Tuesday, January 19, 2010

मौज लेने वालों के सर्वनाश का इतिहास: संभल जाओ’(चर्चा हिन्दी चिट्ठो की )

JJ (3)नमस्कार ..चर्चा हिन्दी चिट्ठो के  इस अंक में मै पंकज मिश्रा आप सभी का स्वागत करता हु !  JJ
कुछ दिन पहले से चल रहे मौजुलिया रोग से पिडित ब्लाग समुदाय आप अकेले नही हो ..मौज और उससे होने वाले नुकसान बहुत पहले से चला आ रहा है और इसके बारे मे आज प्रवचन मे बताये है श्री श्री १००८ बाबा ताऊनंद जी महराज ने ! समीरानंद आशर्म के तत्वाधान मे चल रहे इस प्रवचन मे आत ताऊनंद जी ने बताया ’ मौज लेने वालों के सर्वनाश का इतिहास: संभल जाओ’

 

                                                                          कीर्तन करते भक्तगण और प्रवचनरत बाबा ताऊआनंद महाराज

भक्तगणों एक रोज कुछ सिद्ध तपस्वी महात्माओं का दल द्वारका आया. और वहां एक जगह ठहर गया. इन्ही यादव राजकुमारों और उनके चमचों को जब खबर लगी तो ये सारे मौज लेने की नीयत से वहां पहुंच गये. और उन महात्माओं की मौज लेने की युक्ति सोचने लगे. उन दुष्ट चेले चमचों ने उम्र और पद का भी लिहाज नही किया.
भक्तगणों फ़िर उन्होनें राजकुमार साम्ब को स्त्री के कपडे पहनाये और उसके पेट पर कपडे बांध कर उसको इन महात्माओं के सामने ले गये और पूछने लगे - हे महात्मा लोगों आप तो त्रिकाल दर्शी हैं. बताईये इस औरत को लडका होगा या लड्की?
महात्माओं को इस तरह अपनी मौज लिये जाना अच्छा नही लगा और वो क्रुद्ध होगये. और उन्होने कहा कि - अरे मंद बुद्धि और मौज मे उन्मत दुष्टों, इसको ना तो लडका होगा और ना ही लडकी होगी. इसको तो मूसल पैदा होगा और वही मूसल तुम्हारे कुल के विनाश का कारण बनेगा.

समीर लाल जी "समीर " जितनी बात की जाय कम जितने लेख छपे वो भी कम और जितने साक्षात्कार छपे ओ भी कम ही है ..
कल समीर जी का साक्षात्कार मीडिया मंच पर छपा तो देखकर सुखद अनुभूति हुई ..प्रेरणा स्रोत श्री समीर जी को बधाई !
समीर लाल  से  मीडिया मंच के एडिटर लतिकेश शर्मा की ख़ास  मुलाक़ात
मिलिए हिन्दी के सबसे बड़े ब्लागर समीर लाल से - कनाडा में रहने के बाद भी मेरा दिल हिन्दुस्तान में बसता है !

ब्लॉ ग  लिखनेवालों   के बीच यु तो कई नाम लोकप्रिय है ,लेकिन एक  ऐसा नाम  है, जिनसे ब्लॉग लिखनेवाला शायद ही कोई शख्स  वाकिफ़ ना हो . हम बात कर रहे 'उड़नतश्तरी' नाम से ब्लॉग लिखने वाले समीर लाल की . समीर  रहते तो कनाडा में हैं  ,लेकिन उनका दिल हिंदुस्तान में  बसता है   .  मीडिया मंच की टीम अपने  पाठकों को  समीर लाल से  मिलवाना चाहती थी . लेकिन इस रास्ते में कनाडा की दूरी आड़े आ रही थी . ऐसे   में  हमने  समीर लाल के लिए मेल के  ज़रिये  सवाल लिख कर भेज दिए और उन्होंने उसका ज़वाब लिख कर हमें वापस मेल कर दिया . तो आइये आप भी मिलिए ब्लोगिंग की दुनियां के सबसे बड़े लिखाडू समीर लाल से .

सवाल -ब्लॉगर बनने  का आईडिया कहा से आया और  क्या आप को उम्मीद थी की आप का ब्लॉग उड़नतश्तरी इतना पापुलर  हो जायेगा .

ज़वाब  - शुरुआती  दौर में मैं हिन्दी में कुछ कविताएँ लिखने का प्रयास किया करता था और याहू पर ईकविता ग्रुप से २००५ में जुड़ा. वहाँ हिन्दी कविता वालों का जमावड़ा था और वहीं से हिन्दी ब्लॉग के बारे में जाना.जब मार्च २००६ में अपना ब्लॉग बनाया, तब तक मैं ईकविता ग्रुप में एक पहचान तो बना ही चुका था लेकिन निश्चित ही  ब्लॉगजगत में आकर इतना स्नेह और लोकप्रियता हासिल होगी, यह कभी नहीं सोचा था.
चलिए  एक दुसरे शख्श से मुलाक़ात करवाते है ये है
श्री रतन सिंह शेखावत  जी ...आप है
राजपूत वर्ल्ड और ज्ञानदर्पण के मालिक
shekhawatji
    आज तक कितने बड़े से बड़े नुख्शे बता दिए है आपको हमको लेकिन अपने मुह मिया मिट्ठू नहीं बने है कभी ये है शान हमारे आज के शेखावत जी के !
आज शास्त्री जी को ब्लागजगत में एक साल पूरा होने को है और शास्त्री जी ने लिखा है
“ब्लॉग की दुनिया में एक वर्ष” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

मेरा परिचय यहाँ भी है!मित्रों! यह सब लिखने का उद्देश्य मेरी आत्म-श्लाघा नही है अपितु ब्लॉग की दुनिया के लिए यह सन्देश है कि लेखन में निरन्तरता से ही आगे बढ़ना सम्भव है।

आपके भीतर प्रेरणा जगे और हिन्दी-भाषा का उन्नयन आप सभी चिट्ठाकारों के द्वारा हो!इसी कामना के साथ

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”

अब अदा जी की बात दिल.!! हाय मेरा दिल ...!! 

हृदय इतना सशक्त और क्रियाशील है कि अनेक वर्षों तक लगातार बिना थकन या शिथिलता दिखाए हुए अपना कार्य करता ही रहता है...यह कभीजल्दी से धोखा भी नहीं देता...प्रति मिनट ५ लीटर रक्त हमारी नाड़ियों में प्रवाहित करता रहता है...यह अबाध रूप से २४ घंटे अपना कार्य करता है...यह अचेतन मन कि भांति ऐसा अंग है जो न नींद जानता है न आराम...बस चलता रहता है ......चलता रहता है....

साथ मे है दिगम्बर नासवा जी और कह रहे है गिर गइ थी नीव घर फिर भी खड़ा था और ताऊ जी की कविता "कवि चोर करेलवी कैसे कहलायेंगे"?

यूँ तो सारी उम्र ज़ख़्मों से लड़ा था
हिल गई बुनियाद घर फिर भी खड़ा था
बस उबर पाया नहीं तेरी कसक से
भर गया वो घाव जो सर पे पड़ा था
वो चमक थी या हवस इंसान की थी
कट गया सर जिसपे भी हीरा जड़ा था
कोई उसके वास्‍ते रोने न आया
सच का जो झंडा लिए था वो छड़ा था
आज का हो दौर या बातें पुरानी
सुहनी के लेखे तो बस कच्चा घड़ा था

“कवि चोर करेलवी कैसे कहलायेंगे”

कवि सम्मेलन में उदघोषक बोला
अभी तक आपने सुना झुमरू देहलवी को
अब सुनिये चोर करेलवी को
चोर करेलवी मंच पर आये और बोले
"प्रभुजी मोरे अवगुण चित ना धरो"
जनता चिल्लाई...बंद करो..बंद करो.. माल चोरी का है...
साफ़ साफ़ रैदास जी का है
चोर करेलवी बोले
आपने बिल्कुल दुरुस्त फ़रमाया
ये रचना बिल्कुल रैदास जी की है

अजय भाई ने हम सबकी बात का कद्र किया और वापस चर्चा कर्म मे लग गये है और कह रहे है कि यदि ऐसा ही है तो लीजीये अब चर्चा ही चर्चा..अजय भाई स्नेह बनाये रखिये !

ajay जी कहिन :- यहां पर आप मुझे अपनी ब्लोग पटरियां बिछाते हुए देख ही चुके हैं और आप सबने उसे स्नेह भी खूब दिया है ये यहां चलती रहेंगी मगर अब इसमें आपको बीच बीच में "चिट्ठा चालीसा " भी पढने को मिलेगी । जी हां चालीसा मैं इसे क्यों कह रहा हूं ये तो आपको पढने के बाद ही पता चलेगा ॥तो बोलिए जय बजरंग बली की जय ॥

तेताला :-अविनाश भाई के स्नेह निमंत्रण को हमने स्वीकार कर लिया है और इस मंच पर मेरे द्वारा सिर्फ़ और सिर्फ़ नए ब्लोग्स और नए ब्लोग्गर्स की चर्चा की जाएगी । उम्मीद है कि इससे नए ब्लोग्गर्स की न सिर्फ़ शिकायत कम होगी बल्कि उनका परिचय भी आप सबसे हो सकेगा और उनका प्रोत्साहन भी होगा ॥

महफ़ूज अली जी सिर्फ एक सवाल का जवाब आज मांगता हूँ...: महफूज़

कहाँ खो गयीं थीं तुम?

जवाब दो....clip_image003

मत पूछो हाल मेरा,

पर मेरे हर आंसू  का हिसाब दो.

बुना था जो ख़्वाब तुम्हारे साथ,

उसे धड़कन बना कर पास रखा था,

तस्वीर जो बनाई थी तुम्हारी,

उसे आँखों में बसा कर रखा था.

सिर्फ एक सवाल का जवाब आज मांगता हूँ तुमसे,

क्या दूर रह कर तुम भी उदास रहतीं थीं?

यशवन्त मेहता जी है देलही से और बता रहे है जब भुत दिखा जंगल में

जंगल में घूमते हुए लघुशंका लग गयी। हरे भरे पेड़ आमंत्रण दे रहे थे परन्तु हमने कृपा करी एक झाड़ी पर। निवारण क्रिया चल ही रही थी कि झाड़ी में से कुत्ते के भोकने की आवाज आई और महाराज झाड़ी से बहार आकर हमारे पीछे लग गए। हम दो अबोध बालक अपने वस्त्रो को सम्भालते स्कूल की और भागे। भय के कारन पीछे मुड़कर देखा नहीं। जब सांस थमी तो बहस शुरू हो गयी --- कुत्ता या भेड़िया। इस बात पर सहमति थी कि जंगल की औकात इतनी नहीं की भेड़िया वहां रहे और कुत्ते की इतनी औकात नहीं की वो जंगल में आ सकें। सो न तो वो कुत्ता था न भेड़िया। वो था भूत।

कैनवास पर है dr jsb naidu और लिख रहे है -

Dr Naiduभीषम जी, मेरे मित्र विश्वरंजन के बड़े दामाद हैं । वे गुजरात में अहमदाबाद में रहते हैं । उन्होंने मुझे एक SMS भेजा - Do you know that why the cars front glass are so large a nd the rear view mirror is too small .. ? .. because future is more important than the past .. althoough do not ignore the rear view but look ahead with a broad view .. मैं इसे पढ़कर प्रभावित हुआ । इस message के अनंर्तनिहित भाव ने मुझे इसे ब्लाग में लिखने प्रेरित किया । कहते हैं कि समझदार को इशारा काफी होता है । इसलिये सोचता हूं कि इसके आगे क्या लिखना .. ।

खुल्ला खेल फ़र्रुखाबादी (176) : आयोजक उडनतश्तरी पहेली चित्र प्रतियोगिता

चित्र देखिये और बताईये कि इस तस्वीर में कौन कौन है?

घुघूतीबासूती -हम फिर चूक गए..............घुघूती बासूती

मुझे लगता है कि यह एक सुअवसर था जब भारत में अंगदान, नेत्रदान व शरीरदान के महत्व की चर्चा लोगों से की जाती। मीडिया एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता था। समाचार पत्र इस विषय पर लिखते, टी वी में कुछ समय के लिए सिनेमा के महानायकों, भविष्यवाणियों, महामंत्रों, आस्थाओं आदि को विश्राम देकर ज्योति बसु ने जो किया वह क्यों किया और उससे कैसे मानव कल्याण होगा बताया जाता। चिकित्सकों को चर्चा के लिए बुलाया जाता। वे आँकड़े देते कि कितने रोगी गुर्दों की व नेत्रहीन आँखों की आस में बैठे हैं और कैसे हम ये उपयोगी अंग या तो जला देते हैं या गाड़ देते हैं, उनका दानकर हम अपने आप को व अपनी मानवता को नई ऊँचाइयाँ प्रदान कर सकते हैं। रोगियों व नेत्रहीनों का साक्षात्कार लिया जाता। जिनका जीवन अंगदान या नेत्रदान के कारण सुधरा है उनका साक्षात्कार दिखाया जाता। हमें बताया जाता कि हम किस पते पर कहाँ पत्र लिखकर या ई मेल करके अपने नेत्र या गुर्दे आदि के दान का प्रण ले सकते हैं। या फिर यह बताया जाता कि नेट पर कहाँ जाकर कोई फॉर्म डाउनलोड किया जा सकता है और भरकर कहाँ भेजा जा सकता है।

और अंत मे कविता रविकान्त जी के ब्लाग से अपना भारत इक झंडे के नीचे आये तो कैसे

खून-पसीना खेतों में तो जनता रोज बहाती है
लेकिन किसके हल के नीचे बोलो सीता आती है
षडयंत्रों का खेल रचाता घात लगाकर झूठ मगर
सच्‍चाई फिर भी लाक्षागृह से जिंदा बच जाती है
बेशर्मी जब-जब बढ़ती है मर्यादा की सीमा से
शूर्पणखा तब- तब लक्ष्मण के हाथों नाक गंवाती है
घर से निकलो तो हिम्‍मत की छतरी भी संग ले लेना
हिंसा की बूंदें बरसेंगीं, मौसम ये बरसाती है
अपना भारत इक झंडे के नीचे आये तो कैसे
कोई मुंबइ वाला है तो कोई यहां गुजराती है
सदियों की सब धूल हटाकर बंद कपाटें खोलीं तो
सुब्‍ह सवेरे अब खिड़की पर आकर धूप जगाती है
कागज़ और कलम के दम पर मुश्किल तुझको खत लिखना
पुरवाई के हाथ पठाई खुश्‍बू की ये पाती है
सोच रहा हूं मैं अब तुझको भूलूं पर ये शोख हवा
कानों को छूकर हौले से तेरी याद दिलाती
है

My Photo

अब कहते है राम राम मिलते है कल !उपर की दोनो फ़ोटो मेरी ही है :)

24 comments:

ललित शर्मा said...

बंधुवर-हलवाई मिठाई नही खाता।
सबकी चर्चा हम भी करते हैं
हमारी कोई नही करता।:)

Babli said...

इस बेहतरीन पेशकश के लिए बधाई! बहुत बहुत अच्छा लगा पढ़कर!

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

बढिया चर्चा!!
आभार्!

मनोज कुमार said...

अच्छी चर्चा, अभिनंदन।

Abhasjoshi said...

Bhai sabh
namaste karane aayaa hoon bloging men naya naya hoon
sabako namaste

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

हम तो देखते ही पहचान गये थे आपकी फोटो को!
सुन्दर चर्चा!
बधाई!

संगीता पुरी said...

बढिया रहा !!

विनोद कुमार पांडेय said...

बढ़िया पंकज जी सुंदर चिट्ठा चर्चा..धन्यवाद जी!!

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

सुंदर चर्चा! पर चित्र कैसे लम्बे और छोटे हो रहे हैं?

अविनाश वाचस्पति said...

आपने लिखा है कि उपर की दोनों फोटो मेरी हैं
परन्‍तु मैं कह रहा हूं कि आपकी हैं।

Dipak 'Mashal' said...

uttam charcha... bas sabse neeche wala photo kuchh jyada hi kheench diya.. :)
Jai Hind...

'अदा' said...

acchi lagi aapki charcha..
aur hame bhi shamil kiya..
danyawwad..!!

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा चर्चा. सारे लिंक छान आये. :) धन्यवाद!!

डॉ. मनोज मिश्र said...

vaah-उम्दा.

Arvind Mishra said...

चर्चा अनवरत है -बढियां है !

हिमांशु । Himanshu said...

सुन्दर मनभावन चर्चा । आभार ।

Suman said...

nice

राजकुमार ग्वालानी said...

बहुत ही बेहतरीन चर्चा

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत विस्तृत और सुंदर चर्चा.

बसंत अपंचमी की घणी रामराम.

रामराम.

रावेंद्रकुमार रवि said...

"सरस्वती माता का सबको वरदान मिले,
वासंती फूलों-सा सबका मन आज खिले!
खिलकर सब मुस्काएँ, सब सबके मन भाएँ!"

--
क्यों हम सब पूजा करते हैं, सरस्वती माता की?
लगी झूमने खेतों में, कोहरे में भोर हुई!
--
संपादक : सरस पायस

काजल कुमार Kajal Kumar said...

बल्ले बल्ले

महेन्द्र मिश्र said...

बहुत विस्तृत और सुंदर चर्चा...

दिगम्बर नासवा said...

बेहतरीन रही आज की चर्चा पंकज जी ........ आपको बसंत पंचमी की बहुत बहुत शुभकमनाएँ ....... शुक्रिया मेरी रचना को स्थान देने का ........

निर्मला कपिला said...

बेहतरीन चर्चा धन्यवाद्

पसंद आया ? तो दबाईये ना !

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