की सेवा कर रही हैं और न ही हिन्दी ब्लागिंग की---इस कथन से सहमत होना थोडा मुश्किल है।
ये माना कि अभी अन्य चर्चा मंचों में चिट्ठा चर्चा मंच जैसी गंभीरता, परिपक्वता नहीं दिखाई पडती किन्तु वो लोग भी अपने अपने ढंग से हिन्दी की सेवा तो कर ही रहे हैं....नियमित रूप से चर्चा करते देर सवेर उनमें में वो परिपक्वता आ ही जाएगी। उनके प्रयासों, उनके योगदान को नकार देना मैं तो गलत मानता हूँ।
ज्ञानदत जी की उस पोस्ट पर टिप्पणी की सुविधा न होने के कारण ही हमें ये टिप्पणी यहाँ करनी पड रही है।


Arvind Mishra said:
कुछ बातें जेहन में कौंध गयी हैं -
मूल लेख सुधा सिंह का है जो शायद जगदीश्वर जी की शोध स्टुडेंट हैं ...
रवि जी ने दूसरे की थाली से हलुआ उड़ा अपनी थाली सजा ली है निश्चय ही साहित्य के गुण अवगुण ब्लॉगर भी सीख ही रहा है .
लेकिन स्रोत उधृत कर देने और पैरोडी की ढाल से किसी "साहित्य की चोरी "(प्लैजिआरिज्म ) के आरोप से बचा लिए हैं अपने को.
ज्ञानदत्त जी का अपने ब्लॉग पर संवाद का आप्शन रखना या न रखना उनका मौलिक विशेषाधिकार है .
मगर यह नौबत आई क्यों? केवल इसलिए ही कि जिम्मेदार, बौद्धिक व्यक्ति का निरंतर डरपोक बनकर तटस्थ होते जाना -राजनीति में इस वृत्ति ने कितना कहर ढा दिया है -केवल क्रिमिनल्स बचे हैं वहां -अब बुद्धिजीवियों ,श्रेष्ठ जनों की निःसंगता, निस्प्रिह्ता और उसी अनुपात में मूर्खों की उद्धतता ने ही ब्लागजगत में यह धमाल मचा रखा है ! इस शुतुरमुर्गी रुख से क्या हासिल होगा ? ज्ञानदत्त जी (अब सीनियर को कुछ कहने की गुस्ताखी कैसे हो ?} हों या डॉ अमर कुमार(जो अक्सर अब अंतिम दृश्य पर प्रगट होते हैं खलीफाई अंदाज में -मुआफी डाग्डर..इसे ही नववर्ष की शुभ कामना (गुड ओमेन, धीठी! समझी जाये!सादर ) या फिर समीर लाल(अब ये तो सखा है, क्या कहें इन्हें !) अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते.
.....और हाँ , यह सही है जिस दुकान पर गुणवत्ता और पेशे की इमानदारी नहीं बरती जायेगी वह बंद ही हो जायेगी एक दिन ...कोई चाहे या न चाहे ...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said:
"....और मुझे लग रहा है कि चिठ्ठाचर्चा कुछ समय से जो घर्षण उत्पन्न कर रहा है, उसे देखते हुये उसे तात्कालिक रूप से गाड़ दिया जाना चाहिये। साथ साथ; भांति भांति की चिठ्ठाचर्चायें न हिन्दी की सेवा कर रही हैं न हिन्दी ब्लॉगरी की।....."
अरे अनूप भाई (फुरसतिया जी)
आपको सुझाव मिला है और मेरे जैसे हिन्दी-संस्कृत की घास छीलते-छीलते हुए बूढ़े-तोते को चुनौती दी है भ्राता ज्ञानदत्त पाण्डेय जी ने।
बताओ तो सही कब से "चिट्ठा-चर्चा" बन्द कर रहे हो।
भ्राता ज्ञानदत्त पाण्डेय जी तो टिप्पणी का द्वार ही बन्द किये बैठे हैं।
चुनौतीपूर्ण पोस्ट लगाई थी तो कायरता का परिचय क्यों दिया?
cmpershad said:
"दुर्भाग्य है कि हिन्दी के चिट्ठाकारों में अपने वर्ग की कुण्ठाएँ, चालाकियाँ, दोरंगापन और थोथी नैतिकता का दिखावा बहुत है। "
क्या हम भी इस केटेगरी में आते हैं :(
"सोच लीजिए भाई चन्द्र मौलेश्वर प्रसाद जी!"
असुर हैं वे जो सुरापान नहीं करते! - *पहले यह अनुरोध *: इस आलेख को पढने के पहले कृपया यह और यह आलेख पढ़ कर आईये -थोडा समय देना होगा जिज्ञासु जनों को ... तस्लीम पर जाकिर ने यह वैज्ञानिक सलाह ...
……..
हम कुछ जुगाड़ तो खोज ही लेंगे - सर्दी के मौसम में भी इस बार बिजली की काफी किल्लत हो रही है। दिल्ली से लेकर इलाहाबाद कुछ घंटे की बिजली कटौती पक्की रही। नोएडा में 1-2 घंटे गई तो, इलाहाबाद म...

पत्नी मायके से नहीं लौटती, क्या मैं तलाक ले सकता हूँ? - ए*क पाठक ऋषि ने अपनी समस्या इस तरह रखी है ....... * *सर! * मेरी समस्या अपनी पत्नी को ले कर है। मेरी शादी को एक वर्ष हो चुका है शादी के कुछ समय बाद से ही म..
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DIRECTORY मे 100 का संख्या पूर्ण हो जाने पर *इसे वर्णानुक्रम से व्यवस्थित कर दिया जायेगा।
* BLOGER'S DIRECTORY में इस पोस्ट पर जाकर http...
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--- मनोज कुमार
ऊ साल जाते-जाते अउर ई साल आते-आते छदामी लाल को तीन ऐइसन पोस्ट मिल गया
पढ़ने के लिए कि उनका त मने तृप्त हो गया। एकठो पुरुष चिट्ठाकार का अउर दोसर
एकठो महिला चिट्ठाकार का और बीच में तेसर एक ठो मंच की चर्चा। तीन्नो पढ़के छदामी
एतना तृप्त हो गये कि घर से निकल लिये – मटरगस्ती करने। कलकत्ता में तो दुइगो
ऐसन जगह है जहां तृप्त भाव से मटरगस्ती किया जा सकता है, एकठो पारक इसटरीट
और दोसर चौरंगी। चौरंगी पहुंच के छदामी इम्हर-ओम्हर घुमिये रहे थे कि देखे चिठियाना
और टिपियाना आमने सामने खड़े हैं। छदामी त उनको कन्नी काट के निकलिए जाते कि
उनको उन दुन्नो का बात कान में पड़ा। उनको लगा ई दुन्नू कोनो गंभीर समस्या पर
बतिया रहें हैं। त छदामी आचार संहिता का उल्लंघन करते हुए हुनकर
बात छुप्पे-छुप्पे सुनने लगे।................
...........................................................................................................................................................

और अन्त में आज का कार्टून-
................................................................................................................

Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून
कार्टून:- यह है साफ-सुथरी ब्लॉगिंग का राज

अब दीजिए आज्ञा……!
लेकिन अपनी टिप्पणियों में इतना जरूर अंकित करने की कृपा करें कि -
क्या आप और हम हिन्दी-सेवा और ब्लॉगरी कर रहे हैं या नही?

21 comments:

अविनाश वाचस्पति said...

चिट्ठाजगत की गतिविधियों का सम-सामयिक जीवंत झरोखा

Udan Tashtari said...

चिट्ठाजगत की सारी गतिविधियों की बिना कांट छांट जानकारी प्राप्त हुई...अच्छा लगा. सेन्सर्ड न्यूज में वो मजा कहाँ.



’सकारात्मक सोच के साथ हिन्दी एवं हिन्दी चिट्ठाकारी के प्रचार एवं प्रसार में योगदान दें.’

-त्रुटियों की तरफ ध्यान दिलाना जरुरी है किन्तु प्रोत्साहन उससे भी अधिक जरुरी है.

नोबल पुरुस्कार विजेता एन्टोने फ्रान्स का कहना था कि '९०% सीख प्रोत्साहान देता है.'

कृपया सह-चिट्ठाकारों को प्रोत्साहित करने में न हिचकिचायें.

-सादर,
समीर लाल ’समीर’

डॉ. मनोज मिश्र said...

बहुत मजेदार चर्चा.

Suman said...

nice

पी.सी.गोदियाल said...

ठण्ड का प्रकोप हमारे ब्लोगर मित्रो पर साफ़ दीख रहा है, शास्त्री जी !:)

बी एस पाबला said...

हिन्दी की सेवा और उसके लायक योग्यता पर भी शायद कहीं पूछा भी गया था

बी एस पाबला

AlbelaKhatri.com said...

बहुत ही उम्दा बात

सही चर्चा

आपके पराक्रमपूर्ण सतत योगदान को मेरा नमन !

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत सुंदर और आजकल सामयिक तो सब कुछ होता ही है.

रामराम.

अजय कुमार said...

हम हिन्दी प्रसार में योगदान अपनी सामर्थ्य के हिसाब से दे पा रहे हैं ,ये हमारा सौभाग्य है । इस पर कोई विवाद नही होना चाहिये ।

ललित शर्मा said...

हिंदी प्रचार प्रसार पर विवाद क्यो? अजय कुमार जी ने सही कहा है। मै उनसे सहमत हुँ।
रही बात ब्लाग चर्चा की। जितनी ज्यादा चर्चाएं होंगी उतनी ज्यादा पाठकों को अच्छी रचनाओं के लिंक एक जगह पर मिलेंगे।

यह हिन्दी के प्रचार-प्रसार की ओर बढते कदम हैं जो नित नये चर्चा मंच प्रारंभ हो रहे हैं। हम स्वागत करते हैं सबका।

शास्त्री जी हम आपसे सहमत हैं।

हर्षवर्धन said...

ye to badi charcha ho gai

psingh said...

बहुत सुन्दर रचना
बहुत बहुत बधाई .....

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

बढिया सामयिक चर्चा!!
हमारा तो ये मानना है कि जो भी इन्सान हिन्दी में लिख रहा है या हिन्दी में लिखे को पढ रहा है तो वो अपने तरीके से हिन्दी की सेवा ही तो कर रहा है।

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

यह शमा जलती रहे।

--------
लखनऊ बना मंसूरी, क्या हैं दो पैग जरूरी?
2009 के ब्लागर्स सम्मान हेतु ऑनलाइन नामांकन चालू है।

Mishra Pankaj said...

शास्त्री जी नमस्कार ..
आपने जिस तरह हमारे अनुपस्थिति में चर्चा कार्य को बिना एक भी दिन ब्रेक लिए चलाये थे उसके लिए तो मै आपको जितना धन्यवाद दू कम है ...कुछ दिनों के अन्दर ही एक सम्पूर्ण पोस्ट लिखकर धन्यवाद दुगा ..
और हां अगर ब्लॉग जगत के बड़े-बुजर्ग हमारी निंदा करने बजाय अगर हमें शलाह दे तो अच्छा है ..
हिन्दी में लिखा हर एक शब्द हिन्दी की सेवा है ...
एक बार पुनः आपको धन्यवाद

महेन्द्र मिश्र said...

अंतरजाल में कई ऐसे वरिष्ट चिटठाकार है जो मर्यादित ढंग से संयमित भाषा का प्रयोग नहीं करते है और हिंदी भाषा का प्रचार प्रसार करने का दम भरते है जो हिंदी जगत में खुद रघुनाथ बन बैठे है अंतरजाल के ऐसे चिटठाकार खुद हिंदी भाषा को रसातल तक पहुंचा कर ही दम लेंगें . हिंदी भाषा ने आज विश्व स्तर पर जो पहचान बनाई है उसको इस स्थिति तक पहुंचाने के लिए हजारो निस्वार्थभावी कलमकारों का हाथ है मात्र अंतरजाल पर चिटठा चर्चा करने वालो का योगदान नहीं है जो हिंदी चिटठाचर्चा को गाड़ देने की बात करते है .

प्रदीप वर्मा said...

एक ब्लोग की टिप्पंई में कहा गया था:

आप ब्लागिंग करिये यदि आप अमिताभ है, आप ब्लागिंग करिये यदि आप मे खुद रचने की क्ष्मता नही है। आप ब्लागिंग करिये यदि आप वेब डिजाइन का धन्धा करते है, आप ब्लागिंग करिये यदि आप दिल्ली जाकर होटल का खर्चा बचाना चाहते है, आप ब्लागिंग करिये यदि आपको अपनी पीठे खुजवाने के लिये दूसरे की पीठ खुजाना अच्छा लगता है, आप ब्लागिंग करिये यदि आप रेल के बडे अफसर है और आपका समधी राजनीतीज्ञ है जो आपको बचा ले। लम्पट छोटा शब्द है यह मक्कारो और चोरो की दुनिया बन गयी है।

वह पोस्ट थी http://kishorechoudhary.blogspot.com/2009/12/blog-post.html और कमेंट बाद में हटवा दिया गया था

आप समझ ही गये होंगे

मनोज कुमार said...

सदा की तरह अच्छी चर्चा।

Arvind Mishra said...

शास्त्री जी नाहक ही परेशां है आप ! वो पुरानी चिट्ठाचर्चा बंद करने पर जयादा जोर था -बाकी तो एक तरह से प्रतिक्रिया स्वरुप ही हैं -माई मरि जाये त बच्चौ अनाथ होई जाएँगें -मगर माई क कुछ लाला ऐसी घुडकी पिलाए हैं की लागत बी माई क न मरै देहें -यही बिदाँ आप सब भी मौज करैं -माई अबै न मरे !

डा० अमर कुमार said...


आचार्य, मैं तो ब्लॉग जगत में रैदास सरीखा ही हूँ.. भला मेरी क्या औकात ?

अभि-अन्तर काला रहै, बाहेर करै उजासु ।
सो नर रसातल जायेगा, सति भाखै रैदास ॥

अब भला इस दोहे की व्याख्या क्या करूँ ?

"You should build a better word."
He questioned, "How?"
The world is such a ponderous place,
So complicated now;
"And so small anad useless I am,
There is nothing I can do."
But aal-wise and kind God replied:
"Just build a better you."

यहाँ इस कविता की लाइनों का सँदर्भ मात्र इतना ही निकता है,
Alas ! The best blogger cum preacher could make a better Man, free from his ego and ethos.

डा० अमर कुमार said...

CORRIGENDUM:
better word.... better world.
small anad useless... small and useless.
But aal-wise and kind ... But all-wise and kind.

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