Monday, January 11, 2010

“कैसी-कैसी पोस्ट, कैसी-कैसी टिप्पणियाँ?” (चर्चा हिन्दी चिट्ठों की")

अंक : 124

चर्चाकार : डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"

ज़ाल-जगत के सभी हिन्दी-चिट्ठाकारों को डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"" का सादर अभिवादन!
आज
“चर्चा हिन्दी चिट्ठों की” में कुछ मजेदार पोस्टों और उन पर आयी हुई टिप्पणियों के कुछ नमूने आपको दिखाते हैं-

रविरतलामी »

कुत्ते बिल्लियों के ब्लॉग 
cat blogsdog blog
सवाल ये है कि कुत्ते-बिल्ली के ब्लॉगों में क्या हो सकता है? वो सबकुछ जो हमारे-आपके ब्लॉगों में हो सकता है, मगर मनुष्यों की तरह काटने-नोचने-झगड़ने की बातें, बिलकुल नहीं!

अनूप शुक्ल said:

अब लगता है शुरुआत होकर ही रहेगी।

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said:

पर पूरी तरह कुत्ते या बिल्ली को समर्पित एक भी ब्लॉग अभी हिन्दी में नहीं है. 
क्या यह पुख्ता जानकारी है?

Raviratlami said:

@ ज्ञानदत्त : आपकी शंका जायज है, इसे मेरी सर्वोत्तम जानकारी के मुताबिक पढ़ा जाए :)

बी एस पाबला said:

हिन्दी में कुत्ते-बिल्लियों की तरह आपस में काटते-नोचते-झगड़ते ब्लॉग
रवि जी, आपने बेशक हल्के-फुल्के तौर पर इस वाक्यांश को लिखा होगा। किन्तु आपका घोर प्रशंसक होने के बावज़ूद मुझे आपकी यह अदा, इस ब्रांड बन चुके मंच पर नहीं भायी। आपके कथन को गंभीर कथ्य माना जाता है, भले ही वह व्यंग्य क्यों न हो। 
चिट्ठाचर्चा के इस मंच पर लेखकों के कद को देखते हुए यह अपेक्षा रहती है कि वे अनछुए सार्थक ब्लॉगों को भी सामने लाएँगे। 
इन मूक प्राणियों के स्वामियों द्वारा संचालित इन विदेशी भाषा के ब्लॉगों की बजाय हिन्दी के चंद (ऐसे ही) भारतीय ब्लॉगों की बात कर ली जाती तो कितना बढ़िया था 
http://dpmishra-tiger.blogspot.com
http://krishnakumarmishra.blogspot.com
http://dpmishra.blogspot.com
http://kudaratnama.blogspot.com
आंग्ल भाषा में भी 
http://dudhwa.blogspot.com
वैसे अब तो हकीकत में पौधे खुद, बिना किसी की सहायता के 'ब्लॉग' लिख रहे हैं। बस हम मनुष्य ही ... 
बस एक क्षोभ का ज्वार उठा था, आप थे इसलिए लिख दिया, उम्मीद है अन्यथा नहीं लेंगे 
बी एस पाबला

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said:

भाई रवि रतलामी जी! 
आपकी इस पोस्ट से चिट्ठा-चर्चा का गौरव जरूर बढ़ा होगा? 
”आपकी प्रतिक्रियाये हमारे लिए महत्वपूर्ण है! 
चिट्ठा चर्चा हिन्दी चिट्ठामंडल का अपना मंच है। कृपया अपनी प्रतिक्रिया देते समय इसका मान रखें। असभ्य भाषा व व्यक्तिगत आक्षेप करने वाली टिप्पणियाँ हटा दी जायेंगी।”

आपकी पोस्ट एवं ब्लॉग की गरिमा बनी रहे इसका ध्यान रखते हुए ही टिप्पणी बहुत संक्षिप्त और संयत-भाषा में दी है। 
चिट्ठा चर्चा यदि हिन्दी चिट्ठामंडल का मंच है तो इसमें अंग्रेजी भाषा के ब्लॉगों के उदाहरण प्रस्तुत कर आप निश्चितरूप से चिट्ठा-चर्चा के गौरव और गरिमा में वृद्धि कर रहे है?

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said:

"लिखना भी भा गया हमें पढ़ना भी आ गया, 
पहचानते हैं खूब तुम्हारी नज़र को हम!"

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said:

रतलाम के भास्कर भइया रवि रतलामी जी! 
आप मुझसे पुराने ब्लॉगर हैं मगर आप यह कैसे भूल गये कि एक मशहूर बिल्ली का
"मिस रामप्यारी" के नाम से हिन्दी में ब्लॉग चल रहा है। जो एक वर्ष से अधिक पुराना हो गया है! 
वाह! 
कमाल है आपको अंग्रेजी का तो कुत्ते-बिल्ली का ब्लॉग मिल गया मगर हिन्दी का
रामप्यारी बिल्ली का ब्लॉग नही मिला

तनु श्री said:

आपनें कहा----हिन्दी में कुत्ते-बिल्लियों की तरह आपस में काटते-नोचते-झगड़ते (जाहिर है, पोस्टों-टिप्पणियों में!) ब्लॉगों के बीच भले ही अभी एक भी कुत्ता या बिल्ली का ब्लॉग न हो, मगर भविष्य जरूर उज्जवल है.
------------------------वैसे इस प्रकार के लेखन के लिए क्या यह यह मंच सक्रिय हो रहा है क्या?

Ratan Singh Shekhawat said:

हिंदी ब्लॉग जगत में भी तो "रामप्यारी" ह ना जी |
रामप्यारी ही नहीं हिरामन तोता भी तो उसके साथ है |

saraspaayas said:

रवि भाई!
नर-नारियों से दिल भर गया है क्या,
जो कुत्ते-बिल्लियों के प्रति आपकी चाहत
इतनी बढ़ी हुई प्रतीत हो रही है!

 


मेरा फोटो

DINESH DADHICHI
बादल से निकल के आई हुई एक बूँद

बादल से निकल के आयी हुई एक बूँद 
हुई है सफल जल के ही कल-कल में . 
बत्तियाँ अनेक, लड़ी एक है प्रकाशमान 
एक ही विद्युत् का प्रवाह है सकल में .

रवि कुमार, रावतभाटा ने कहा…
बेहतर..

. . . . .आजादी विचारों की !!!

"सांड खुला रहे तो कहीं भी विचरण करता है , विचारों को खुला छोड़ दो तो कल्पना के किसी भी लोक में विचरण करेंगे !!!

इंसानी प्रेम में स्वार्थ है !!

प्रेम शब्द का इंसानों के लिए अलग अलग मतलब है| हर प्रेम में स्वार्थ है !

माँ बाप अपने बच्चों को पाल पोसकर बड़ा करते हैं ये लालसा रहती है की……

राज भाटिय़ा, January 10, 2010 1:31 AM

हम भी निस्वार्थ प्रेम से घास डाल रहे है इस खुले सांड कॊ... कोई लालच नही


दिसंबर माह की महिमा

साथियों, दिसंबर का महीना बीत चुका है ,इस महीने की बीतने से मेरा मन उसी प्रकार दुखी है जिस तरह देश भर के शिक्षक अपने स्वर्णकाल के समाप्त होने से ज्यादा , सिब्बल युग के अविर्भाव के कारण दुखी हैं. मेरेपास इस माह का गुणगान करने के लिए उसी प्रकार शब्द नहीं हैं, जिस प्रकार स्टिंग ऑपरेशन में पकड़े जाने पर माननीय आँध्रप्रदेश के भूतपूर्व राज्यपालके पास अपनी सफाई में कुछ भी कहने के लिए शब्दों का टोटा पड़ गया था .

इस महीने से मेरा जुड़ाव अकस्मात् ही नहीं हुआ, जबसे मैंने सरकारी नौकरी का दामन थामा है, तभी से मेरे ज्ञान चक्षुओं ने विस्तार पाया और इस महीने के प्रति मेरे मन में अनुराग उत्पन्न हुआ . प्राइवेट नौकरी वाले इस महीने के महत्त्व को उसी प्रकार नहीं समझ सकते .…


डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

दिसंबर माह की महिमा तो अपरम्पार है . 
बहुत दिनों के बाद आपकी पोस्ट पढना काफी आनंद दायक रहा.अच्छी पोस्ट.

Sunday, January 10, 2010 1:26:00 PM

रवि कुमार, रावतभाटा ने कहा…

यह भी खूब रही...

Sunday, January 10, 2010 2:30:00 PM

kase kahun?by kavita. ने कहा…

sateek rachana.badhayee

रायपुर में चिट्ठाकारों का मिलन अगले रविवार

अगले रविवार रायपुर में एक मिलन गोष्ठी की घोषणा राजतन्त्र में .

प्रस्तुतकर्ता डॉ महेश सिन्हा पर १२:५१ PM

लेबल: 17 जनवरी, छत्तीसगढ़, ब्लॉगर मीट, रायपुर

3 टिप्पणियाँ:

समयचक्र ने कहा…

अच्छी जानकारी दी है . ब्लॉगर मिलन कार्यक्रम के लिए शुभकामना .

१० जनवरी २०१० ३:१७ PM

राजकुमार ग्वालानी ने कहा…

सिन्हा जी 
खबर को फैलाने के लिए धन्यवाद, लेकिन राजतंत्र का लिंक काम नहीं कर रहा है। हो सके तो कृपया ठीक कर दें। एक बार फिर से आपका धन्यवाद सिन्हा जी

१० जनवरी २०१० ३:१९ PM

ललित शर्मा ने कहा…

सिन्हा जी-सुचना के लिए शुक्रिया-राजतंत्र का लिंक काम नही कर रहा है। कृपया सही कर दें

कस्‍बा qasbaकहने का मन करता है...

कहने का मन करता है...

दिल सा कोई कमीना नहीं...दिल तो बच्चा है जी..

इश्क की अनगिनत नाकाम कथाओं के इस देश में सामाजिक बंधनों को सहलाने वाली तमाम कथाएं, गाने और तस्वीरें मन को सहलाती हैं। शादी की दहलीज़ पर पहुंचने से अनगिनत प्रेम के पल भ्रूण हत्या के शिकार हो जाते हैं। अहसासों को गरम कर उन पर पानी डालने वाला हमारा समाज रिश्तों में बंधकर उसमें बुढ़ा कर मर जाने वाली प्रेम कहानियां पैदा करता……


गिरीन्द्र नाथ झा said...

मुझे इस गीत को सुनकर अजीब सी अनुभूति होती है इसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता है। खासकर यह सुनकर- दिल सा कोई कमीना नहीं कोई तो रोके कोई तो टोके..। 
शब्द और संगीत दोनों धीरे-धीरे कान से दिल में कब घर बना लेते हैं पता ही नहीं चलता है। राहत फेतह अली साब जब यह बोलते हैं- दांत से डोर रेशम की कटती नहीं....तो कई यादों में खो जाने का मन करने लगता है। 
विनीत की पोस्ट के बाद इसे पढ़कर अलग कोण से सोचने को मजबूर हुआ। मन में पाले अनगिनत लव स्टोरी की याद जाता हो गई। साल के शुरुआत में बच्चा होने का जी करता है जी...। 
शुक्रिया।

January 10, 2010 12:19 PM

sanjaygrover said...

हर फ़िल्म में गुलज़ार का एक गाना और उसमें भी मुखड़ा लोगों की ज़ुबान पर चढ़ ही जाता है। ‘चप्पा-चप्पा चरखा’ और ‘थपई-थपई के थप-थप’ जैसे अनुप्रासी प्रयोग उन्होंने उबाऊ हो जाने से पहले ही छोड़ दिए। एक महिला द्वारा एक से ज़्यादा पुरुषों से एक साथ प्रेम करने की कहानी, सुनते हैं, महेश भट्ट की फ़िल्म ‘मंज़िलें और भी हैं’ में भी थी। जो कि उस वक्त लाप हो गयी थी। एक गाना शबाना आज़मी की किसी फ़िल्म में भी था कि ‘ हम तेरे बिना भी नहीं रह सकते और तेरे बिना भी नहीं रह सकते‘।

January 10, 2010 12:27 PM

मधुकर राजपूत said...

गाना वाकई शहद की तरह कानों में घुल जाता है और कच्चे अहसास सच्चे लगने लगते हैं। कई बार सुन चुका हूं बार बार वाह गुलज़ार कह देता हूं। उतना ही मन विशाल के काम के लिए आदर से भर उठता है। वाकई गड्ड मड्ड होते सपनों को किनारे से खड़ा करके एक तस्वीर काढ़ देते हैं ये अल्फाज़। सारे अल्फाज़ एक कनवेंशन से बाहर हैं। गुलज़ार ने माहौल के स्थानीय लफ्ज़ों को लपककर इस गीत को बुना है। एक बार फिर इसने बच्चा और कच्चा बना दिया है। वाह गुलज़ार, वाह विशाल और वाह रवीश, आपने भी खूब तार जोड़े हैं गाने के साथ।

January 10, 2010 2:05 PM

Arvind Mishra said...

दिल तो बच्चा है -इस परिचयात्मक सेशन के लिए शुक्रिया !

पीड़ित भी अपराधी भी [इस्पात नगरी से - २३]

Saturday, January 9, 2010

ब्लॉग जगत भी हमारे संसार का ही छोटा रूप है. हर तरह के लोग, हर तरह की नज़र. किसी को दुनिया की सारी कमियाँ अमेरिका से ही शुरू होती दिखती हैं जबकि किसी के लिए यौन-अपराध का मूल कारण कुछ नारियों के परिधान-चुनाव के सिवा कुछ नहीं है. ऐसे में मैं अपराध से सम्बंधित दो अमेरिकी पत्रों को आपके साथ बांटने का ख़तरा उठा रहा हूँ. पिछले हफ्ते केवल चार दिन के अंतराल में यहाँ अमेरिका में अपराध से सम्बंधित दो ऐसी रिपोर्टें देखने को मिलीं जो चौंकाती भी हैं और आँखें भी खोलती हैं. इन दोनों रिपोर्टों का उभयनिष्ठ तत्व बाल-अपराधी हैं.……

  1. बेनामी said...

    सच कहा। यौन क्राएम के लिए बच्चों में उत्सुकता भी जिम्मेदार है. बहुत पुराने जमाने से देहात के बच्चे भी सोडोमी मे लगे पाए गए हैं.उन्हें बड़े ही बिगाडते है.

    January 10, 2010 12:22 AM

  2. दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

    आप ने बिलकुल सही फरमाया। यौन शिक्षा किसी भी बालक के लिए उसी दिन से अत्यावश्यक हो जाती है जिस दिन वे लिंगभेद समझना आरंभ कर देते हैं।

    उन्होंने जनेऊ तोड़ दिया.....!!!

    आज एक प्रेरणा दायक स्मरण पर चलते हैं. आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी हिंदी के शलाका-पुरुष थे.महान सम्पादक और "लेखकों के निर्माता" होने के बाद भी उनमे घमंड लेश मात्र को भी नहीं था. "सरस्वती पत्रिका" से सेवा निवृत होने के बाद वह अपने गांव आ गए. ग्राम वासियों की इच्छा का आदर करते हुए उन्होंने सरपंच पद स्वीकार कर लिया.

    एक दिन खेत में मजदूरन चीख रही थी. दिवेदी जी उधर से गुजर रहे थे. देखा कि उस महिला को साँप ने काट लिया है. उन्होंने तुरंत जनेऊ तोड़ कर घाव चीर कर उस पर कस कर अपना जनेऊ बांध दिया ताकि जहर ना फैले. कुछ देर बाद ग्राम वासी आये. सब कुछ देख-समझने के बाद द्विवेदी जी को भली-बुरी सुनाई "आप ब्राह्मण हैं और यह महिला अछूत है और आपने पवित्र जनेऊ तोड़ डाला और जनेऊ इसके पांव में बांध दिया...........

    डॉ. मनोज मिश्र, १० जनवरी २०१० ९:०९ AM

    सुंदर संस्मरण.

    जी.के. अवधिया, १० जनवरी २०१० ९:३७ AM

    बहुत ही प्रेरणादायक लेख! 
    " मनुष्य की सेवा से बढ़कर कोई फर्ज नही है और अछूत भी कोई नही होता.......और सुनो पराई पीड़ा को दूर करने के लिए मैं जनेऊ तो क्या......इस शरीर का रक्त और मांस भी दे सकता हूँ"
    आज कहाँ हैं ऐसे महान विचार?

    राजीव तनेजा, १० जनवरी २०१० ९:४९ AM

    प्रेरणादायक प्रसंग

    डॉ टी एस दराल, १० जनवरी २०१० १०:१० AM

    अच्छा संस्मरण। काश के चिन्नई के मंत्री भी ऐसा ही सोचते टों एक कीमती जान बच सकती थी।

    दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi, १० जनवरी २०१० १०:१९ AM

    जनेऊ पहनना सार्थक हो गया! उस का इस से सुंदर उपयोग कुछ और नहीं हो सकता था।

    Vivek Rastogi, १० जनवरी २०१० ११:३७ AM

    बहुत अच्छा संस्मरण।

    डॉ महेश सिन्हा, १० जनवरी २०१० ११:४९ AM

    शीर्षक पढ़ कर थोड़ा चौंके लेकिन पाठ पढ़ के अच्छा लगा . कहाँ गए वे लोग

    अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी, १० जनवरी २०१० १२:४७ PM

    कहाँ से ले आते हैं आप ऐसे -ऐसे दुर्लभ प्रसंग ! 
    पढ़कर मन कौतुक-मय हो जाता है .. 
    सोचिये जिन्हें हम 'पुराने लोग ' कहते हैं वे कितने 'नए' हैं ! 
    हम युवा पीढ़ी पर उपकार करते रहें ऐसे ही , आर्य ! ... आभार ,,,

    Arvind Mishra, १० जनवरी २०१० २:३८ PM

    अनुकरणीय

    शादी के रस्मो-रिवाज
    लड़कियों की शादी होने प्रक्रिया काफी सारे रस्मो-रिवाज लेकर आती है। उन्हीं प्रक्रियाओं में से एक है लड़के द्वारा लड़की का देखा जाना। या यूं कहें इंटरव्यू लेकर सलेक्ट करना। तो आज की हास्य फुहार यहीं से।…..

    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

    अरे वाह.....! 
    पोस्ट की पोस्ट, 
    शायरी की शायरी 
    और 
    हास्य-फुहार 
    के साथ 
    हाजिर-जवाबी भी!

    १० जनवरी २०१० ८:२४ AM

    मनोज कुमार ने कहा…

    बेहतरीन। लाजवाब। बहुत खूब .हा..हा..हा..हा..

    १० जनवरी २०१० ८:५९ AM

    shyam1950 ने कहा…

    वाह ! क्या बात कही आपने .. आखिर लड़कियां हड़ताल क्यों नहीं करतीं शादी के खिलाफ .. बस कुछ सालों की हड़ताल "हम शादी नहीं करेंगी.. न होने देंगी" सब कुछ अपने आप ठीक हो जायेगा .. बर्तन मांझने कि बात ही नहीं कपडे भी धोयेंगे .. बच्चों के पोतने तक धुले धुलाए मिलने लगेंगे

    नीला पड़ गया है शरीर ~~

    ****

    परिन्दे यूँ ही नहीं चिल्ला रहे होंगे,

    गिद्धों के काफ़िले नज़र आ रहे होंगे.

    .

    सिहर रही है शाखों की फुनगियाँ

    लोग बेवजह पत्थर चला रहे होंगे.………

    smart indian - स्मार्ट इंडियन said...

    पत्थर भी तो दिख रहे है खौफ़जदा 
    संगतराशों को इर्द-गिर्द पा रहे होंगे
    वहुत बढ़िया!

    January 9, 2010 9:43 PM

    मनोज कुमार said...

    यूं ही नहीं गिरते पेड़ों के हरे पत्ते 
    इनकी जड़ों को कीड़े खा रहे होंगे. 
    बहुत खूब .

    January 9, 2010 10:31 PM

    निर्मला कपिला said...

    बेरहमी से जिसने घायल किया----- और 
    यूं ही नहीं गिरते पेड़ों के हरे पत्ते----- 
    बहुत ही लाजाव रचना है बधाई

    January 9, 2010 11:00 PM

    डॉ टी एस दराल said...

    यूँ ही नहीं गिरते पेड़ों के हरे पत्ते इनकी जड़ों को कीड़े खा रहे होंगे. . 
    सबसे बड़ा कीड़ा तो इंसान ही है, जो पर्यावरण को नष्ट किये जा रहा है। 
    अच्छी रचना। आज ज़रा हमें भी दर्शन दें। कुछ अलग मिलेगा।

    January 9, 2010 11:44 PM

    महफूज़ अली said...

    बेरहमी से जिसने घायल किया है वही अब दिलासा दिला रहे होंगे. 
    बहुत सुंदर पंक्तियों के साथ .... बहुत लाजवाब रचना....

    January 10, 2010 1:06 AM

    अजय कुमार said...

    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति, खूबसूरत रचना

    January 10, 2010 2:06 AM

    रश्मि प्रभा... said...

    पत्थर हैं खौफज़दा ........ इसे समझना आम बात नहीं

    January 10, 2010 2:44 AM

    राज भाटिय़ा said...

    नीला पड़ गया है शरीर इसका तो 
    यकीनन लोग ज़हर पिला रहे होंगे. 
    बहुत अच्छी रचना लिखी आप ने

    January 10, 2010 4:08 AM

    वन्दना said...

    har sher ek kahani kah raha hai.............kin shabdon mein tarif karoon. 
    यूँ ही नहीं गिरते पेड़ों के हरे पत्ते 
    इनकी जड़ों को कीड़े खा रहे होंगे 
    ताश की महल सा हिलता है मकाँ 
    नींव को कुछ लोग हिला रहे होंगे 
    kya khoob likha hai ...........bejod

    हमारे पडोसी श्री श्रद्धानंद पांडेय जी द्वारा लिखित 'हनुमान पचासा'

    जय हनुमान दास रघुपति के। 
    कृपामहोदधि अथ शुभ गति के।। 
    आंजनेय अतुलित बलशाली। 
    महाकाय रविशिष्‍य सुचाली।। 
    शुद्ध रहे आचरण निरंतर। 
    रहे सर्वदा शुचि अभ्‍यंतर।।………


    विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

    हमने तो पूरी चालीसा पढ़ डाली प्रेम से बोलो बजरंग बलि जी जय!! प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत आभार संगीता जी!!

    १० जनवरी २०१० १:०५ AM

    राज भाटिय़ा ने कहा…

    आप के पडोसी श्री श्रद्धानंद पांडेय जी ने बहुत सुंदर पचासा लिखा,लेकिन हमे तो चलीसा भी नही आता तो आगे केसे बढे, लेकिन इसी बहाने भगवान का नाम ले लिया. 
    धन्यवाद इस सुंदर पाचासा के लिये

    १० जनवरी २०१० २:४६ AM

    डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

    मेहनत बहुत की होगी,बधाई.

    १० जनवरी २०१० ९:०३ AM

    डॉ टी एस दराल ने कहा…

    अच्छा प्रयास है। बधाई।

    १० जनवरी २०१० १०:२२ AM

    राजीव तनेजा ने कहा…

    श्री श्रद्धानंद पाण्डेय जी का और आपका बहुत-बहुत आभार इस सुंदर रचना को पढ़वाने के लिए

    १० जनवरी २०१० ११:२३ AM

    निर्मला कपिला ने कहा…

    बहुत सुन्दर है जी पढ कर कापी कर लिया धन्यवाद

    १० जनवरी २०१० ११:२४ AM

    amit ने कहा…

    आप की ब्लॉग तो बहुत ही ज़ोरदार है ... अभी कुछ कुछ ही पढ़ पाया हूँ ... पर बहुत अच्छा लगा ... 
    मै ब्लॉग की दुनिया में नया हूँ इसलिए कुछ समय लगेगा .... 
    आप ने मरे ब्लॉग को पढ़ा एवं मुझे प्रोत्साहित किया इसके लिए आप को बहुत बहुत धन्यवाद ... मै नियमित रूप से अच्छा लिखने के लिए प्रयासरत रहूँगा.... 
    आप को एवं आप के परिवार में सभी को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाये .

    रंग-रँगीली : कृष्णकुमार यादव का एक बालगीत

    रंग-रँगीली

    चिड़िया रानी चूँ-चूँ करके

    सबको सुबह जगाती है!

    रंग-रँगीली चहक-चहककर

    सबका मन हर्षाती है!

    आँगन में बिखरे दानों को

    फुदक-फुदककर खाती है!

    अगर पकड़ने दौड़ो उसको

    झट से वह उड़ जाती है!

    जितना भी दौड़ें हम बच्चे,

    उतना हमें छकाती है!

    फुर्र-फुर्रकर आसमान में

    कलाबाजियाँ खाती है!


    shikha varshney ने कहा…

    बेहद खुबसूरत बालगीत है

    १० जनवरी २०१० २:५० AM

    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

    सुन्दर बालगीत है जी! 
    आप इसे मेरी टिप्पणी समझें 
    यदि उचित समझें तो- 
    आगामी किसी दिन के लिए पोस्ट समझकर प्रकाशित कर दें- 
    चिड़िया रानी फुदक-फुदक कर, 
    मीठा राग सुनाती हो। 
    आनन-फानन में उड़ करके, 
    आसमान तक जाती हो।। 
    मेरे अगर पंख होते तो, 
    मैं भी नभ तक हो आता। 
    पेड़ो के ऊपर जा करके, 
    ताजे-मीठे फल खाता।। 
    जब मन करता मैं उड़ कर के, 
    नानी जी के घर जाता। 
    आसमान में कलाबाजियाँ कर के, 
    सबको दिखलाता।। 
    सूरज उगने से पहले तुम, 
    नित्य-प्रति उठ जाती हो। 
    चीं-चीं, चूँ-चूँ वाले स्वर से , 
    मुझको रोज जगाती हो।। 
    तुम मुझको सन्देशा देती, 
    रोज सवेरे उठा करो। 
    अपनी पुस्तक को ले करके, 
    पढ़ने में नित जुटा करो।। 
    चिड़िया रानी बड़ी सयानी, 
    कितनी मेहनत करती हो। 
    एक-एक दाना बीन-बीन कर, 
    पेट हमेशा भरती हो।। 
    अपने कामों से मेहनत का, 
    पथ हमको दिखलाती हो।। 
    जीवन श्रम के लिए बना है, 
    सीख यही सिखलाती हो।

    पिछले सावन का दर्द

    सावन को आने दो पूछेंगे उससे 
    क्या तुम्हें मेरे दर्द का ख्याल न रहा....... 
    वो भी पल थे जब वो साथ थे तुम साथ थे, 
    सारे लमहे अपने थे उनकी हर बात महकती थी, 
    हवा भी उनके साथ चलती थी, 
    और तुम ही इशारे से उनके आने की खबर दिया करते थे... 
    आज ना ही वो लमहे अपने रहे; 
    ना ही तुमने उनके आने की खबर दी..... 
    बस हम तुम अकेले रह गए !!!!!!!……….

    “क्या अभी सावन नही आया है? किसी ने भी टिप्पणी नही दी!”

    कैसा लगेगा यदि आपका जन्मदिन हो और किसी अपने के मरने का समाचार आ जाये??

    आप भी सोंच रहे होंगे की मै पगला गया हूँ 
    मगर जनाब अगर ऐसा हो जाए तो क्या होगा? जरा सोंचिये बिचारिये,ये अलग बात है आज तक आपने ऐसी कल्पना नहीं की है. 
    परन्तु ये असंभव तो नहीं.भगवान करे आपके साथ ऐसा कभी ना हो मगर भगवान की लीला अपरम्पार है इससे तो किसी को इनकार नहीं.चलिए मै सीधे मुद्दे पर आ जाता हूँ.
    एक तरफ मन में ये उत्साह हो की सफलता पूर्वक मैंने अपना एक और बसंत पार किया.लोगो के बीच आज बधाई का पात्र हूँ जन्म दिवस की गहमा गहमी गिफ्टों का मिलना केक मिठाई दोस्त यार यानी मस्ती हीं मस्ती अचानक मोबाईल पर आये किसी कॉल में आपके जन्मदिन की बधाई न होकर ये समाचार हो की नाना जी /दादा जी/फूफा जी /काका जी अथवा कोई भी ऐसा इन्सान जो आपके बहुत करीब हो गुज़र गया तो आपको शायद ऐसा लग सकता है की यमदूत को अभी हीं ऐसा करना था.मगर आप कुछ भी सोंचे जो होना था हो गया अब आपके मन में कैसे कैसे बिचार आयेंगे ये आपके और उस व्यक्ति के सम्बन्ध पर आधारित होगा.या तो आप बहुत कम बिचलित होकर आये परस्थिति से लड़ने को तैयार हो जायेंगे अथवा जन्म एवं मृत्यू के आँख मिचोली में बिचलित होकर जन्मदिवस का उत्सव या मृत्यू का शोक दोनों में से कोई नहीं मना पायेगे. 
    ऐसी घटनाएँ अपने मानसिक स्थिति को थोडा बिचलित कर जाय तो कुछ नया नहीं है.जबकि ये अटल सत्य है की जन्म जीवन का आरम्भ है तो मृत्यू जीवन का अंत होता है और कोई इसे टाळ नहीं सकता मैंने आज ये प्रश्न इस लिए उठाया की मुझे इस अनुभव से गुजरने का एक मौका मिला है. 
    ऐसी परिस्थिति मन में भूचाल ला देती है और मन से कुछ पंक्तियाँ मन को बहलाने पता नहीं किस अंतर मन से आ जाते हें. 
    ऐसी हीं उहापोह में जन्मी कुछ पंक्तियाँ 
    उठते गिरते 
    चलते चलते 
    मंजिल मंजिल करते शोर 
    एक जन्म फिर जन्मदिवस 
    फिर हल्ला गुल्ला चारो ओर 
    एक कदम 
    फिर एक कदम 
    बढ़ते हुए कब्र की ओर …………


    rashmi ravija said...

    अरशद जी, 
    कितना कुछ एक सा घटता है,लोगों के जीवन में....कल ही मेरे बेटे के दोस्त का जन्मदिन था...दोस्तों ने मिलकर उसे सरप्राइज़ पार्टी दी थी...ये लोग एक दूसरे के चेहरे पर केक लगा रहें थे और पिज्जा का आनंद ले रहें थे तभी..उसके मोबाइल बज उठा...और उसकी नानी के गुजर जाने की खबर आई....अक्सर बच्चे नानी के ज्यादा करीब होते हैं....वह भी रोता हुआ घर की तरफ चल पड़ा...माता-पिता तुरंत गाँव के लिए रवाना हो गए...उसकी परीक्षा शुरू होने वाली थी,नहीं जा सका..,आज सारा दिन अपने दोस्तों को सॉरी के मेसेज कर रहा है...अकेला बैठा घर में

    जीने लगे इलाहाबाद में [बकलमखुद-121]
    …खटीमा के जंगलों से रूमानियत की शुरुआत और फिर …

    Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

    बांच रहे हैं, समझने का प्रयास भी है मगर कुछ बातें अस्पष्ट हैं, बड़े भाई की सहायता क्या ज्योतिष से समाधान ढूँढने के लिए अपेक्षित थी?

    JANUARY 10, 2010 4:44 AM
    Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

    अजित जी को जन्मदिन की बधाई!

    JANUARY 10, 2010 4:46 AM
    नितिन | Nitin Vyas said...

    अजित जी जन्मदिन की शुभकामनायें!

    JANUARY 10, 2010 5:13 AM
    अजित वडनेरकर said...

    आभार बंधुओं। बहुत बहुत शुक्रिया। आपको भी नए साल की शुभकामनाएं।

    JANUARY 10, 2010 5:17 AM
    Baljit Basi said...

    जनम दिन मुबारक हप अजित जी

    JANUARY 10, 2010 6:15 AM
    RC Mishra said...

    किस सन की बात है?

    JANUARY 10, 2010 6:35 AM
    अजित वडनेरकर said...

    साथियों, 
    जन्मदिन की बधाई नहीं, चंदूभाई की इस दास्तान के लिए कुछ शब्द कहे।

    JANUARY 10, 2010 6:39 AM
    RC Mishra said...

    जन्म दिन की शुभकामनायें!

    JANUARY 10, 2010 6:47 AM
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

    "लोहियाहेड की तरावट 
    नैनीताल (अब ऊधमसिंह नगर) जिले में खटीमा कस्बे के पास घने जंगलों में स्थित हाइडेल का एक पॉवरहाउस था। यह आज भी है, लेकिन लगभग ध्वंसावशेष की शक्ल में।....." 
    वडनेकर जी यह क्या लिख दिया है आपने! 
    लोहियाहेड का पावरहाउस आज भी सही-सलामत है। आपकी जानकारी के लिए लिखना चाहता हूँ कि लोहियाहेड का पावरहाउस आज उत्तराखण्ड के उन बिजलीघरों में से अग्रणी है जो सबसे कम लागत और कम मेंटीनेन्स में विद्युत उत्पादन करता है। इसके आसपास जंगल आज भी हैं, उसी रूप में हैं। इनके घने होने का प्रमाण यह है कि आज भी इनमें बाघ दिखाई पड़ जाता है।

    JANUARY 10, 2010 7:06 AM
    dhiru singh {धीरू सिंह} said...

    खटीमा की प्रक्रतिक सुन्दरता और शारदा नदी की चंचलता मनोहारी है .१७१ मे रहने वाला १८१ से जुड्कर नक्सली नही बन्ता तो क्या बनता

    JANUARY 10, 2010 7:23 AM
    गिरिजेश राव said...

    किवाड़ के फोटो पर अटका रहा। कुछ खोजता रहा। 
    @ इलाहाबाद की सड़ी-बुसी गर्मी के बाद बारिशों भीगे लोहियाहेड में आत्मा के पेंदे तक पहुंचती विचित्र खुशबुओं वाली ठंडी बरसाती हरियाली ने मेरे भीतर एक अलग तरह की केमिस्ट्री रच डाली और यहीं से जीवन के एक नए मोड़ का आगाज हुआ। यह मेरी सोच की बुनियादी बनावट में नजर आने वाली रूमानियत की शुरुआत थी, जिसका शिखर भले ही अब पीछे छूट चुका हो, लेकिन जो संभवतः आखिरी सांस तक मेरे व्यक्तित्व का सबसे बड़ा डिफाइनिंग फैक्टर बनी रहेगी। 
    यह गद्य मुग्धकारी है। 
    --------------------- 
    जन्मदिन की शुभकामनाएँ भाऊ।

    JANUARY 10, 2010 7:43 AM
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

    अजित जी आपको जन्म-दिन की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ! 
    यौमेपैदाइश पर मुबारकवाद! 
    HAPPY-BIRTHDAY!

    JANUARY 10, 2010 7:50 AM
    खुशदीप सहगल said...

    जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई...इस मौके पर संस्मरण यानि सोने पे सुहागा... 
    जय हिंद...

    JANUARY 10, 2010 8:16 AM
    Arvind Mishra said...

    पढता जा रहा हूँ यह अकथ कहानी ...जन्म दिन मुबारक् ..आज चंदू जी तो बिचारे आपकी जन्म दिन शुभकामनाओं में दब जायेगें -क्या त्रासदियों का उनसे चोली दामन का साथ रहा है ? अब आपको यह पोस्ट आज ही देनी थी ?

    JANUARY 10, 2010 8:50 AM
    अनूप शुक्ल said...

    इतवार का इंतजार रहता है कि आज चंदू भाई की पोस्ट पढ़ने को मिलेगी। बहुत अच्छा लगा इसे बांचकर। 
    अजित जी को जन्मदिन की शुभकामनायें भी दे रहे हैं।

    JANUARY 10, 2010 9:35 AM
    दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

    चंदू भाई के पास कहने को बहुत है। वे बहुत संक्षिप्त हुए जा रहे हैं। बहुत संघर्ष किया है उन्हों ने। वह सामने आना चाहिए। 
    अजित जी को जन्मदिन की बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएँ।

    JANUARY 10, 2010 10:01 AM
    निर्मला कपिला said...

    संघर्ष भरी गाथा बहुत मन से पढ रही हूँ। आपको जन्म दिन की बहुत बहुत बधाई।

    JANUARY 10, 2010 10:20 AM
    Udan Tashtari said...

    जन्मदिन की शुभकामनायें!

    JANUARY 10, 2010 10:27 AM
    सतीश पंचम said...

    गिरिजेश जी की तरह मेरी नजर भी दरवाजे पर अटकी है। अंदर कोई जरूर तहरी बना रहा होगा या फिर कम्पटीशन का फार्म भर रहा होगा......दरवाजा खोला जाय चँदू भाई। 
    बहुत मन से यह बातें पढ रहा हूँ।

    JANUARY 10, 2010 10:29 AM
    डॉ टी एस दराल said...

    जन्मदिन की बधाई और हार्दिक शुभकामनायें।

    JANUARY 10, 2010 10:35 AM
    अभय तिवारी said...

    हम पढ़ रहे हैं चन्दू भाई.. 
    अजित भाई को बधाई है..

    JANUARY 10, 2010 11:38 AM
    अमिताभ मीत said...

    जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं.

    JANUARY 10, 2010 11:38 AM
    Sanjay Kareer said...

    जन्‍मदिन की बहुत-बहुत शुभकामनाएं बड़े भाई।

    JANUARY 10, 2010 12:23 PM
    शोभना चौरे said...

    dam sadhe yh sanghrsh myi gatha pdhte padhte ak hi sans me smapt ho gai .stbdh hoo . 
    ajeet bhai ko janm din ki bahut shubhkamnaye

    JANUARY 10, 2010 1:49 PM
    Mired Mirage said...

    चन्द्रभूषण जी, आपकी आपबीती तो एक पुस्तक के रूप में होनी चाहिए। इतना कठिन जीवन, आपको न जाने कितना कुछ सिखा गया होगा। पुस्तक का रूप देने पर विचार कीजिए। 
    अजित जी को शुभकामनाएँ। 
    घुघूती बासूती

    JANUARY 10, 2010 2:35 PM
    अफ़लातून said...

    चन्द्रभूषण जी , धीरु सिंह के कहे जितना सरल नहीं रहा होगा निष्ठा , समर्पण और संघर्ष का सफ़र । उसकी तफ़सील में जाँए , माँग है । सप्रेम,

सशर्त प्रवेश [सप्ताह का कार्टून] - अभिषेक तिवारी

रचनाकार परिचय:-

अभिषेक तिवारी "कार्टूनिष्ट"ने चम्बल के एक स्वाभिमानी इलाके भिंड (मध्य प्रदेश्) में जन्म पाया। पिछले २३ सालों से कार्टूनिंग कर रहे हैं। ग्वालियर, इंदौर, लखनऊ के बाद पिछले एक दशक से जयपुर में राजस्थान पत्रिका से जुड़ कर आम आदमी के दुःख-दर्द को समझने की और उस पीड़ा को कार्टूनों के माध्यम से साँझा करने की कोशिश जारी है.

आज के लिए बस इतना ही……..! 
अगले सोमवार को फिर चर्चा करेंगे!

19 comments:

ललित शर्मा said...

शास्त्री जी-आज चर्चा का नया रुप सामने आया है, नये कलेवर मे धांसु चर्चा के लिए-आभार

Udan Tashtari said...

एक अलग तड़का लिए हुए एक अनोखी चर्चा...वाह शास्त्री जी. आप भी कमाल कर देते हैं. आनन्द आ गया!१

काजल कुमार Kajal Kumar said...

वाह , आज की चर्चा तो 'ब्लाग में ब्लाग' हो गई.

Suman said...

nice

डॉ. मनोज मिश्र said...

यह नया अंदाज भी खूब भाया.धन्यवाद.

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

समीर जी से सहमत, कालमो, लाईनो, पोस्टो व टिप्पणियो से सुसज्जित अनोखी चर्चा.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

साथियों!
इस पोस्ट को अन्यथा न लेना।
चर्चाकार ने तो चर्चित पोस्टों के बारे में
एक शब्द भी नही कहा है।
आदरणीय टिप्पणीकारों ने जो कुछ भी
अपनी टिप्पणियों में लिखा है
उसको ही तो "चर्चा हिन्दी चिट्ठों की"
मे लगाया है।
आप अपनी टिप्पणियो में बताइए तो सही कि
आपके साथियों ने क्या अच्छा लिखा और क्या...?

ताऊ रामपुरिया said...

वाह शाश्त्री जी आप तो चर्चा मे नये नये प्रयोग करने मे कुशल हैं. आज तो आपने बेहद विस्तृत चर्चा कर दी. और टिप्पणियों के माध्यम से असली आईना एक ही जगह दिखा दिया. आभार.

रामराम.

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

चिटठा चर्चा के साथ टिप्पणी चर्चा पढना भी आनंददायक है।
आभार।
--------
बारिश की वो सोंधी खुश्बू क्या कहती है?
क्या सुरक्षा के लिए इज्जत को तार तार करना जरूरी है?

दिगम्बर नासवा said...

चिट्ठा टिप्पणी भी जोरदार रही शास्त्री जी ..........

वन्दना said...

ye andaz-e-bayan to kabil-e-tarif hai.........sabse juda.

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

चिट्ठा चर्चा का ये नया क्लेवर बहुत ही अच्छा लगा...
बहुत बढिया!!

Shefali Pande said...

ye bhi badhiya raha...

Ratan Singh Shekhawat said...

अनोखी चर्चा

गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' said...

सुकुल जी का आशावाद
"अब लगता है शुरुआत होकर ही रहेगी।"
जय हो
हिंदी ब्लागिंग

गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' said...

और हाँ इत्ता झक्कास टेम्फ्लेट
बधाई

मनोज कुमार said...

अनोखी चर्चा..

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

अति सुन्दर!

ravikumarswarnkar said...

अब पढ़ा...
आनंद आया...
खूब रही...

पसंद आया ? तो दबाईये ना !

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